गगन घटा गहरानी हो-2
इकानवे के बाद रईस हुए मुटियाए और इतराए लोगों के लिए इस बात का कोई मतलब नहीं कि गांधी, सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे गैरहिंदी नेताओं ने संकल्प लिया और आंदोलन चलाया था कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए क्योंकि वह राष्ट्र हो नहीं सकता जिसकी अपनी भाषा न हो। नए इंडिया के लोग एक भूमंडलीकृत विश्व के नागरिक हैं। वे राष्ट्रभाषा जैसी संकीर्ण भाषा क्यों बोलें?
उन्हें तो विश्व भाषा में काम करना है। इसीलिए भारत के पूंजीपति, उद्योगपति, व्यापारी ओर कुशल कारिंदे अंग्रेजी बरतेंगे और अमेरिकी जीवन जिएंगे। भारत के नए पूंजीपतियों, व्यापारियों ओर मध्यवर्ग के कुशल कारिदों का अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्री मित्र मुझे चेताते हैं कि भारतीय पूंजी दुनिया पर छा भी जाए तो भी ये अंग्रेजी और अमेरिका की जी हजूरी नहीं छोड़ेंगे। गांधी ने `हिंद स्वराज´ में कोई यों नहीं कहा कि `अंग्रेजों ने भारत को नहीं जीता। हमने खुद भारत उन्हें दे दिया है।...वे तो सारी दुनिया को अपनी चीजों के विशाल बाजार में बदल देना चाहते हैं। सच है कि वे ऐसा नहीं कर सकते लेकिन इसमें दोष उनका नहीं है।´ याद रखिए के मनमोहन सिंह ने आक्सफोर्ड के भाषण में अंग्रेजों को कैसे आश्वस्त किया था। `आपका वह साम्राज्य अब भले ही न रहा हो जिस पर सूर्य कभी डूबता न था। लेकिन आपकी भाषा अंग्रेजी बोलने वालों पर आज भी सूर्य डूबता नहीं।´ यह मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री है जिसके ज्यादातर लोगों और राज की भाषा हिंदी है। कभी आपने इस प्रधानमंत्री को भारत में कहते सुना कि हिंदी दुनिया भर में बोली जाती है और हिंदी बोलने वालों पर सूर्य कभी डूबता नहीं।
भारत के नए भद्रलोक के बारे में यह सही हो सकता है। लेकिन चीन ने न तो अपनी भाषा छोड़ी है न उसे लेकर उसके मन में कोई हीन भावना है। काम चलाने के लिए वह अंग्रेजी सीखता और बरतता है। लेकिन वह कभी किसी विदेशी शक्ति का गुलाम नहीं रहा और इसलिए पुराने शासकों की भाषा और राज की उसमें कोई ललक नहीं है। पूंजी के भूमंडलीकरण और खुले बाजार को भी उसने अपनी शर्तों पर अपने ढंग से स्वीकार किया है। उसने अपने करोड़ों लोगों को नई अर्थव्यवस्था में उत्पादन में लगाया है इसलिए उसके उत्पाद दुनिया भर के बाजारों में होड़ करके टिके रहते हैं। उसकी अर्थव्यवस्था का मूलाधार बहुत विशाल और अपने आम लोगों को उत्पादन की प्रक्रिया में शामिल करके बना है। भारत जैसा नहीं जहां कसम तो `इनक्लूजिव ग्रोथ´ की खाई जाती है, पर नई अर्थव्यवस्था में लोग सफेद कालंर वाले ही लगे हैं। वह भूमंडलीकरण के लाभ लेते हैं और उन्हीं के हित इस ब्रान्हमणवादी व्यवस्था में हैं जिसे वे बड़ी बेरहमी ओर घमंड से चलाए जा रहे हैं, और देश के ज्यादातर लोग अगर इससे बाहर हैं और पीछे छूट रहे हैं तो उनकी बला से। वे तो अपने को दुनिया के रईस और कुशल लोगों के साथ भूमंडलीकृत कर रहे हैं। नया इंडिया योग्य, कुशल, चतुर और साहसी लोगों का है।
काहिल और जाहिल भारत अगर कंगाल और भूखा-नंगा है तो खुद अपनी अकर्मण्यता और भाग्य के कारण। उसे साथ लेने के लिए उड़ान भरने को तैयार खड़े इंडिया को रूकना नहीं चाहिए। इंडिया ही डूबते भारत को उबार सकता है। रिस कर ही अमीरी गरीबी को मिटाएगी इसलिए रईसी को निर्बाध और निर्द्वद्व बढ़ने दो। जैसा कि नए इंडिया के निर्माता मनमोहन सिंह कहते हैं। ग्रोथ किसी भी कीमत पर रूकनी नहीं चाहिए। यह ग्रोथ भले ही रत्ती भर नीचे न जाती हो न लोगों में वितरित होती हो। आप देखिए कि दुनिया में सबसे तेज अमीरी गरीब भारत में बढ़ रही है-23 प्रतिशत। चीन में बीस प्रतिशत। अमेरिका में चार और इंग्लैंड में दो प्रतिशत (टाइम्स ऑंफ इंडिया, 25 जून 2008)। चार साल पहले भारत में नौ खरबपति थे अब छप्पन हैं। बारह साल पहले भारत के सकल घरेलू उत्पाद में खरबपतियों का हिस्सा दो प्रतिशत था। अब बढ़ कर यह हिस्सा बाईस प्रतिशत हो गया है। अपनी अर्थव्यवस्था में अपने खरबपतियों के हिस्से को ठीक से समझना हो तो देखिए कि जिस खेती में देश के पैंसठ प्रतिशत से ज्यादा लोग लगे हुए हैं उसका सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा सन 2007-08 में सिर्फ 17.5 प्रतिशत था। यानी भारत की पूरी खेती और उसमें लगे सारे लोग जितना योगदान करते हैं उससे साढ़े चार प्रतिशत हिस्सा हमारे खरबपतियों का है। दुनिया में हमसे ज्यादा और बड़े खरबपति अब सिर्फ अमेरिका में हैं।
उसी तरह भारत में अमीरी बढ़ती रही तो अमेरिका और उसकी बनाई वित्तीय संस्थाओं का डर सही निकलेगा कि हम अमेरिका को पछाड़ देंगे। तब होड़ चीन और भारत में ही होगी। चीन में अमीरी और खरबपतियों की संख्या भले ही उतनी तेजी से न बढ़ रही हो लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था हमसे बड़ी है और उसमें ज्यादा लोग उत्पादन में लगे हुए हैं। उसकी वृिद्ध दर भी हमसे ज्यादा है। वह अमेरिका से दोस्ती गांठे हुए है लेकिन वहीं तक जहां वह उसकी समृिद्ध के काम आता है। भारत की तरह नहीं कि हम अमेरिका को मंदी से उबारने के लिए उससे आणविक करार कर लें ताकि उसकी अणु भटि्ठयां और ईंधन भारत खरीदे। चीन न कभी रूस का पिछलग्गू बना न आज अमेरिका का है। वह अपनी स्वतंत्रता ओर संप्रभुता बनाए रखता है। हमारी उसकी लड़ाई हो चुकी है जिसमें हम गफलत में मात खा गए। लेकिन हम अब भी अपने आम लोगों को अर्थव्यवस्था में विशाल उत्पादन में लगा सकें तो चीन को बराबरी की टक्कर दे सकते है। भारत की कमजोरी यही है कि उसकी अर्थव्यवस्था और नीतियां जनोन्मुखी होने के बजाय प्रभुवर्गीय और भद्रलोकीय हैं।
अमेरिका और अतंरराष्ट्रीय वित्तीय और आर्थिक संस्थानों के आकलन के अनुसार अगले दस-बीस वर्षों में चीन और भारत अमेरिका और यूरोप के देशों की पूंजी को पछाड़ कर दुनिया पर छा जाएं तो फिर भारत में अंग्रेजी और अमेरिका का दबदबा नहीं रहना है। तब क्या चीनी भाषा और जीवन पद्धति हावी हो जाएगी? या भारत चीन से निपटने के लिए अमेरिका और यूरोप से हाथ मिला लेगा? ऐसा हो भी तो भारत विनम्र सेवक की दीन-हीन भूमिका में नहीं होगा। सच है कि यह भारत गांधी का नहीं होगा लेकिन वह भारत विश्व बैंक के पेंशनभोगी मनमोहन सिंह और मॉन्टेक सिंह अहलुवालिया का भी नहीं होगा। तक विश्व बैंक भी उतनी बड़ी ताकत नहीं रह जाएगी जैसी कि अभी है। तो हमें सोचना यह है कि तब क्या हम हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में काम करने और उन्हें पूरी दुनिया में सारे कामकाज करने के लायक बनाए रख सकेंगे। जैसा हिंदी का अंग्रेजीकरण हो रहा है। जितना बड़ा बाजार हिंदी के पास है उतना तो अंग्रेजी को छोड़ कर किसी यूरोपीय भाषा के पास नहीं है। इसलिए हिंदी का सामना अंग्रेजी और चीनी से होगा। दो क्षेत्र हैं जिसमें होड़ होगी- अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी।
हम कितने ही दुखी हों पर अगले बीस-तीस वर्षों में यही दुनिया को चलाने वाली शक्तियां बनी रहनी हैं। व्यापार में भारत कभी पूरे यूरोप से आगे और दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति हुआ करता था। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आज हमारे पास सबसे बड़ी तो नहीं तो बहुत बड़ी फौज है। हम हिंदी और भारतीय भाषाओं का मृत्यृगीत लिख कर छाती कूटते हए उसे गाने के बजाय इस संटक को एक महान अवसर में क्यों नहीं बदलें। आज जो हिंदी है वह तो आगे फिर भी ऐसी ही नहीं रहनी है। व्यापार और प्रौद्योगिकी की उपकरण बनने पर वह और बदलेगी। लेकिन त बवह पुनर्नवा हो कर विश्व भाषा ही नहीं विश्व पर राज करने वाली भाषा हो सकती है। क्या हम अपना खेत संभालने उठ के खड़े नहीं हो सकते? लेकिन यह संभावना और चुनौती तो तब पैदा होगी जब नव उदार पूंजीवादी व्यवस्था का महाप्रयोग भारत में सफल हो जाए। मुश्किल यह है कि इसका आधार इतना छोटा है औ इसमें इतने कम लोग लगे हुए हैं कि यह अपने को ज्यादा देर और ज्यादा दूर तक पोसा नहीं सकता। हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद में हमारे खरबपतियों का हिस्सा बाईस प्रतिशत है। लेकिन सरकार के बैठाए अर्जुन सेनगुप्त आयोग ने बताया है कि चौरासी करोड़ लोगों की बीस रूपया भी रोज नहीं मिलता। विश्व बैंक ने गरीबी की कसौटी अब सवा डॉलर प्रतिदिन कर दी है। यानी आज के हिसाब से लगभग पचपन रूपए। खुद विश्व बैंक ने कहा है कि हमने पहले जितने सोचे थे उससे कहीं ज्यादा गरीब दुनिया में हैं। पचपन रूपए का पैमाना लगाएं तो सोचिए कि भारत में गरीबों की संख्या कितनी निकलेगी।
इलाहाबाद के म्योर कॉलेज की इकनॉमिक सोसाइटी में 1916 में भाषण देते हुए
गांधी ने कहा था- `किसी देश की सुव्यवस्था की सच्ची कसौटी यह नहीं है कि
उसमें कितने खरबपति हैं। बल्कि यह है कि उसके जन जन में भुखमरी की कितनी
कमी है।´
दो साल पहले खरबपतियों की बढ़ती संख्या पर बल्ले बल्ले करने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया ने आखिर में दुख से मंजूर किया था कि देश के सबसे अमीर और गरीब आदमी के बीच नब्बे लाख गुना का फर्क हो गया है। आंकडे़ गवाह हैं कि तब से अमीरी गरीबी और बढ़ी है। आप कह सकते हें कि एक करोड़ गुना से ज्यादा बड़ी खाई हो गई है। इतनी गैर बराबरी का समाज लोकतांत्रिक समाज नहीं हो सकता। इतनी भयंकर गैर बराबरी को तो सैनिक तानाशाही भ ज्यादा चला नहीं सकती। सरकार और उसके नव उदार पैरोकार कहते हैं कि यह अमीरी रिस कर नीचे तक पहुंचेगी। इससे बड़ा झांसा कोई हो नहीं सकता। लेकिन उनकी रिसन को मान भी लें तो खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक। क्योंकि आह को भी चाहिए एक उम्र असर होने तक। कौन जीता है तेरी अमीरी के रिसन होने तक? इसीलिए पुलिस और सेना के बावजूद देश में बीसियों जगह पर रोज उपद्रव होते हैं। देश बिखर रहा है। ऐसा नहीं होगा कि यह व्यवस्था अपने आप ठीक कर लेगी। यह भी नहीं होगा कि देश के वंचित अपने आप क्रांति कर देगें। यह हिंदी वालों का कर्तव्य है कि वे 1857 की तरह उठ खड़े हों और जो व्यवस्था उन्हें उनकी रोजी-रोटी और मान-सम्मान और बुनियादी अधिकारों से वंचित कर रही है, उसे बदल दें। हिंदी वालों को उनकी ऐतिहासिक भूमिका उनके अनिवार्य कर्तव्य की याद दिला रही है। हिंदी वालो, लोटे और लंगोटी वालो, तुम्हारे पास कुछ नहीं है गंवाने के लिए सिवाय अपने ईमान और बोली के। उट्ठो ज्ञानी खेत संभालो!
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
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