स्पैम ईमेल बंद हो तो रोशन हो जाएं 24 लाख घर
कंप्यूटर का इस्तेमाल करने वाले लोग मैकेफी के नाम से वाकिफ होंगे। एंटी वायरस बनाने वाली कंपनियों में मैकेफी एक बड़ा नाम है। इसने हाल ही में एक अध्ययन जारी किया। इसमें यह बताया गया है कि ईमेल के जरिए भेजे जाने वाले अनचाहे संदेशों यानी स्पैम का पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। मैकेफी ने अनुमान लगाया है कि दुनिया भर में जितने स्पैम एक साल में भेजे जाते हैं, उसे बनाने, भेजने और रोकने में जितनी ऊर्जा खर्च होती है उससे 24 लाख घरों की बिजली की जरूरत को पूरा किया जा सकता है, या फिर 31 लाख कारों को चलाया जा सकता है।
स्पैम का सामना हर ईमेल इस्तेमाल करने वाले को करना पड़ता है। बताते चलें कि स्पैम वैसे संदेश को कहते हैं जो किसी अनजान व्यक्ति या समूह द्वारा किसी ईमेल प्रयोक्ता को भेजा जाता है। ज्यादातर स्पैम किसी उत्पाद के विज्ञापन के मकसद से भेजे जाते हैं। आजकल तो ठगी के लिए भी जमकर स्पैम भेजे रहे हैं। इनमें किसी लॉटरी निकलने की बात कहकर निजी जानकारियां मांगी जाती हैं और फिर उनका गलत इस्तेमाल होता है। स्पैम के जरिए कई तरह के साइबर अपराध को अंजाम दिया जा रहा है।
वैसे स्पैम भेजना भी एक तरह का अपराध है। पर जाने-अनजाने में स्पैम भेजने वाले इसकी वजह से पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान से गाफिल मालूम पड़ते हैं। यही वजह है कि स्पैम की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोतरी होती जा रही है। मैकेफी ने जो अध्ययन किया है उसके मुताबिक ईमेल इस्तेमाल करने वाला एक पेशेवर व्यक्ति 2008 में औसतन 131 किलो कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार है। इसमें से 22 फीसद कार्बन उत्सर्जन के लिए अनचाहे संदेश यानी स्पैम जिम्मेवार हैं। एक स्पैम की वजह से 0.3 ग्राम कार्बन का उत्सर्जन होता है। इस कंपनी के मुताबिक पिछले साल पूरी दुनिया में 62 अरब स्पैम यहां से वहां भेजे गए। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिर्फ एक साल में कितना कार्बन स्पैम की वजह से पैदा हुआ।
दुनिया में हर तरफ पर्यावरण की बिगड़ती हालत को लेकर चिंता जताई जा रही है। पर्यावरण की बिगड़ती सेहत और प्रदूशण को कम करने के मकसद से कई जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा सकारात्मक पहल की उम्मीद पढ़े-लिखे लोगों से की जाती है। कहना न होगा कि कंप्यूटर का इस्तेमाल ऐसे लोग ही करते हैं और स्पैम यहां से वहां भेजने का काम भी यही लोग करते हैं। ये एक सच्चाई कि आज ईमेल सेवा एक जरूरत बन गई है। पर किसी भी सुविधा के उपयोग और दुरुपयोग में फर्क होता है। सही मायने में कहा जाए तो स्पैम करना इस सुविधा का दुरुपयोग ही है। इसलिए पर्यावरण के खातिर ही सही स्पैम भेजने की प्रवृत्ति पर लगाम लगनी चाहिए।
ईमेल सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों ने स्पैम पर लगाम कसने के मकसद से कुछ कवायद भी की है। पर अभी तक उनकी कोशिशें पूरी तरह से रंग लाती नहीं दिख रही हैं। कई ईमेल सेवा प्रदाताओं ने ऐसी तकनीक अपनाई जो अनचाहे संदेशों को लोगों के पास पहुंचने से रोके। पर वे इसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। मैकेफी की रपट के मुताबिक स्पैम को रोकने की तकनीक इस पूरी प्रक्रिया में खपत होने वाली ऊर्जा के महज सोलह फीसदी का ही बचत कर पाती है। इसके बावजूद स्पैम रोकने के लिए और भी आधुनिक तकनीक विकसित करने की कवायद जारी है।
इस अध्ययन में ये भी बताया गया है कि जिन देशों में इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल होता है उन देशों में प्रति ईमेल प्रयोक्ता कार्बन का उत्सर्जन भी अधिक होता है। इस मामले में भी बाजी अमेरिका ने मारी है। पूरी दुनिया को कार्बन उत्सर्जन के मामले में आंख दिखाते रहने वाले अमेरिका के ईमेल प्रयोक्ता सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार हैं। रपट के मुताबिक अमेरिका में ईमेल इस्तेमाल करने वाला एक व्यक्ति स्पेन के एक ईमेल प्रयोक्ता की तुलना में 38 गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार है। भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है। यहां भी इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है और उसी तेजी से ईमेल के प्रयोग की वजह से कार्बन उत्सर्जन भी। मैकेफी के अध्ययन में ईमेल की वजह से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में अमेरिका और भारत के अलावा ब्राजील, ब्रिटेन, कनाडा और चीन शामिल है। ईमेल से कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में आस्टेलिया, जर्मनी, फ्रांस, मैक्सिको और स्पेन शामिल हैं।
ईमेल सुविधा का इस्तेमाल करने वालों के मन में ये सवाल उठ सकता है कि वे जब कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं तो उस वक्त तो कोई गैस वगैरह निकलती नहीं है तो फिर प्रदूशण कैसे फैलता है? दरअसल, हर कंप्यूटर या जो सुविधा उसके जरिए जो सुविधा दी जा रही है उसमें ऊर्जा की खपत होती है। इस ऊर्जा का उत्पादन कहीं न कहीं होता है। इस ऊर्जा के उत्पादन के दौरान कार्बन का उत्सर्जन होता है। जो पर्यावरण की सेहत के लिए नुकसानदेह है। अब दुनिया में यह चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है कि ऊर्जा और उसका इस्तेमाल जिस काम में हो रहा है उसके आधार पर कार्बन उत्सर्जन का लेखा-जोखा तैयार हो। इसी कड़ी में स्पैम और ईमेल के जरिए होने वाले कार्बन उत्सर्जन का हिसाब तैयार किया गया है।
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