एक चुनाव सर्वेक्षण जरा हटकर
जैसे ही लोकसभा चुनावों के लिए आखिरी दौर का मतदान समाप्त हुआ विभिन्न समाचार चैनलों, अखबारों ने अपने अपने चुनाव सर्वेक्षण जारी करने शुरू कर दिये. केवल मीडिया के सर्वे सार्वजनिक नहीं हुए बल्कि राजनीतिक दलों ने अपने आंतरिक सर्वे भी सार्वजनिक किये और देश के दो बड़े राजनीतिक दलों ने अपने आंतरिक सर्वे को आधार मानते हुए केन्द्र में अपनी सरकार बनाने की संभावना भी जताई है. लेकिन इन सर्वेक्षणों के बीच बच्चों के लिए काम करनेवाली एक संस्था बचपन बचाओ आंदोलन ने भी एक सर्वेक्षण किया और पाया कि इस आमचुनाव में बच्चों का भविष्य कोई मुद्दा नहीं बन पाया.
बचपन बचाओ आंदोलन ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि 80 प्रतिशत से भी अधिक उम्मीदवारों ने बच्चों की शिक्षा और अधिकारों को अपने चुनावी भाषणों में कोई जगह नहीं दिया. 175 लोक सभा क्षेत्रों में 476 उम्मीदवारों में से महज 49 ने बाल मजदूरी के खात्मे को अपनी चुनावी जनसभाओं में उठाया, जबकि सिर्फ 35 उम्मीदवारों ने अपने लोक सभा क्षेत्र में शिक्षा अधिकार सुनिश्चित करवाने की वकालत की। ज्ञात हो कि शिक्षा अधिकार विधेयक अब भी संसद में लटका हुआ है। जिन उम्मीदवारों ने बाल अधिकारों के मुददों को उठाया वे मुख्यत: दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रेदश के हैं, जहां बचपन बचाओ आन्दोलन विगत कई वर्षों से लोक सभा चुनावों के दौरान राजनैतिक अभियान चला रहा है।
बचपन बचाओ आन्दोलन द्वारा इस सर्वेक्षण में 543 लोक सभा क्षेत्रों में से 18 राज्यों एव 6 केन्द्र शासित राज्यों की 175 लोक सभा सीटों को शामिल किया गया था। सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के 19 उम्मीदवारों ने अपने चुनावी भाषणों में बाल मजदूरी का खात्मा और बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने को अपना मुख्य मुद्दा बनाया जबकि कांग्रेस के 16 उम्मीदवारों ने प्राथमिक शिक्षा को अपने लोक सभा क्षेत्र में सुनिश्चित करवाने की बात चुनावी भाषणों में की। वाम दलों, बहुजन समाज पार्टी एवं समाजवादी पार्टी ने कहीं भी बाल अधिकारों और शिक्षा के मुद्दों को प्रमुखता नहीं दी।
बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी ने इस सर्वेक्षण को जारी करते हुए आरोप लगाया कि बच्चे आज भी राजनैतिक दलों की प्राथमिकता में नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सभी राजनैतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने पर लगे हैं और धर्म व जाति के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जबकि बच्चे, शिक्षा और विकास उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं है। उन्होंने कहा कि लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दल के घोषणापत्र में शिक्षा अधिकार को कानून बनाने और शिक्षा पर बजट बढ़ाने की बात कही गई है लेकिन उनके उम्मीदवारों ने अपने लोक सभा क्षेत्र में चुनावी भाषणों के दौरान इस पर चर्चा तक नहीं की। उन्होंने कहा कि महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती रेणुका चौधरी जोकि खम्मम (आंध्र प्रदेश) लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हैं, ने भी बाल अधिकारों और शिक्षा को तरजीह नहीं दी। गुमशुदा बच्चों के मामले में उनका चुप्पी साधना खासा निराशाजनक है।
एक अच्छी बात ये है कि इतनी खराब तस्वीर के बावजूद उत्तर प्रदेश के खीरी लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार एवं पूर्व सांसद रवि प्रकाश वर्मा ने विकास खासकर बच्चों की शिक्षा और शिक्षा अधिकार विधेयक को अगले लोक सभा सत्र में पास करवाने को प्रमुख मुद्दा बनाया है।
पूर्व में केन्द्र सरकार में श्रम मंत्री रहे उज्जैन से चुनाव लड़ रहे श्री सत्यनारायण जटिया और महबूबनगर से चुनाव लड़ रहे चन्द्रशेखर राव ने भी बाल श्रम या शिक्षा को मुद्दा बनाने के बजाय अपने क्षेत्रीय मुद्दों पर ही जोर दिया है। “भारत निर्माण'' और “मजबूत नेता निर्णायक सरकार" जैसे नारे इन सब मुद्दों के मामले में खोखले साबित हुए हैं। यू0पी0ए0, एन0डी0ए0 तथा तीसरे मोर्चे के वरिष्ठ नेताओं ने भी अपनी बड़ी चुनावी जनसभाओं में इन मुद्दों को छुआ तक नहीं है।
सर्वेक्षण के बारे में और अधिक जानकारी देते हुए बचपन बचाओ आन्दोलन के राश्ट्रीय सचिव राकेश सेंगर ने बताया कि आन्दोलन के कार्यकर्ताओं ने इन लोक सभा क्षेत्रों में बड़ी जनसभाओं के दौरान उम्मीदवारों को सुना और उनके भाषणों का विश्लेषण किया। साथ ही इसके साथ ही मीडिया में दिये गये नेताओं के बयानों और अपने चुनाव क्षेत्र में बांटी गई प्रचार सामग्री का भी इस सर्वेक्षण के दौरान अध्ययन किया गया जिसके बाद ये नतीजे निकाले गये हैं.
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