आधी दुनिया की अधूरी जीत
अबतक की लोकसभाओं की तुलना में पन्द्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा महिला सांसद होंगी। कुल सांसदों का 10.70 प्रतिशत। ये सकून की बात है। संसद में बढ़ी महिला सांसदों की तादात से उस वर्ग के दर्द को बेहतर आवाज दी जा सकेगी जिसकी बेइंतहा तौहीन होती रही है। जनता ने पहली बार संसद में पचास से ज्यादा महिला प्रतिनिधियों को चुनकर भेजा है। हालांकि 1995 से संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी तय करने के लिए जारी कोशिशों के अभी भी अनुरूप नहीं है। यानि की 19 सालो से ये संघर्स जारी है. महिला आरक्षण विधेयक के प्रारूप में संसद के अंदर आधी दुनिया की 33 प्रतिशत आबादी सुनिश्चित करने की बात की जा रही है।
हां इस बार के चुनाव में इतना जरूर हुआ है कि मतदाताओं ने संसद में महिला आरक्षण का बेशर्मी से विरोध करते रहे कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लालू, मुलायम और पासवान की तिकड़ी महिला आरक्षण का विरोध करती रही। पासवान को तो जनता ने आसमान दिखा दिया। लालू और मुलायम को भी हाशिए पर लगा दिया। जातिवादी राजनीति के बहाने आरक्षण का विरोध करने की पहलवानी करने वालों को इस बार धीरे से जोर का झटका लगा है। महिला आरक्षण का विरोध करने वालों की दलील है कि महिला आरक्षण में भी जातिगत आरक्षण की व्यवस्था हो।
नई पीढी के मतदाताओं ने इस बार बता दिया है कि विकास के फलसफे के बगैर वोट नहीं देंगे। इससे जाति जाति का जाप करने वालों के मुंह पर पट्टी लगनी चाहिए। सिर्फ जाति की आड़ में महिलाओं के आरक्षण का विरोध बंद होना चाहिए। क्योंकि यह आधी दुनिया की आबादी से जुड़ा है। इससे सबका सीधा वास्ता है। पुरुषों को पीछे धकेलने की नहीं समाज के उत्थान के मूल भावना से जुड़ी बात है ये। इससे शायद ही कोई राजी न हो कि विकास के लिए समाज में महिलाओं की दशा में तब्दीली आनी चाहिए। दबी कुचली और डरी सहमी नारी की तस्वीर बदलनी चाहिए। बेटा-बेटी के भेद के दस्तूर को इंसानी सभ्यता के बेहतर विकास के लिए बदलना होगा हमको, आपको हम सबको अपनी सोच को बदलना होगा. ये बात पुरुषों पर ही लागू नहीं होती बल्कि औरतो को भी अपनी सोच को बदलना होगा जिस से एक औरत एक औरत की दुश्मन न कहलाये.
मतदाताओ ने सार्वजनिक जीवन में महिला की सहभागिता को बढाने के लिए इस बार राजनीतिक दलों से ज्यादा उदारता दिखाई है। ऊपरी तौर पर कांग्रेस,वामपंथी और बीजेपी संसद में महिला आरक्षण की पैरवी करती रही है। लेकिन जब टिकट बंटवारे का वक्त आया तो महिला प्रत्याशियों की हिस्सेदारी तय करने में सब आनाकानी करने लगे। 33 प्रतिशत टिकट महिला प्रत्याशियों को बांटने की बात पर सब बगले झांकने लगे। बेमानी तर्क दिया गया कि महिलाएं नहीं जीत पाएंगी और पार्टी का नुकसान हो जाएगा। इस तर्क का आधार राजनीति को सिर्फ दबंग और अपराधी तत्वों का धंधा मानना रहा। इस तर्क से अच्छे और बेहतर लोगों के राजनीति में आने का रास्ता रूकता है। तैंतीस प्रतिशत ना सही फिऱ भी सबसे ज्यादा टिकट सोनिया गांधी की पार्टी ने महिलाओ को दिया। नतीजा सामने है। सबसे ज्यादा 19 महिला सांसद कांग्रेस की ही जीतकर आई हैं। इसमें बंसीलाल की पोती श्रुति चौधरी, नाथुराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा और अब्दुल गनी खान की नातिन मौसम नूर भी शामिल हैं। तीनों ने पहली बार संसद का रास्ता देखा है।
संसद में जो महिला सांसद चुनकर पहुंची हैं उनमें 40 से 60 साल की उम्र के सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा है. 56.90 फीसदी महिला सांसद इसी उम्र के बीच हैं. हालांकि पिछली संसद के मुकाबले इस बार संसद में युवा महिला सांसद ज्यादा चुनकर आयी है. पिछली लोकसभा में 40 साल से कम उम्र की महिला सांसदों का प्रतिशत 17 था जो इस बार बढ़कर 29.30 हो गया है. संसद में महिला सांसदों और खासकर युवा महिला सांसदों की बढ़ती तादात निश्चित रूप से सुकून देनवाला है.
सत्ता में आने का सपना चकनाचूर होने बिफरी बीजेपी को भी फायदा हुआ है। बीजेपी कांग्रेस की मुकाबले में कम महिला उम्मीद्बार उतारी थी। फिर भी संसद में बीजेपी की 11 महिला सांसद नजर आएंगी। सीपीएम के मजबूत गढ़ को ढहाने में लगी ममता बनर्जी की पार्टी से 5 महिला सांसद जीती है, मायावती की बसपा से 4 और जनता दल से दो महिला सांसद जीतकर आई। संसद में रेणुका चौधरी की गैर मौजूदगी से महिला आरक्षण की धार को बड़ा नुकसान जरूर होता दिख रहा है। रेणुका चौधरी चुनाव हार गयी हैं। फिर भी संतोष इस बात से जरूर किया जा सकता है कि इस बार महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बेहतर आसार दिख रहे है। उम्मीद पिछली लोकसभा से थी। सोनिया गांधी के यूपीए अध्यक्ष के तौर पर इसका पैरोकार होना,बीजेपी की सुष्मा स्वराज का सबसे मुखर आवाज बनना और वामपंथियों में से वृंदा कारत का कमान सम्हालना महिला आरक्षण के बेहतर आसार थे। संयोग की बात है कि आसार अब भी बन रहे हैं। विरोधियों का मुंह बंद होना चाहिए। खासकर पंचायतों में महिला आरक्षण ने समाज की तस्वीर बदलने की असरदार शुरुआत की है। गांव गांव में महिलाओं की पूछ बढ़ी है। अगुवा के तौर पर स्थापित हो रही हैं महिला। इससे कई जड़ कुरीतियों और समस्याओं का हल होता दिख रहा है।
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



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Aapla lekh mahila vidheyak ki taraf dhyan kheenchta hai. aapne ache sawal uthaye hain. mahilaon ko rajneeti main sehbhagi banane ka mamla vyavasthagat issue hai. aap to janti hain ki khali kanoon bana dene se vyavstha nahin badalti. uske liye nirantar prayaas bhi kiye jate hain. jis raftaar se yeh prayaas ho rahe hain uski gati chahe dheemi hai per yakeenan nirashajanak to bilkul nahin. aaj 10 hain to kal aur badhengi.
yadi bura na mane to ek baat jaroor kehna chunga ki mahilayein apne haq lene ke mamle main bhi utni saksham nahin. main ek do ki nahin desh ki aadhi duniya ki baat kar raha hoon. aaj tak kisi five star hotel main mahila ko chief shef nahin banaya jata jabki khana pakana mahilayon ke matlab ka kaam hai. iska kaaran bhi jaan lein. 40 saal se chulha chowka karti aa rahi mahila har roj sabzi ya daal banane ke baad ghar walon ka certificate chahti hai ki dekhiye namak-mirch theek hai na. yeh lake of confidence ki misal hai. aapka prayaas acha va nek hai iske liye badhayi
aap ka lakh padh kar mahilao ko apni soch main badlaw lane ki zarurat hai...
aap isi tarha mahilao ki hosla afzai karti rahe...
bhuit dua aap ke liye.
bhavishya main zarur likhnge!!
aap ka dhanyavaad!!
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