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पत्रकारिता के बारह सवाल

image चौथी दुनिया और उसके संपादक संतोष भारतीय

दिल और दिमाग किसी भी चेतन शरीर के अनिवार्य हिस्से हैं. जिन्दा रहने के लिए दोनों की जरूरत है. हालांकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल विपरीत हैं लेकिन दोनों में से किसी एक के बिना जीवित शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन यह दिल दिमाग केवल चेतन में ही नहीं होते. चेतन पुरूष जो कुछ रचना करता है उस रचना में भी दिल-दिमाग उतर आता है. कागज, पन्ने और स्याही सदियों से मनुष्य के इस स्वभाव के गवाह रहे हैं. जब-जब दिल टूटे हैं तो कागज ही सबसे ज्यादा स्याह हुए हैं लेकिन जब दिमाग सुन्न हो जाए तो?

पिछला एक दशक इस बात का गवाह है कि बाजार ने भारतीय पत्रकारिता का दिमाग सुन्न कर दिया है. शोर के बीच एक सन्नाटा आपको चारो ओर दिखाई देगा. अखबारों के टनों बंडल भले ही बढ़ गये हों लेकिन बंडलों में बंद शब्द इतने निस्तेज क्यों हो गये कि उनका आखिरी स्थान किसी लाईब्रेरी की बजाय कबाड़ी की दुकान हो गया. क्या सुन्न दिमाग के सन्नाटे से जो शब्द उपज रहे हैं वे इतने टूटे हुए हैं कि केवल कागज की स्याह कर सकते हैं? इन निस्तेज होते कागजों की चिंता हर मीडियाकर्मी को है. आप भारतीय मीिडया में काम करनेवाले किसी भी व्यक्ति से मिलिए, वह इसी चिंता में दिखाई देगा कि पतन की इंतहा हो गयी है. आप अभी उससे बात करके फारिग ही होंगे कि पता चलेगा वह जिस इंतहा की बात कर रहा था पतन उससे भी एक पायदान नीचे उतर गया है. 

ऐसे दौर में कोई पत्रकार आपसे मिले और कहे कि हम पत्रकारिता लौटा लाएंगे तो एकबारगी किसी को विश्वास नहीं होगा. कोई हम जैसा टुंटपुजिया पत्रकार बोले तो बात समझ में आ भी जाती है कि जब दांव पर लगाने के लिए केवल शब्द ही हैं तो तुम बोल ही सकते हो, लेकिन भारी पूंजी दांव पर लगी हो तब? तब हलक सूख जाता है और विश्वास करना कठिन होता है कि आज के इस सुन्न दिमाग के युग में पत्रकारिता लौटा लाने की जहमत कौन उठाना चाहता है. और वह ऐसा करे भी तो क्यों? कुछ दिन पहले मैंने एक अखबार के पुनः प्रकाशन के बारे में लिखा था. वह चौथी दुनिया है. जब अपनी स्टोरी के सिलसिले में मैं उस अखबार के संपादक संतोष भारतीय से मिला था तो एक बात दिमाग में अटक गयी थी. अगर मैं इनकी कोशिशों को ईमानदार कोशिश मान भी लूं तो वे लोग कहां हैं जो पैकेज से परे जाकर पत्रकारिता करने का माद्दा रखते हैं. दिल्ली जैसे शहर में जीवन स्तर बहुत मंहगा है. पत्रकारिता का लाला युग भी अब नहीं रहा. बाजार ने शब्दों को निस्तेज भले ही किया है लेकिन पत्रकारों की जेब भी भारी की है. गड़बड़ शायद यहीं से शुरू हो गयी. अब जेबें भरनेवाले पत्रकारों के चेहरे निस्तेज हो गये हैं. पर्यावरणविद अनुपम मिश्र खुद ही शब्दधनी पत्रकार रहे हैं. इस सवाल के जवाब में वे प्रतिप्रश्न करते हैं - "जब पत्रकार अपनी कीमत लगाता है, अपने लिए पैकेज की मांग करता है तो उसे वह सब मिल जाता है. इसके बाद भी वह पत्रकारिता की जिद क्यों करता है?" अब मैंने तय किया कि मैं एक बार फिर संतोष भारतीय से मिलूंगा. चौथी दुनिया मेरे लिए भी एक बहाना है कि अपने कई सारे सवालों के जवाब तलाश सकूं. मैं उनसे दोबारा मिला.

उन्होंने जवाब में वे सारे बायोडाटा मेरे सामने रख दिये जो उन्हें मिले हैं. नये लड़के लड़कियों की संख्या उनमें अधिक थी. इन जीवन विवरणों में एक खास बात यह थी कि सबके साथ बारह सवाल और उनके जवाब भी नत्थी थे. बायोडाटा के साथ लिखित टेस्ट? यह थोड़ा चौंकानेवाला था. चौथी दुनिया में जीवन विवरण के साथ ये बारह सवाल भी उन्हें चयन प्रक्रिया में मदद कर रहे हैं. इन्हीं बारह सवालों के जवाबों में विकास (बदला हुआ नाम) लिखते हैं- "पत्रकारिता से आम आदमी की आवाज गुम हो गयी है." निश्चित रूप से विकास नया खून हैं लेकिन वे वह देख रहे हैं जो हम सबको देखना चाहिए. पैकेज के पहाड़ के पार हमें शायद वह दिखाई न पड़ता हो लेकिन आम आदमी भी है और चीख-पुकार के रूप में उसकी आवाज भी निकल रही है. फिर पैकेजधारी पत्रकार को वह चीख-पुकार दिखाई या सुनाई क्यों नहीं पड़ती? चलिए हम उसकी गृहस्थी को इसके लिए दोषी नहीं ठहराते लेकिन किसी पत्रकार की गृहस्थी देश की गृहस्थी से बड़ी तो नहीं होती? संतोष भारतीय कहते हैं "लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता चौथा स्तंभ है. इसलिए हम सब भी लोकसेवक ही हैं, हमारी सबकी अघोषित जिम्मेदारियां हैं, हम महसूस करें या न करें." उन्हीं की बात मानें तो कुछ ऐसे नाम भी उनके पास आ रहे हैं जो पैकेज से भरपूर हैं लेकिन वे अब पैकेज की गुलामी नहीं करना चाहते. बहुत शीर्ष पर जाकर उसके खालीपन को देख लिया. अब वे एक बार फिर सड़कों पर उतरना चाहते हैं. वे लोगों के बीच जाना चाहते हैं. वे रिपोर्टिंग करना चाहते हैं.

यह दिमाग के खालीपन से उपजे दिल की चीख पुकार है. पेट भरने के चक्कर में दिमाग को कब तक गिरवी रखा जा सकता है? जब पेट अपनी जरूरतें पूरी कर लेता है तो दिमाग सक्रिय हो जाता है. यह मानवीय स्वभाव है. भारत में पत्रकारिता पेट के रास्ते नहीं चली है. बल्कि यहां तो उल्टे ही नियम रहे हैं. पेट को जानबूझकर खाली रखा गया है ताकि खाली पेटों का दर्द अनुभव किया जा सके. पत्रकार ऊपर से जिस अभाव में जीता दिखाई देता है इसे अपनी नियति मान लेना चाहिए. क्योंकि यह अभाव ही वह मौका है जो आपको अभावग्रस्त लोगों से जोड़े रखता है. लोकतंत्र के चौथे खम्भे की अघोषित जिम्मेदारियां इसी अभाव के रास्ते अपना सफर तय करती हैं. यह एक कमाण्डों ट्रेनिंग की भांति है जहां उसे रातों में जागने का अभ्यास कराया जाता है, जानबूझकर विपरीत परिस्थितियों में रखा जाता है ताकि वह उन संभावित विपरीत परिस्थितियों के आने पर कमजोर न पड़े जिसके लिए उसकी तैयारी की जा रही है. गांधी ने सूट न उतारा होता तो वे शायद ही कभी समझ पाते कि आधी धोती तन ढंकने का इच्छापूर्वक प्रयोजन मात्र नहीं है बल्कि एक दर्शन है. यह दर्शन आपको उन लोगों के करीब ले जाता है जिन्हें आपकी सबसे ज्यादा जरूरत है. पत्रकार का अभाव करोड़ों लोगों के हित साध सकता है. क्योंकि आज भी पत्रकार ही एकमात्र ऐसा लोकसेवक है जो अनिवार्यरूप से लोगों के बीच जाता है. भारत में स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त जो पत्रकारिता की शिक्षा मिलती है उसमें हर वरिष्ठ पत्रकार अपने कनिष्ठ को अनिवार्य रूप से एक बात जरूर बताता है कि खबर वह नहीं है जो तुम्हारे पास आ रही है. खबर वह है जिसके पास तुम जा रहे हो.

लेकिन पैकेज ने बहुत कुछ व्यतिक्रम पैदा कर दिया. पूंजी के प्रवाह ने नये माध्यम ही पैदा नहीं किये खबरों को चलने की ताकत भी दे दी. अब खबरें चलकर हमारे दफ्तर तक आती हैं. हमने खबरों तक जाना बंद कर दिया. ऐसी परिस्थितियों में नतीजा क्या आता है? पत्रकारिता में बायोडाटा से काम नहीं चलता. सवाल पूछने पड़ते हैं. आपके बताये से आपको नहीं समझा जा सकता. अपनी प्रश्नावली विकसित करनी पड़ती है. उन सवालों पर सवाल उठाये जा सकते हैं लेकिन जब आप किसी पत्रकार से यह पूछते हैं कि आप अपनी नौकरी छोड़ कर चौथी दुनिया से क्यों जुडना चाहते हैं? और जवाब मिलता है कि रिपोर्टिंग करना चाहते हैं तो वह सन्नाटा सुनाई दे जाता है जिसके आगोश में आज की कमोबेश पूरी पत्रकारिता जा चुकी है. 

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ummed singh baid saadhak on 12 January, 2009 15:29;29
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चौथी दुनियां पर आपका यह दूसरा आलेख है, संजयजी!
सप्ताह-दस दिन में एक खबर और दो आलेख!!
और इस आलेख में तो सिर्फ़ प्रश्न ही प्रश्न हैं,
आपसे स तो उत्तरों की अपेक्षा रहती है.

आपके दर्द से संवेदित हुआ.
मार्ग बनायें, बतायें...अनुगामी आ जायेंगे.
मैं भी ...उम्मेद साधक
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A JOURNALIST on 12 January, 2009 15:45;09
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Chouthi Duniya ke din gaye.Jaise haandi kaath ki chadhe na dooji bar.
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A Reader on 12 January, 2009 16:41;17
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kafi had tak aisha hi prayog Sahara Samay me huwa tha. band huwa.Dalal v imandar sathi chahte hain. ab imandar aapni kimat mange to kya burae hain.
akbar aane do to pata chalega.
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RAJEEV SHARMA on 12 January, 2009 21:33;12
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संजय जी आपने चौथे स्तम्भ के वर्तमान यथार्थ से जिससे परिचय तो है उसे अपने आलेख से पुष्ट किया है । पैसों की खनक और बाजार के हर चीज पर बढते प्रभाव ने पत्रकारिता को बहुत प्रभावित किया है जिसमें अधिकांश पत्रकारों ने अपने जमीर को प्रभावशालियों के यहॉ गिरवी रख दिया है ऐसे में अधेरे को कोसने से अच्छा है दीपक को जलाना और आप उस काम को पूरी इमानदारी के कर रहे है ।और कुछ लोग है जो आपके रास्तों पर चलकर आपके साथ पत्रकारिता को भी पुरानी पहचान दिलाने के आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार है आप चलते चलें अधेरों में भी कारवॉ बन जाऐगा ।
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RUPEH on 12 January, 2009 21:54;20
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sanjay ji, mujhe lagta tha budhdhijiwi punjipati ho gaye hai,corporate cultuer ke wahak ho gaye hai. lekin mai galat tha. buddhijiwi punjiwad ki chakachoundh ke pichhe the jo dikh nahi rhe the,ab punjiwad ki chamak fiki huyee hai to sab dikh rhe hai
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Anil Chaudhary on 17 January, 2009 20:11;34
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Electornic Media ak daska aynak ha
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ashutosh on 11 February, 2009 13:44;53
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loktantra ke pahle istambh se chauthe me punah ane par apka swagat hai. yah pahle payedan se chauthe par ane ka bimb nahi balki pahle asman se chuthe asman par jane ki prakriya hai......aur phir chuthe se satwen asman par jane ke liye ak manch. is ummid se likh raha huin ki paise ki parwah kiye bina patrakarita ki asli takat duniya ko dikha payega ya phir patrakarita ka kundalini jagrankar payega.

ashutosh
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ashok Kumar Singh on 07 April, 2009 10:00;20
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Sanjai ji,
Namaskar
Aapko pada aur apni ateet ke duniya me kho gaya.Aapne jis bebaki se Bajarvad me phanskar Patrakaro ke naitikta par prahar kiya hai, uske leye aap kote kote sadhuwad ke patra hai.Patrakarita ko maine dabe-kuchle aur pedet logo ke aawaj ko buland karne ke maksad se he apnaya tha. Ek sampadkiya saminar me es dard ko jab ukera to ek sapat sa uttar mujhko SP Singh ne yahi diya ke kya bhukho marne ka erada hai? tum to 50 sal ke kuware ho, bebe bache hai nahi, yeh bakwas ke bate hai.Pariwar wala patrakar es bajarwad me kab garib kesi GARIB-DUKHIYARI ke aawaj bana rahega? Es daur me Akhbar chalana karoro ka khel hai.jo Paisa Baniya paisa kamane ke liye paisa lagata hai.lagta hai tumahre shareer me Aajadi ke daur wale kisi Bhatke patrakar ke Aatma vaas kar rahi hai. En shabdo se mera dil-dimag to nahi sunn hua hai, lakin es daur me mae apne ko aasahae jaror mehsus kar raha hu.Apni samajh se hum Dil-Dimag lagakar kuch bhi aacha likhte hai voh nahi chapta hai, uttar milta hai es parti se AKHBAR ko har sal Lakho ka Vigyapan milta hai.Umar ke es padaw me bhi Emandari ke kafan me lipta hua hu, nateeja yeh hai ke teen sal pahle kishto par khreda scooter ke kisto ke babat ab tak char notice aa chuki hai. mere under kam karne wale kae chote Reporter kotheyo ke malik aur hum abhi bhi kerai ke makan me rahte hai. samaj me mera bahut naam hai,log uadahran dete hai. Samprati-ab patrakarita sief Bhrasht-Mafia aur lutero ke naukri hai.Emandar Patrakarita ke duhai dene wale patrakaro ka hal UPINDER MISHRA jaisa hi hota hai. Kabh Rashtiya Sahara ke Sampadak hua karte the aaj sadak par hai.Tiwari ji Aap es trah ke logo ke liye bhi koi rasta nikale, ab Shabdo se pait nahi bharnewala hai.Ab nai Young patrakaro ke jo toli aa rahi hai, voh patrakarita ke mission aur ethic ko takh par rakhkar..kamane aa rahi hai. Electronic Media ke rangeen duniya ne Print Patrakarita ka bhavishya par nishan lagana shuru kar diya hai?
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संजय तिवारी on 07 April, 2009 14:01;07
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हमेशा आगे देखना चाहिए. और इलेक्ट्रानिक के आगे वेब हमें रास्ता दिखा रहा है. वेब पत्रकारिता नयी संभावना पैदा करेगा. बहुत कुछ बदलेगा अगले कुछ सालों में. शायद आपको शिकायत नहीं रहेगी.

आपको मेरा सुझाव है कि वेब पत्रकारिता से जुड़ना चाहिए. यह एक ऐसी गाय है जो अभी तुरंत तो दूध नहीं देगी लेकिन भविष्य की सबसे दुधारू गाय होगी. सारे टीवीवाले भी इंटरनेट पर ही आनेवाले हैं. प्रिंट वाले भी यहीं सिमटनेवाले हैं. उनका अलग अस्तित्व तो रहेगा लेकिन आज वे इंटनेट को पूरक मान रहे हैं कल उनका अपना माध्यम इंटरनेट का पूरक हो जाएगा.

यहां जो आपको पढ़ना चाहेगा वह पढ़ लेगा. शिकायत करने की जरूरत नहीं होगी. इस बारे में सोचिए. आपकी रुचि खबरों में है तो आप विस्फोट न्यूज से जुड़ सकते हैं.
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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