बुरे वायरस की खैर नहीं, आ रहे हैं अच्छे वायरस
वायरस-एमडी कारपोरेशन के प्रमुख साइरस पेईकारी का सुझाव है कि कंप्यूटर वायरसों का मुकाबला `जैसे को तैसा` के अंदाज में किया जाना चाहिए, यानी वायरस का जवाब वायरस से।
वायरस-एमडी कारपोरेशन के प्रमुख साइरस पेईकारी का सुझाव है कि कंप्यूटर वायरसों का मुकाबला `जैसे को तैसा` के अंदाज में किया जाना चाहिए, यानी वायरस का जवाब वायरस से। अगर कम्प्यूटरों को नुकसान पहुंचाने के लिए बुरे वायरस पैदा किए जा सकते हैं तो कंप्यूटरों के भले के लिए अच्छे वायरस क्यों नहीं? आखिरकार वायरस कंप्यूटरों को वैसे ही प्रभावित करते हैं जैसे कि जैविक वायरस हमारे शरीर को। तो जिस तरह चेचक और प्लेग जैसे वायरसों का इलाज करने के लिए उन्हीं का प्रयोग कर टीके बनाए गए क्या वही प्रक्रिया कंप्यूटिंग के क्षेत्र में नहीं अपनाई जा सकती?ऐसा वाकई संभव है। अच्छे वायरसों के कुछ प्रयोग किए भी जा चुके हैं और सफल रहे हैं। मिसाल के तौर पर कुछ समय पहले `चीज वार्म` नामक एक अच्छा वायरस कुछ लिनक्स आधारित कंप्यूटरों में देखा गया था। इस वायरस ने इन कंप्यूटरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उनमें मौजूद एक तकनीकी कमी को ठीक कर दिया जिसका दुरुपयोग हैकर्स के हाथों किया जा सकता था। एक अन्य हैकर ने ऐसा वायरस बनाया है जिसका मकसद इंटरनेट को बाल-अश्लीलता (चाइल्ड पोर्नोग्राफी) से मुक्ति दिलाना है। `नोपेड` नामक यह वायरस जिस कंप्यूटर में भी जाता है उसकी सारी इमेज फाइलों को स्कैन करता है और अगर उसे बच्चों के अश्लील फोटोग्राफ मिलें तो उन्हें डिलीट कर देता है। यह वायरस एक ईमेल संदेश के रूप में आता है जिसका विषय होता है- आइए, दुनिया को बाल-अश्लीलता से मुक्ति दिलाएं।
पिछले कुछ वर्षों में कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया में `अच्छे वायरसों` के मुद्दे पर काफी बहस हुई है। चूंकि वायरस एक कंप्यूटर प्रोग्राम या सॉफ्टवेयर है, इसलिए इससे किसी भी तरह का काम लिया जा सकता है। अब यह वायरस निर्माता की समझ और नीयत पर निर्भर है कि वह इससे हानि पहुंचाना चाहता है या इसे किसी अच्छे प्रयोग में लेना चाहता है। इसे देखते हुए, सैद्धांतिक रूप से यह संभव है कि वायरस का प्रयोग अन्य वायरसों को नष्ट करने या कंप्यूटरों में को अभेद्य बनाने में भी किया जा सकता है। वायरस का प्रयोग हानिकारक वायरसों के पीछे एक जासूस के रूप में भी किया जा सकता है। जहां जहां हानिकारक वायरस पहुंचे, वहीं उसे नष्ट करने वाला अच्छा वायरस भी पहुंच जाए और उसके सभी हानिकारक प्रभावों को समाप्त कर दे। जिन कंप्यूटरों में अच्छा वायरस पहले से मौजूद है उनमें बुरे वायरसों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया जाए। हमें पता भी नहीं चलेगा कि हमारे कंप्यूटर में कब दो किस्म के वायरसों के बीच युद्ध हुआ और कब बुरे वायरसों का सफाया कर दिया गया। अच्छे वायरस इंटरनेट पर भी स्थान-स्थान पर द्वारपाल के रूप में तैनात रहेंगे और बुरे वायरसों को आगे बढ़ने से पहले ही नष्ट कर देंगे। जरा सोचिए, ऐसा हो जाए तो क्या वायरसों की समस्या हमेशा के लिए खत्म नहीं हो जाएगी?
असल में वायरस की समस्या को शुरू से किसी कंप्यूटर विशेष या नेटवर्क की समस्या के तौर पर लिया गया है। इसे समग्र विश्व की साझा समस्या के रूप में नहीं लिया गया। इसीलिए वायरसों का निदान भी खोजा गया तो छोटा। यानी ऐसा समाधान जो सिर्फ एक कंप्यूटर या कंप्यूटर नेटवर्क को वायरसों से सुरक्षित करे। क्या ऐसा एंटी वायरस नहीं बन सकता जो पूरे इंटरनेट को एक इकाई के रूप में लेते हुए वायरस से सुरक्षित कर दे? अगर वायरसों का इंटरनेट पर प्रवेश ही नहीं हो सकेगा तो वे आम कंप्यूटर यूजर तक कैसे पहुंचेंगे? कोई एंटी-वायरस कंपनी शायद ही इस दिशा में काम करने को तैयार होगी क्योंकि ऐसा करने पर तो उसका धंधा ही चौपट हो जाएगा। आज एक ही वायरस लाखों कंप्यूटरों को प्रभावित करता है और उसी के अनुरूप एंटी वायरस सॉफ्टवेयरों की मांग पैदा होती है। अगर पूरी इंटरनेट को ही वायरस मुक्त कर दिया गया तो ये कंपनियां बेचेंगी क्या? एंटी वायरस कंपनियों के तो हित में ही यही है कि वायरसों का अधिकाधिक प्रसार हो। बहरहाल, अच्छे वायरस की उपरोक्त अवधारणा पूरे इंटरनेट को वायरस मुक्त करने की दिशा में पहला कदम हो सकती है।
अच्छे वायरसों की जो परिकल्पनाएं अब तक की गई हैं, वे चार तरह की हैं- पहले ऐसे वायरस जो कंप्यूटरों में दूसरे वायरसों को ढूंढने और नष्ट करने में सक्षम होंगे। दूसरे वे, जो आपकी फाइलों को कम्प्रेस (संपीड़ित) कर सुरक्षित कर देंगे ताकि उन्हें कोई वायरस संक्रमित न कर सके। तीसरे अच्छे वायरस वे होंगे जो आपकी पूरी हार्ड डिस्क को एनक्रिप्ट (डेटा को कूट भाषा में बदलना) कर देंगे ताकि बुरे वायरस इस डेटा को पढ़ न सकें और उन पर हमला न कर सकें। अच्छे वायरसों की चौथी श्रेणी ऐसी है जो आपके कंप्यूटर और नेटवर्क की देखरेख करेंगे, यानी मुस्तैद सैनिकों की तरह बुरे वायरसों के आने का इंतजार करेंगे और आते ही उन्हें नष्ट कर देंगे। यदि इन्हें आपके कंप्यूटर में छोटी-मोटी दिôत नजर आई जो डेटा की सुरक्षा के लिहाज से जोखिमभरी हो सकती है तो ये उसका समाधान भी कर देंगे। यानी मैकेनिक या इंजीनियर की भी जरूरत नहीं।
अच्छे कंप्यूटर वायरस शायद जल्दी ही देखने को मिलें। समस्या यह है कि कोई कंपनी यह काम करने को तैयार नहीं है और ऐसे वायरस बनाने वालों का कोई संगठन नहीं है जो इस दिशा में किए जाने वाले प्रयासों में समन्वय करे। बहरहाल, ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की तरह आगे चलकर इस दिशा में भी काम जरूर होगा क्योंकि इंटरनेट और आईटी को पूरी तरह सुरक्षित बनाने का लक्ष्य विश्व भर के कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं का साझा लक्ष्य है।
Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Author info
Rate this article
More from बात करामात
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
latest on visfot.com
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?
1
Displaying
1 - 10
of
3116
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित



del.icio.us
Digg
घुघूती बासूती
Post your comment