हिन्दी भाषा या देवनागरी लिपी?
गूगल के सीईओ एरिक स्मिथ ने 2005 में कहा था कि "आज से पांच-दस साल बाद हिन्दी इंटरनेट की तीसरी सबसे बड़ी भाषा होगी."
उनके कहे के तीन साल में ही यह भविष्यवाणी संभावना में बदलने लगी है. आज गूगल में "हिन्दी" शब्द की खोज करते ही आपके सामने 17 करोड़ परिणाम हाजिर हो जाते हैं. यानी 17 करोड़ बार गूगल के डाटाबेस में हिन्दी शब्द मौजूद है. अगर यही hindi आप अंग्रेजी में लिखकर खोजते हैं तो परिणाम 75 करोड़ तीस लाख आता है. देर से ही सही लेकिन हिन्दी का वर्चस्व इंटरनेट पर बढ़ने लगा है. प्रगति दहाई, सैकड़ा में नहीं बल्कि हजार में है. यानी अगर आप इंटरनेट पर हिन्दी के ग्रोथ को पैमाना बनाएं तो यह दूसरी किसी भी भाषा से ज्यादा तेजी से इंटरनेट पर विकसित हो रही है.
विकास का दूसरे तरीके यहां इंटनेट पर लागू नहीं होते. मसलन और किसी मीडिया की विधा में सर्विस प्रोवाइडर तय करता है कि भाषा में सक्रियता का स्तर कैसा रखना है. लेकिन यहां इंटरनेट पर इसके उलट है. यहां प्रयोक्ता तय करता है कि किस भाषा का वर्चस्व नेट पर कायम रहेगा. फिलहाल इस मामले में अंग्रेजी और चाईनीज का वर्चस्व है. इन दो भाषाओं में ही सबसे ज्यादा सर्विस प्रोवाईडर काम कर रहे हैं क्योंकि सबसे ज्यादा यूजर इन्हीं दो भाषाओं में सक्रिय हैं. हिन्दी के यूजर जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उससे इस बात की संभावना प्रबल हो रही है कि एरिक स्मिथ की भविष्यवाणी तय समय में पूरी हो जाएगी. एरिक स्मिथ की मानें तो 2015 तक इंटरनेट पर हिन्दी तीसरी सबसे बड़ी भाषा होगी. तब जो होगा उसके लिए आज क्या तैयारियां की जा रही हैं आइये उस पर एक नजर डालते हैं. साथ ही यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि भविष्य में इंटरनेट पर हिन्दी अगर नेट की तीसरी भाषा होगी तो उसके मूल में कौन सी बाते हैं.
अब आया यूनिकोड 5.1
एरिक स्मिथ ने केवल भविष्यवाणी ही नहीं की बल्कि उन्होंने इस पर अमल करते हुए गूगल का सारा डाटाबेस यूनिकोड में बदला. यूनिकोड में डाटाबेस होने से भाषाओं का दायरा बढ़ा और पहली बार ईमेल और ब्लागलेखन में वे भाषाएं प्रयुक्त होने लगी जिसने प्रयोक्ता अभी तक मजबूरी में रोमन लिपी के सहारे अपना काम चला रहे थे. थोड़े टालमटोल के बाद याहू ने तेजी से काम किया और अपना डाटाबेस यूनिकोड में परिवर्तित किया. इसके बाद एमएसएन का लाईव सर्च इंजन भी यूनिकोड के भरोसे हो गया और दुनिया के पहला सर्च इंजन अल्टाविस्टा ने भी यूनिकोड को मान्यता दे दी. आस्क जैसे सीमित सर्च इंजनों ने भी अपना डाटाबेस यूनिकोड में बदला है और यूनिकोड में मानकीकृत भाषाओं के सर्च को सपोर्ट कर रहे हैं. इंटरनेट पर यूनिकोड आधिरत डाटाबेस तेजी से बढ़ रहा हैं.
सर्च इंजनों के इस सहयोग के कारण इंटरनेट पर तेजी से हिन्दी के प्रयोक्ता भी बढ़े हैं और सर्विस प्रोवाईडर भी. लेकिन गूगल के बारे में जैसा समझा जाता है कि वह लीक बनाता है उसने एक कदम आगे जाते हुए यूनिकोड 5.1 को स्वीकार कर लिया है. यूनिकोड 5.1 यूनिकोड कन्सोर्टियम का नया आविष्कार है जो वर्णमाला के जटिल शब्दों को भी अपने में समेटे हुए है. साथ ही अब तक यूनिकोड फाण्ट में जो कुछ समस्याएं आ रही थीं उनको भी इसमें दूर करने की कोशिश की गयी है. भारत सरकार लगातार यूनिकोड कन्सोर्टियम को यह कह रहा था कि यूनिकोड में उन शब्दों को भी शामिल किया जाए जो वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्रयुक्त होते थे. इसकी पूरी लिस्ट यूनिकोड कन्सोर्टियम को दी गयी थी. यूनिकोड 5.1 में उन शब्दों को शामिल कर लिया गया है.
हिन्दी भाषा या देवनागरी लिपी?
एरिक स्मिथ के बयान को सही मानते समय हमें केवल हिन्दी भाषा के बारे में नहीं सोचना चाहिए. असल में हिन्दी में जिस भाषाई विकास की बात की जा रही है वह देवनागरी लिपी का का विकास होगा. अब अगर देवनागरी लिपी को देखें तो आज वर्तमान में हिन्दी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा प्रयुक्त की जानेवाली भाषा जरूर है लेकिन ऐसे लोग इंटरनेट पर नहीं है जो खालिस हिन्दी को महत्व देते हों. ऐसे लोग तो खैर इंटरनेट की दुनिया में आये ही नहीं हैं जो हिन्दी के अलावा कोई और भाषा नहीं जानते इसलिए मजबूरी में हिन्दी के अलावा कोई और भाषा प्रयोग ही नहीं करते. इंटरनेट पर देवनागरी लिपी का विकास तेजी से हो रहा है. इस लिपी विकास में जो अन्य भाषाएं तेजी से इंटरनेट पर अपना पांव पसार रही हैं उनमें नेपाली और मराठी भी हैं. पता नहीं इंटरनेट प्रयोग करनेवाले कितने हिन्दीभाषी नेट पर इस लिपी विकास और भाषाई विकास का अंतर समझ पा रहे हैं लेकिन अब देवनागरी लिपी में खोज परिणामों में आपको नेपाली और मराठी के परिणाम भी दिखाई देते हैं. फिर भी ऐसा नहीं मान सकते कि यह इति है. असल में यह अथ है. यहां से बात शुरू होती है. आनेवाले समय में देवनागरी लिपी में लिखी जाने वाली ऐसी कई बोलियां भी इंटरनेट पर होंगी जिन्हें अभी हम तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं देते.
मसलन आज हिन्दी के नाम पर हम जिस बोली का इस्तेमाल करते हैं वह खड़ी बोली है. लेकिन इस खड़ी बोली का विकास बहुत सी उपबोलियों से मिलकर होता है लेकिन जब मीडिया के लिए भाषा तय करते हैं तो खड़ी-बोली और अंग्रेजी का गठजोड़ करते हैं. अगर यह गठजोड़ खड़ी बोली और स्थानीय बोलियों का हो तो सही मायने में हिन्दी संपर्क की ऐसी भाषा होगी जिसकी जड़ें बोलियों के माध्यम से हमारी अपनी माटी की ओर जाती है. मुख्यधारा की मीडिया ने यह प्रयोग नहीं किया लेकिन नया मीडिया यह सेतु बनाने में कामयाब होगा. समेकित शब्दावली के कारण न केवल हिन्दी भाषा बल्कि देवनागरी लिपी के कारण बोलियां भी इंटरनेट की मुख्यधारा में होगी. आनेवाले समय में इस संभावना पर बहुत काम करने की जरूरत होगी. यह न केवल हिन्दी के भविष्य के लिए बहुत सुनहरा मौका है बल्कि जो लोग हिन्दी को अंग्रेजी का कचरा संस्करण मानते हैं उनको भी नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या ऐसा कोई गठजोड़ बनाया जा सकता है.
चलिए, अभी यह सब होने में वक्त लगेगा. इसकी झलक पानी हो तो आप ऐसे समझिए कि मैंने गूगल में सेक्सी वेबसाइट शब्द को सर्च किया. मुझे जो पहला परिणाम मिला वह मराठी की वेबसाईट है. है न कमाल की बात.
(देवनागरी लिपी या हिन्दी भाषा के सवाल पर आप फोरम में भी अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं. यहां क्लिक करें.)
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अभय सिंह
जब हम हिन्दी भाषा के बारे में बात करते हैं तो हमारा दृष्टिकोण बहुत सीमित होता है. आमतौर पर हिन्दीभाषी भी स्वभाव से एक तानाशाह की तरह व्यवहार करता है. दक्षिण के लोग हिन्दी सीखें यह हिन्दीभाषी लोगों का हमेशा आग्रह रहता है लेकिन उत्तर के लोग देश की दूसरी कोई भाषा सीखना नहीं चाहते. यह दृष्टिकोण ठीक नहीं है.
द्रविणियन लिपी की भाषाओं की बात तो बहुत दूर है हम देवनागरी लिपी की भाषाओं के बारे में ही बहुत अनुदार रहते हैं. यह तो वैसे ही है जैसे कोई अंग्रेजी वाला चाहे कि लोग उससे उसकी भाषा में बात करें. क्यों भाई एक अंग्रेजी वाले को दूसरी भाषा सीखने की कोशिश क्यों नहीं करना चाहिए. अगर मराठी हिन्दी न सीखे तो क्या हमें मराठी सीखने की जरूरत नहीं है?
यही बात जब इंटरनेट की दुनिया में आती है तो भेद खत्म हो जाता है. भेद का यह खात्मा न केवल हिन्दी के लिए बल्कि देवनागरी लिपी की भाषाओं के लिए बहुत फायदेमंद सौदा होगा.
वैसे फोरम में मैंने यह बहस डाल दी है. अगर आप उसमें शामिल होते हैं तो यह एक अच्छी बहस होगी.
http://visfot.com/forum/index.php?topic=6.0
-- शिवभगवानुवाच
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