परमाणु करार करो बेकार
नॉम चामस्की अपने स्वतंत्र विचारों के लिए चर्चित हैं. अपने इस लेख में वे परमाणु करार को खारिज करने की वकालत कर रहे हैं. हालांकि परमाणु करार को लेकर उनकी चिंताएं अलग और सामंतवादी हैं.
भारत और अमेरिका के इस करार के बाद दुनिया के और देश भी नियमों का उल्लंघन करना चाहेंगे. बताया जाता है कि पाकिस्तान नाभिकीय हथियारों के लिए एक प्लूटोनियम रियेक्टर बना रहा है. प्रत्यक्षरूप में यह हथियार निर्माण की ज्यादा अग्रिम रूपरेखा है. स्थानीय नाभिकीय सुपरवाईजर इजरायल भी अमेरिकी कांग्रेस में लाबिंग कर रहा है कि उसे भी भारत जैसी रियायत दी जाए. उसने भी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप से संपर्क किया है कि उसे भारत जैसी विशेष छूट दी जाए. भारत एनपीटी का हस्ताक्षरी नहीं है. इसलिए इस समझौते के बाद वह परमाणु परीक्षण करने के लिए स्वतंत्र है. डेरिल किम्बैल कहते हैं कि "अविश्वसनीय तौर पर इस करार में अमेरिका भारत से वादा करता है कि भारत के परमाणु परीक्षण करने के बाद भी वह दूसरे देशों से नाभिकीय ईंधन की आपूर्ति की व्यवस्था करता रहेगा." डैरिल शस्त्र नियंत्रण एसोशिएशन के कार्यकारी निदेशक हैं. फ्रांस और आष्ट्रेलिया ने भी भारत से उसी तरह का समझौता करने का प्रस्ताव किया है जिस तरह का समझौता चीन ने पाकिस्तान से कर रखा है. एक बार महाशक्ति के दरवाजे खुल जाने के बाद दूसरों के द्वार खुलने पर ऐसी हैरानी नहीं होनी चाहिए.
भारत और अमेरिका का यह करार सैनिक और व्यावसायिक इरादों का घालमेल करता है. नाभिकीय हथियारों के विशेषज्ञ गैरी मिलहोलिन ने कांग्रेस में दिये गये विदेश मंत्री कोंडालिजा राईस के बयानों के इस तरह के निष्कर्ष निकाले हैं. राईस ने कहा था कि यह समझौता पूरी तरह से निजी क्षेत्र को दिमाग में रखकर तैयार किया गया है. इसमें विशेष तौर पर रियेक्टरों और लड़ाकू विमानों को ध्यान में रखा गया है. मिलहोलिन का कहना है कि इस करार से न सिर्फ नाभिकीय युद्ध के रास्ते में आनेवाली रूकावटें दूर होंगी बल्कि इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा और वह दिन जल्दी आयेगा जब नाभिकीय विस्फोट किसी अमेरिकी शहर को तबाह कर देंगे. इस तरह के खतरों के बावजूद इसे इसलिए आगे बढ़ाया जा रहा है क्योंकि इसमें अमेरिकी कंपनियों का हित है. किम्पबैल का कहना है कि अमेरिका भारत को नाभिकीय व्यापार की वह शर्ते मुहैया करा रहा है जो एनपीटी की सारी शर्तें माननेवाले देशों को भी नहीं हासिल है. दुनिया के ज्यादातर देश इस झक्की रवैये को समझ सकते हैं. इसका अर्थ यह है कि अमेरिका उस देश को पुरस्कृत कर रहा है जो एनपीटी की अवहेलना करता है. जबकि वह ईरान को युद्ध की धमकी दे रहा है जो एनपीटी की शर्तों को मानता है. अमेरिका ने ईरान के दो पड़ोसियों को अपने कब्जे में ले लिया है और 1979 से अमेरिकी दायरे से बाहर जाने के बाद ही उसे उखाड़ फेंकने में लगा हुआ है.
इस दक्षिण एशियाई इलाके में आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए ईरान से पाकिस्तान होते हुए भारत तक गैस पाईप लाईन बिछाने का कार्यक्रम प्रस्तावित था. शांति की यह लाईन इस इलाके को आपस में जोड़ती और शांतिपूर्ण एकीकरण की संभावनाएं पैदा करती. लेकिन इस पाईप लाईन के कारण जो उम्मीद बन रही थी वह नाभिकीय करार के कारण नष्ट हो जाएगी. क्योंकि अमेरिका ने उस पाईप लाईन के जवाब में ही भारत को परमाणु करार का प्रस्ताव रखा है ताकि वह ईरान को दरकिनार कर सके. हालांकि हकीकत यह है कि भारत को ईरान से जो मिलनेवाला था परमाणु करार से उसकी तुलना में कुछ खास हासिल नहीं होगा. उल्टे इस दक्षिण एशियाई इलाके में कई तरह के नाटकीय बदलवा आयेंगे. भारत और पाकिस्तान के बीच जो जन संपर्क बढ़ रहा था और सरकारें भी आपसी बातचीत के रास्ते खोल रही थीं वे सारी प्रक्रियाएं रूक जाएगी.
दरअसल भारत अमेरिका परमाणु करार ईरान को दरकिनार करने के लिए अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है. 2006 में अमेरिका ने हाईड एक्ट पास किया था जिसमें विशेष तौर पर मांग की गयी थी कि अमेरिकी सरकार ईरान को व्यापक जनसंहार के हथियार हासिल करने से रोकने के लिए भारत का समर्थन प्राप्त करे ताकि ईरान को अलग-थलग करके उस पर प्रतिबंध लगाने और उसे रोकने में मदद मिले. यहां यह बात ध्यान देने की है कि अमेरिका और ईरान की ज्यादातर आबादी इस इलाके को जिसमें ईरान और इजरायल शामिल है, नाभिकीय हथियार से मुक्त क्षेत्र बनाना चाहते हैं.
भारत-अमेरिका परमाणु करार बेकार किये जाने लायक है. नाभिकीय युद्ध की आशंका बढ़ रही है. यह गंभीर है. इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका के नेतृत्व में नाभिकीय हथियार संपन्न राज्य अपने जिम्मेदारियां निभाने को तैयार नहीं है बल्कि वे उसका उल्लंघन कर रहे हैं. आईएईए और एनएसजी की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद जब यह करार अमेरिकी कांग्रेस के सामने जाएगा तो वह इसे ठुकरा सकता है. ऐसा ही करना चाहिए. क्योंकि नाभिकीय हथियार संपन्न राज्य आपराधिक राज्य होते हैं. एनपीटी की धारा 6 कहती है कि सभी नाभिकीय हथियार संपन्न देश इसे नष्ट करने के लिए सद्भावनापूर्ण वार्ताएं करें. लेकिन इसका उल्लंघन करनेवालों में सबसे पहले अमेरिका ही आता है. भारत के साथ अमेरिका का परमाणु करार पूरा हो जाता है तो एनपीटी के प्रावधान बेमतलब हो जाएंगे.
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