सूखा सोखने की पहल
बुंदेलखण्ड में सूखे से निजात दिलाने की दिशा में पहली पहल हुई उस गांव में जहां सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की थी. बांदा के पंड़ुई गांव में में हुई आत्महत्याओं को सरकार ने जब
यह कहकर खारिज करने की कोशिश की कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा तो स्थानीय नौजवान राजेन्द्र सिंह ने एक ऐसी पहल की जो अब आंदोलन बन चुका है. बात 2006 की है. सूदखोरों के आतंक से बचने के लिए किशोरीलाल ने फांसी लगा ली. यह सीधे-सीधे आत्महत्या का मामला था. लेकिन अफसरों ने रिपोर्ट में लिखा "किशोरी लाल ने बेटी की बदचलनी से तंग आकर आत्महत्या कर ली." इस सरकारी कारनामें से गांववाले स्तब्ध रह गये. सरकार की इस बदनीयती के खिलाफ गांववालों ने पंचायत की लेकिन ताकतवर नौकरशाही से सीधे सामना करने की उनकी हिम्मत नहीं थी. 24 जुलाई 2006 को राजेन्द्र सिंह ने अपनी बात ऊपर तक पहुंचाने के लिए एक सामाजिक पहल की. नाम दिया "चूल्हाबंदी उपवास". राजेन्द्र सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनका चूल्हाबंदी उपवास जारी है. यह चूल्हाबंदी उपवास उन घरों में होता है जहां खाने का इंतजाम है. संभवतः राजेन्द्र इस गरीबी में भी पनप आये उस स्वार्थ को सबसे पहले दूर करना चाहते थे जिसके कारण अमीर-गरीब की दूरी खाईं बन जाती है. चूल्हाबंदी से जो अनाज बचता है वह उस घर में पहुंचा दिया जाता है जिन गरों में फांकाकसी की नौबत है. लेकिन राजेन्द्र की इस छोटी सी पहल से आज उन 150 घरों में रोज चूल्हा जल रहा है जो अपने बूते शायद दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाते. अभाव में भी एक दूसरे का हाथ थामकर विपत्तिकाल से बाहर निकल जाने की यह अनूठी पहल जारी है. अब एक और अभियान इसमें जुड़ गया है जिसे फंदा मु्क्ति अभियान कहा जा रहा है. कर्ज के बोझ से मिल-जुलकर निपटने के लिए पडुई के लोग कमर कस रहे हैं.
महोबा के पनवारी ब्लाक के पहाड़िया गांव की नीतू, गुड़िया और रीना ने भी एक पहल की है. नीतू समाजशास्त्र में एमए हैं. उनकी एक सखी के पिताजी की कर्ज के कारण हालत पतली थी. उनकी परेशानी देखकर नीतू ने कुछ करने के बारे में सोचना शुरू किया. तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में कुल 170 परिवार हैं. सबका कर्ज मिला दिया जाए तो कोई 5 लाख रूपये का कर्ज है. कर्ज को चुकाने की रकम भले ही न मिल सके लेकिन भूख से लड़ने के सामूहिक उपाय क्या हो सकते हैं इस बारे में सोचते हुए नीतू को अचानक दादरा का ख्याल आया. दादरा एक प्रकार की गाने-बजाने की महफिल होती है जिसमें महिलाएं अपने घर से आखत (दान का अनाज) लेकर आती हैं. यह यहां की परंपरा और स्वभाव में है. दादरा के जरिए जो आखत इकट्ठा होता है वह उन घरों में पहुंचा दिया जाता हैं जहां चूल्हा ठंडा पड़ा है. नीतू बताती हैं कि "उन्हें बहत अच्छा लगता है यह सब करके.मुझे खुशी है कि अब हमारे गांव में भूख से कोई नहीं मरेगा." उनके इस छोटे से लेकिन ईमानदार प्रयास ने उन घरों में असमय मौत को घुसने से रोक दिया.
अब नीतू और उनकी सहेलिया पानी के प्रबंधन पर काम कर रही हैं. तीन हजार की आबादी के इस छोटे से गांव में 130 हैण्डपंप हैं. लेकिन जब जमीन के पेट में ही पानी न हो तो हैण्डपम्प कहां से खींचकर लायेगा. इन हैण्डपम्पों से पानी लेने में भी बहुत सारा पानी बेकार चला जाता था. उन सहेलियों ने प्रयोग के तौर पर एक हैण्डपम्प के पास सोख्ता बना दिया. इसका असर यह हुआ कि जो पानी बेकार बह रहा था वह पुनः रिसकर जमीन में जाने लगा. अब ऐसे सोख्ते बनाने और पेड़ लगाने के अपने काम को लेकर ये सहेलियां पहाड़ियां गांव के बाहर जाने की योजना बना रही हैं.
समाज के अपने प्रयासों से बुन्देलखण्ड के कश्मीर कहेजानेवाले चरखारी के तालाबों का पुनरूद्धार तेजी से हो रहा है. चरखारी के सातों तालाबों को साफ करने की मुहिम समाज ने अपने हाथ में ले रखी है. इसी तरह गायत्री परिवार के स्वयंसेवक बड़े पैमाने पर आपदा राहत का काम कर रहे हैं. शांतिकुंज की ओर से अभियान का संयोजन कर रहे मेजर वी के खरे बताते हैं कि गायत्री परिवार बांदा के सात, महोबा के पांच और हमीरपुर के पांच गांवों में राहत कार्य चला रहा है. इस राहत कार्य में जानवरों के लिए भूसा भी दिया जाता है और गांव के भूमिहीन और संकटग्रस्त परिवारों को अनाज का एक पैकेट भी दिया जाता है जिसमें 10 किलो गेहूं, 5 किलो चावल और 2 किलो दाल होती है. इसके अलावा गायत्री परिवार की ओर से लड़कियों की शादियों में भी योगदान दिया जा रहा है.
बुन्देलखण्ड में सरकारों की लीपापोती और नौकरशाही के पंजों में फंसी योजनाओं के बीच समाज की ऐसी कोशिशें अंधेरे में रोशनी की किरण दिखाती हैं. आपदा-विपदा में एक दूसरे का हाथ थाम लेने की हमारी परंपरागत समझ को सरकारें अभी पूरी तरह से खत्म नहीं कर पायी है, यह देखकर हम सबको अच्छा ही लगता है. बुन्देली स्वभाव के इस पुनर्जागरण को देखकर इतनी उम्मीद बंधती है कि शायद अब आत्महत्याओं और अभाव से हो रही मौतों में थोड़ी कमी आ जाए.(प्रप्र)
रूपेश पाण्डेय का ईमेलः rupeshpandey1973@gmail.com
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