खो गया 'कामदेव का अपना वसंत रितु का सपना'
वह 1994 जाडो की रात थी , जब मेरा सामना हबीब साहब से हुआ था, दिन याद नही है...थियेटर का शौक था, किसी ग्रुप में जाओ तो दाखिला लेने में मारामारी...दिल्ली आने पर कोई थियेटर वाला लेने का आसानी से तैयार होता नही था, हालांकि ज्यादातर थियेटर वाले चिरकुट ही लगा करते थे... बातें इतनी बडी कि नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी या फिर अनुपम खेर उन्ही से सीख कर गये है...तभी किसी दोस्त ने बताया कि हबीब साहब का ग्रुप भी है...उनके यंहा कोशिश की जा सकती है...
पहले तो भरोसा ही नही हुआ कि हबीब तनवीर यंहा दिल्ली में होंगे...फिर हुआ भी तो ये यकीन नही कि वो अंदर भी आने देंगे कि नही...लेकिन फिर भी कदम बढ गये...जाडो की एक रात को पंहुच गये उनके यंहा...दिल्ली के बेर सराय में एक टूटे से घर में वो रिर्हसल किया करते थे...भीड लगी थी...ज्यादातर उनके ही एक्टर्स थे...छत्तीसगढी कलाकार...माशाअल्लाह क्या एक्टर्स हुआ करते थे...हम 5 लडके थे...जो उनके ग्रुप को ज्वाइन करने के इरादे से गये थे...उस टूटे से मकान को रोशन करने की जद्दोजहद कर रहा था एक बल्ब ...उसी के आंगन में कोई 20 22 लोग बैठे थे...कुछ संगीत कार एक कुर्सी के पास थे...पूरे परिसर में सिर्फ एक कुर्सी ..बाकी सब दरी पर बैठे थे...थोडी ही देर में एक कमजोर लेकिन चुस्त शख्स जो तकरीबन 75 साल का होगा...वो दाखिल होता है...उनके आते ही सब शांत...मेरे किसी साथी ने मेरा हाथ दबा कर बताया था कि यही है..हबीब साहब...मुझे वो पहली नजर में कम्यूनिस्ट, इंटलैक्च्युल लगे...कंधे पर एक लैदर बैग...हाथ में पाइप....व्यक्तित्व पसंद आया...आये , बैठे...कुछ हंसी मजाक...फिर हमारी तरफ मखातिब...धीमी आबाज़ में पूछा...कि हां भाई किस लिये आये हो...मेरे साथ के लडके ने उनसे फोन पर बात कर रखी थी...लिहाजा वो पहचान गये...बोले कि आईये...देखिये रिर्हसल...समझिये...फिर देखेंगे...बस...फिर उनका रिर्हसल शुरू हो गया....कामदेव का अपना वसंत रितु का सपना... ये नाटक था, जिसकी रिर्हसल पर वो लगे थे.नाटक हिंदी और छत्तीसगढी में था क्योंकि ज्यादातर कलाकार उसी इलाके के थे...लिहाजा वो अपनी बोली बोलने में लगे थे...कोई लिखित स्क्रिप्ट नही...सब मुंह ज़बानी...मेरे को समझने में थोडी मेहनत करनी पडती थी...लेकिन नाटक इतना मजेदार कि गज़ब का बांध कर रखता था...3 घंटे कंहा निकल जाते थे...पता ही नही चलता था...
रात को 11 बजे बस मिलनें में भी दिक्कत होती थी...मैं उन दिनो गोविंदपुरी में रहा करता था...जेएनयू से नेहरू प्लेस तक आनें में बडे पापड बेलने पडते थे...आटो के पैसे होते नही थे...लेकिन एक नाटक दूसरा हबीब साहब की पर्सनाल्टी ने जोश बनाये रखा...करीब 10 या 12 दिन के बाद अचानक एक दिन रिर्हसल के बीचो बीच उन्होने हम 5 लडको को ...एक सीन दिया...और डायलाग बोलने को कहा...मुझे तो जैसे कि लकवा मार गया...हलक सूख गया...इतने मझे कलाकारो के सामनें उन्ही की लाईन या कहे कि उन्ही की एक्टिंग...मुझे लगा कि मारे गये गुलफाम...पता नही मैने क्या बोला...क्या कहा...लेकिन इतना यंकी था कि बहुत बुरा किया था...5 मिनट के बाद उन्होने हमको बैठ जाने को कहा...और काम मे लग गये...हमे लगा कि आज से खेल खत्म...यंहा आना अब नही होगा...रिर्हसल के आखिरी में चलते वक्त उन्होने हम 5 लोगो में से दो को इशारा किया...कि आप आ सकते है....बाकी कि जरूरत नही है...उन दो में से एक में भी था...मुझे यंकी ही नही हुआ कि मेरी क्या बात उनको पंसद आयी...लेकिन बहुत खुशी मिली...दूसरे दिन से मेरी पहचान ग्रुप मे ज्यादा होने लगी...और मैं इस तरह नया थियेटर से जुड गया.
फिर जब तक वो दिल्ली रहे मै नया थियेटर से जुडा रहा.कई शहरो में जाकर शो किये.खासकर पुणे जाकर थियेटर फैस्टीवल में हिस्सा लेना यादगार अनुभव था.हबीब साहब को जितना मैं जान पाया कि वो इस देश का वो चेहरा थे जो गंगा जमुनी तहजीब को दर्शाता है.ग़जब के सैक्यूलर और इंटलैक्चुअल.खुद मुस्लिम घऱ मे पैदा हुये लेकिन शादी हिंदू से की.नाटक शुरू होने से पहले उनके कलाकार स्टेज पर जाकर पूजा करते थे भजन गाकर नारियल फोडते थे, आरती देते थे.वो सब हबीब साहब के साथ करते थे.धर्म कभी आड़े नही आया...या कहे कि पाखंड नही आया.ये धर्म के प्रति उनका नजरिया ही था या कहे कि किसी भी नाटककार का होना चाहिये कि पाखंड को रख सके कि पोंगा पंडित में उनके नाटक को लेकर हो हल्ला हुआ. देख रहे है नैन, चरनदास चोर..या फिर बेहद मजेदार गांव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद में उनके धर्म के ठेकेदारो पर कटाक्ष गज़ब की तालियां लाते थे...लोग उनके आगरा बाजार की बहुत बात करते है...लेकिन जिस लाहौर नही देख्य वो जन्मया नही...को भूल जाते है...मुझे ये समझने मे काफी वक्त लगा कि हबीब साहब आखिर नाटक का चयन करते कैसे है या उसको एडप्ट कैसे कर लेते है.जिन लोगो ने उनका नाटक कामदेव का अपना वसंत रितु का सपना देखा है वो याद करेगें कि उस नाटक के डायलाग कितने हिदुस्तानी लेकिन कितने प्रासंगिक जिसने शैक्सपीयर के मिडसमर नाइट ड्रीम को जरा भी नही बदला.लोग उनकी ब्लाकिंग की भी बात करते है या सगीत की लेकिन किसी ने भी यदि उनको एक्टिंग करते देखा है खासकर चरनदास चोर मे पुलिस वाले की भूमिका में तो कहेगा कि क्या कलाकार थे.
मेरा काम छोटे मोटे रोल, पूरे नाटक में दो या तीन एंट्री बस बाकी का काम बैक स्टेज को संभालना.मैं उनकी मंडली का नॉन पेड एक्टर था...लेकिन कोई शिकायत नही...लेकिन उनके साथ स्टेज शेयर कर लेना चाहे चंद सैंकड के लिये ही सही लगता था कि बस मिल गया..जो मिलना था...वो जब सरकार की बेरूखी के चलते दिल्ली छोडकर गये. तो लगा कि कुछ छिन रहा है मैं भोपाल जा नही सकता था लिहाजा साथ छूट गया.फिर मीडिया में आना हुआ लेकिन जब भी पता लगता कि हबीब साहब दिल्ली में है तो पंहुच जाता था अब वो चले गये. मोनिका जी 3 साल पहले ही चली गयी थी..पता नही क्या होगा नया थियेटर का...हालांकि उनकी बेटी नगीन है.लेकिन हबीब साहब नही है.कौन पैदा करेगा वो पंच, वो लाफ्टर, और वो प्रभाव जो नया थियेटर की पहचान थे...इतना ही कहूंगा कि हबीब साहब वी विल मिस यू.एंड योर थियेटर.
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Body
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- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
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- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
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