क्या यह विस्फोट की सफलता है?
मीडिया में यह चलन खूब है कि अगर उनके द्वारा उठाये गये किसी मुद्दे को प्रतिसाद मिलता है तो चर्चा तो करते ही हैं. लेकिन आज सुबह-सुबह दैनिक जागरण
में एक ऐसी खबर देखी जिस पर कोई दो महीना पहले विस्फोट ने सवाल उठाया था. मुझे ऐसा नहीं लगता कि विस्फोट द्वारा मुद्दा उठाये जाने के कारण केन्द्रीय बालविकास मंत्री ने ऐसी घोषणा की है लेकिन उनकी घोषणा सुनकर व्य्यक्तिगत रूप से मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है. 3 मार्च 2008 को विस्फोट में हमने सवाल उठाया था कि अगर खेत में काम करना बालश्रम है तो फिल्म में? इस सवाल के जवाब में बहुत सारे पाठकों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. सबने सवाल को सही ठहराया था. बात आगे भी गयी. लेकिन कल बालश्रम विश्व निषेध दिवस पर रेणुका चौधरी ने वही लाईन बोली जो हम सवाल उठा रहे थे. दैनिक जागरण में उनका बयान है- "गांवों के बच्चे तो मडबूरी में बालश्रम का शिकार हैं लेकिन शहरों में तो पैसेवाले लोग भी टीवी कार्यक्रमों व विज्ञापनों में बच्चों को लगा रहे हैं. सरकार इस नये तरीके के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी."
दैनिक जागरण के ब्यूरो से बनी खबर कहती है कि "टीवी चैनलों और रियलिटी शो को लोकप्रिय बनाने के लिए बच्चों पर मनमानी अब नहीं चलेगी. गलाकाट प्रतियोगिता साबित करने के लिए बच्चों से टेक पर टेक और दस-दस घण्टे काम लेना अब आसान नहीं होगा. सरकार टीवी पर प्रसारित होनेवाले ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम करने के दिशानिर्देश जारी करेगी. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को ऐसा दिशानिर्देश तैयार करने की जिम्मेदारी भी सौंप दी गयी है. आयोग जल्द ही इस काम के लिए एक समिति बनाने जा रही है." केन्द्रीय बालविकास मंत्री के हवाले से अखबार कहता है कि "देश में जानवरों तक के लिए कानून हैं लेकिन बच्चों के साथ कई तरह के ऐसे बर्ताव हो रहे हैं जिससे उनका बचपन खत्म हो रहा है."
रेणुका चौधरी ने जोर देकर कहा है कि टीवी कार्यक्रमों और विज्ञापनों में इनके काम करने के तौर-तरीकों को तय करना जरूरी है. उनका कहना था कि अगर खेती में काम करनेवाले बच्चे के लिए नियम कानून और दिशानिर्देश हो सकते हैं तो फिल्म में काम करनेवाले बच्चों के लिए क्यों नहीं?
रेणुका चौधरी के इस बयान से उन पाठकों और जागरूक नागरिकों को थोड़ा आश्वासन तो मिलता ही है जो बाजार द्वारा लूटे जा रहे बचपन से परेशान थे. विस्फोट के सवाल पर फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने कहा था कि "इस सवाल पर कौन क्या कह रहा है? मुझे लगता है कि इस जरूरी मुद्दे पर बहस होनी चाहिए." अजय जी इस सवाल पर सरकार की ओर से ऐसे सकारात्मक पहल के बाद थोड़ा आश्वस्त होने का मौका तो मिलता ही है. फिर भी सबकुछ एकदम ठीक ही हो जाएगा ऐसा मान लेना बाजार की ताकतों को कम करके आंकने जैसा होगा. अभी तो रेणुका चौधरी का बयान आया है. असली खेल तो इसके बाद शुरू होगा. किसी कारगर निर्णय तक पहुंचने से पहले सरकार को उन दलालों और मध्यजीवियों से पार पाना होगा जिन्हें लाबिइस्ट कहते हैं.
वैसे विस्फोट के लिए यह ऐसा दूसरा मौका है. इसके पहले खेलगांव पर अनिल पाण्डेय की रपट पर येल विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों ने अनिल पाण्डेय से संपर्क किया और बताया कि उन्होंने यह खबर वेबसाईट पर देखी थी. वे लोग कामनवेल्थ खेलों की स्वतंत्र आडिट के लिए दिल्ली आनेवाले हैं और अनिल पाण्डेय की रिपोर्ट पर और अधिक जानकारी चाहते हैं. मेरी नजर में यह वेब पत्रकारिता की उभरती हुई ताकत है जो भविष्य में और बड़े निर्णायक रोल अदा करेगी. जरूरत इस बात की है कि हमलोग उन मुद्दों पर बेबाकी से लिखना शुरू करें जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया दरकिनार कर देती है. सफलता के ऐसे किस्से तो सैकड़ों बनेंगे.
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मैं रतलाम में 'साप्ताहिक उपग्रह' से जुडा हूं इसके अगले अंक में मैं 'विस्फोट' की इस उपलब्धि का उल्लेख कर रहा हूं ।
निश्चित रूप से इसका श्रेय विस्फोट को मिलना चाहिये. नेट में सबसे अच्छी सुविधा यही है कि हम उन लोगों तक पहुंच सकते हैं, जो अत्यन्त महत्वपूर्ण और व्यस्त हैं. कोई आश्चर्य नहीं यदि मंत्री रेणुका जी ने खुद यह आलेख सर्फिंग के समय पढ़ा हो और इस मुद्दे ने उनका ध्यान खींचा हो.
आपको बधाई.
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