Home | बात करामात | आधुनिक किसे कहेंगे?

आधुनिक किसे कहेंगे?

image

आज के जमाने में आधुनिक उसे कहते हैं जो बहुत क्लिष्ट हो, जटिल हो, काम्प्लेक्स हो. लेकिन क्या सरलता और सादगी आधुनिकता का प्रतीक नहीं हो सकती? मैं बहुत सारे किसानों से मिलता हूं. कुछ ऐसे किसानों से काफी प्रभावित हुआ हूं जिन्होंने किसानी की अपनी तकनीकि अपनी समझ के अनुसार विकसित की हैं. ऐसे ही एक किसान हैं श्री भास्कर सावे. वे महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर देहरी नाम के गांव में रहते हैं.

इनका चीकू का बगीचा है. चीकू के पेड़ तीस-तीस फीट के अंतर पर लगाये गये हैं. चीकू के दो कतारों के बीच में दो फीट चौड़ी और दो फीट गहरी नाली होती है पानी देने के लिए. नाली समतल होने के कारण पानी धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. और जैसे ही पानी बंद किया जाता है नाली से पानी अदृश्य हो जाता है क्योंकि वह पानी नाली के दोनों ओर बनी भीतें सोख लेती हैं. सामान्य रूप से जमीन की सतह पर बनायी गयी नाली से बहते हुए पानी की सूर्य के ताप के कारण वाष्पीकरण से हो हानि हो सकती है वह इससे रूक जाती है. जब मैंने इस पद्धति का अध्ययन किया तो पाया कि सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) द्वारा जितना पानी लगता है उससे भी कम पानी इस पद्धति से खर्च होता है. इसका मतलब है कि बहुत सामान्य पद्धति से भी पानी की हानि को रोका जा सकता है.

लेकिन फसलों को पानी कब देना है और कितने दिनों बाद देना है यह भी एक मुद्दा है. श्री भाष्कर सावे नें इसके लिए इस नली के दोनों तरफ सौ-डेढ़ सौ मीटर के अंतर पर कोन्ट्रास (रंगबिरंगी पत्तीवाली शोभादायक वनस्पतियां जिसे हम अपने घरों के गमलों में लगाते हैं) लगा रखे हैं. ये वनस्पतियां पानी के प्रति संवेदनशील होती हैं. जैसे ही जमीन में नमी की कमी होती है इन वनस्पतियों की पत्तियां मुरझाई सी नजर आती है. जिस दिन ऐसा दिखता है सावेजी भांप लेते हैं पानी देने का वक्त आ गया है. अब आप देखिए कितना सरल तरीका है यह? जबकि इजरायल में पेड़ों को पानी कब देना चाहिए इसके लिए एक कंम्प्यूटर प्रोग्राम विकसित किया गया है. अब दोनों पद्धतियों में आधुनिक पद्धति किसे कहेंगे? जो अधिक कार्यक्षम हो, जिसमें उर्जा की बचत होती हो और जो प्रकृति के बिल्कुल अनुकूल हो या फिर उसे जो इसके विपरीत आचरण करता हो? 

निजी रूप से मैं तो भास्कर सावे जी का तरीका इजरायल के तरीके से ज्यादा आधुनिक मानता हूं. फिर भी मैं यह समझता हूं कि अत्यंत जटिल और खर्चीला होने के बावजूद कम्प्यूटर सिस्टम हमें प्रभावित करता है और भास्कर सावे की सरल और सादगी भरी तकनीकि हमें नहीं छूती. बहुत साल पहले मैं फ्रांस की आर्गेनिक फार्मिंग देखने के लिए निमंत्रित किया गया था. हम लोग फ्रांस के गावों में जाकर किसानों से मिल रहे थे. एक गांव में एक किसान मिला. उसने जो बात कही वह आज भी नहीं भूलती. उसने कहा कि मक्खन को काटने के लिए हम लोग स्टील के चाकू का इस्तेमाल करते हैं. कुछ अमीर हुए तो चांदी और सोने के चाकू से भी मक्खन काटने का काम करते हैं. लेकिन यह सब धातु हैं और इन्हें पाने के लिए धरती को खोदना ही पड़ेगा. इस प्रक्रिया में हम जितना पाते हैं उससे बहुत ज्यादा खो देते हैं. लेकिन क्या मक्खन धागे से नहीं काटा जा सकता? यदि वह धागे से कट सकता है तो फिर इतनी झंझट क्यों उठायी जाती है?

क्यूबा को देखिए. फिदेल कास्त्रो इसके राष्ट्रपति हैं. अमेरिका से सटा हुआ है. वैसा ताकतवर देश नहीं है कि अमेरिका को चुनौती दे सके. लेकिन उसने अमेरिका को चुनौती दी. क्यूबा पूर्व सोवियत संघ और उनके कम्युनिस्ट ब्लाक के बहुत नजदीक था. उसकी आर्थिक व्यवस्था भी सोवियत संघ से प्राप्त होनेवाले खनिज तेल पर निर्भर था. इन्हीं खनिज तेलों के भरोसे क्यूबा की सारी खेती होती थी क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाईयां पेट्रोलियम पदार्थों से ही बनती थी. जब सोवियत संघ से मिलनेवाली पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बंद हो गयी तब क्यूबा के सामने सवाल आया कि अब क्या करे? लेकिन तब पूरे देश ने ठाना कि बिना रसायन के खेती करेंगे. पूरे देश ने आर्गेनिक फार्मिंग के तरीके को स्वीकार किया. मानस बदला और इच्छाशक्ति के बल पर क्यूबा ने अपना रास्ता तैयार कर लिया. 

सवाल तो यह है कि हम आधुनिकता और तकनीकि के नाम पर जीवन में क्लिष्टता क्यों बढ़ाते हैं? इस प्रकार की तकनीकि हमारे दिमाग को एक अलग प्रकार की आदत लगा देती है. कह सकते हैं हमारे दिमाग की कंडिशनिंग हो जाती है. तकनीकि का जीवन के हर क्षण में महत्व है लेकिन हमें तकनीकि को देखने का नजरिया बदलना होगा. हमें अनावश्यक जरूरतें कम कर कम खर्चीली और कार्यक्षम तकनीकि की ओर बढ़ना चाहिए.  

Subscribe to comments feed Comments (1 posted):

Nitin Kant Chaturvedi on 04 August, 2008 21:38;42
avatar
Tarak ji, hamare desh ki yahi vidambanaa he ki aasan aur kam karch wale tarike hame nahi suhate. 1 Arab ki aabadi ke desh me lakho "Bhaskar Save" he jinke pas bahut anuthe tarike he, lekin durbhagya he ki hamare neta aur afsar unhe khojne aur pracharit karne ki bajaye Videsh Yatra ka lutf Uthate he. Khud ko Kisan ka beta kahne wale MP ke CM Mr. S.R. Chouahn bhi Nimar ke bajaye kheti sikhne Ijrail gaye the.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 1 | displaying: 1 - 1

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
0
More from बात करामात
Previous
image
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
image
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
image
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
image
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
image
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
image
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
image
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
image
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
image
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
image
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
image
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
image
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
image
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
image
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
image
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
image
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
image
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2