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जेपी जिन्दा होते तो नीतीश के खिलाफ ही आंदोलन छेड़ देते

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जिस 5 जून को सारा देश संपूर्ण क्रांति दिवस के रूप में याद करता है उसे नीतीश कुमार ने नया नाम दे दिया है। पेंशन दिवस। आप जानते है कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। उन्हें तुलनात्मक रूप में बेहतर मुख्यमंत्री लोग मान रहे हैं। वे शासन और प्रशासन के मापदंड बदल रहे हैं। भले हीं कोई नया काम न कर रहे हों पर उन्हें इस बात के लिए जाना जा रहा है कि अपने राज्य को वे अराजकता के भंवर से निकाल लाए हैं। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं हैं। उस नीतीश कुमार को जब बड़ी रेखा खींचने के लिए अधिक सोच विचार करना चाहिए था तब वे कांग्रेसियों के पीटे पिटाए नुस्खे को आजमाने लगे यह बहुत अफसोसनाक है। उन्होंने जेपी आंदोलन सम्मान पेंशन की घोषणा कर टुकड़े फेंकने की राजनीति शुरू कर दी है। यह न तो जेपी आंदोलन का सम्मान है और न हीं उससे जुड़े लोगों का।

इतना ही नहीं है, और भी सवाल हैं। पहला यह कि क्या जेपी आंदोलन को स्वाधीनता संग्राम का दर्जा दिया जाएगा? किसी भी राजनीतिक व्याकरण से  देखने पर यह नहीं कहा जा सकता कि 1974 में  जिस आंदोलन को कुछ बुनियादी मांगो से छात्रो ने शुरू किया वह  मुक्ति का आंदोलन था। गुलामी से मुक्ति पहले ही हो चुकी थी। वह मूलत: छात्र आंदोलन था। जिसकी प्रकृति राजनीतिक थी। छात्रों के आग्रह पर जेपी ने जब नैतृत्व संभाला तो उस आंदोलन में नए आयाम जुडे़ और उसे राष्ट्रीय मान्यता मिली। अगर इमरजंसी का दखल न हुआ होता तो वह आंदोलन विकल्प की राह पर चल पड़ता। उसकी मंजिल होती एक नई राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था। इस संभावना से वह आंदोलन भरपूर था। यह भी एक वजह थी कि उससे वे लोग भी जुड़े जो कांग्रेस को अंग्रेजी औपनिवेशिकता का वाहक महसूस करने लगे थे। वैसे जेपी आंदोलन को एक राज्य में नहीं बांधा जा सकता। वह सचमुच राष्ट्रीय आंदोलन था। नीतीश कुमार की घोषणा से उसकी महिमा कम हुई है।

सामाजिक न्याय का आंदोलन जब जातिवादी रंग में ढलने लगा तब नीतीश कुमार ने एक पहल की। वह सराहनीय थी। उसे देश और बिहार ने सामाजिक समरसता की पहचान दी। नीतीश कुमार जहां पहुंचे हैं वह उसी का एक पड़ाव है। जिसे वे मंजिल समझ कर ऐसी उटपटांग पेंशन घोषणा करने लगे हैं।जो राजनीतिक नेता अपना स्वधर्म भूलने लगे वह गलती को सही और सही को गलत समझने लगता है। कुछ ऐसा ही बिहार के मुख्यमंत्री अपनी घोषणा से आभास दे रहे हैं। यह सचमच आभास है या वे परस्पर विरोधी खींचतान के जंजाल में फंसने जा रहे हैं इसका फैसला अभी नहीं किया जा सकता। इतना ही कहा जा सकता है कि वे पेंशन देने की घोषणा कर सामाजिक विषमता को बढ़ाएगे।  यह समझ लेने की जरूरत है कि किस तरह उनके फैसले से विषमता बढ़ेगी। आंदोलन के कार्यकर्ताओं को वे सरकारी भाषा में अलग-अलग श्रेणियों में बाटेंगे। उनकी सरकार जेल बंदियों के मूल्य का इस आधार पर निर्धारण करेगी कि कौन कितने दिन जेल रहा। इस पर कोहराम मचेगा और वह व्यर्थ नहीं जाएगा। क्या किसी आंदोलन का आंकलन इस आधार पर होना चाहिए?

नीतीश कुमार जेपी आंदोलन में शामिल लोंगो को ही पेंशन क्यों देना चाहते हैं? क्या वे उन्हीं लोंगो के मुख्यमंत्री हैं जो जेपी आंदोलन में थे? उन्हें यह याद रखना चाहिए कि वे अपनी घोषणा से उन लोंगो का निरादर कर रहे हैं जो जेपी आंदोलन के बाद इस धरती पर आए हैं। कम से कम दो पीढ़ी नई आ गई हैं। तीसरी उसकी कतार में खड़ी है। जब वे बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं तो इन नई पीढ़ियों के प्रति भी उनकी जवाबदेही बनती हैं। जेपी आंदोलन में जिन लोंगो ने हिस्सा लिया था वे पुरुषार्थी थे। कुछ ऐसे भी रहे होंगे जिन्होंने उस समय की राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियों के लिए काम किया होगा। उसका मुआवजा उनको तभी मिल गया होगा। ऐसे भी लोंगो को नीतीश कुमार की सरकार दोहरा लाभ पहुंचाने जा रही है।

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किसी भी सरकार के ये बुनियादी काम होते हैं-नागरिकों को सुरक्षा देना, रोजगार देना और न्याय दिलाना, शिक्षा और समता मूलक समाज बनाने का प्रयास करना। इस कसौटी पर नीतीश कुमार की सरकार को परखना होगा। उनकी पेंशन योजना इसमें कहीं नहीं बैठती। वह खैरात बांटने का निर्णय है। एक मुख्यमंत्री को यह अधिकार कहां से मिल जाता है कि वह आम आदमी की गाढ़ी कमाई से बने खजाने को खैरात में लुटा दे। यह तो समझ में आता है कि नीतीश कुमार में चतुराई भरी करुणा है। वे उसे शासकीय चोला पहनाने लगे है।क्या यह  मानवीय भावना का राजनीतिक शोषण नहीं है? इसी चाल में से पेंशन देने का विचार निकला होगा। यह जितना सच है उतना ही यह भी सच होगा कि किसी दरबारी ने उनको सलाह दी होगी और वे इस फैसले को वोट के लिए माफिक समझ बैठे होंगे। बेहतर यही होगा कि नीतीश कुमार ऐसी सस्ती लोकप्रियता की फिसलन से बचें। अभी भी वक्त है। वे चाहे तो अपने फैसले पर पुनर्विचार करें।

मेरा ऐसा मानना है कि नीतीश कुमार के इस निर्णय पर देश के समझदार लोगों को सवाल उठाना चाहिए.नीतीश कुमार का यह निर्णय अपने प्रशंसकों को खुश करने का एक ऐसा निर्णय है जिसका असर समाज और राजनीतिक आंदोलनों पर बहुत बुरा होगा. मैं उम्मीद करता हूं कि जे पी आंदोलन के पुराने लोग नीतीश कुमार की इस चाल को समझेंगे और उनके इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठायेंगे. क्योंकि नीतिश कुमार का यह निर्णय किसी राजनीतिक आंदोलन के सरकारीकरण करने का षण्यंत्र है. बेहतर होगा कि नीतीश कुमार उस आंदोलन के मूल मकसद को पाने का प्रयास करें और टुकड़े फेंकने की राजनीति बंद करें. यह तो हो सकता है कि आंदोलन में शामिल रहे लोगों में कुछ लोगों को वास्तव में गुजारे भत्ते की जरूरत हो. बिहार सरकार उनके लिए कुछ करे तो समझ में आता है लेकिन पेंशन देने की व्यवस्था सिरे से खारिज किये जाने की जरूरत है. जहां तक मैं जेपी को समझ सका था अगर आज वे होते और नीतिश के इस निर्णय को सुनते तो नीतिश कुमार के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते. कम से कम खुद जेपी बिहार आंदोलन का ऐसा अनादर बर्दाश्त नहीं कर पाते.

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Amitabh k sINGH on 08 June, 2009 00:29;07
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Yes, I am totally agree with this and i hope this matter should go to Mr Nitish. he should rethink otherwise it will hit his growing image
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sunil kumar pandey on 08 June, 2009 02:02;37
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सत्ता में आने के बाद नितीश कुमार जी ने कई सारे निर्णय मूर्खता पूर्ण लिए हैं. शिक्षकों के नियोजन का हीं जो तरीका था, निहायत गलत था. हाँ अगर वोट के हिसाब से देखें तो वे सही जा रहे हैं. वैसे भी मूलभूत समस्याओं के तरफ देखने की फुरसत किसको है, और साहब उससे वोट भी तो नहीं मिलते.........
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anup on 10 June, 2009 03:07;56
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phir bhi.....lalu se to theek hai.....bahut badiya hai......
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image आर बी राय पत्रकार. छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिन्दी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरूष समझे जाते हैं. वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के संपादक और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक. संपर्क- 09350972403
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