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जमकर होली मनाईये और पांच बार नहाईये

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दैनिक भास्कर समूह को पानी की बड़ी चिंता है. होनी भी चाहिए. अगर आप एक कारपोरेट मीडिया हाउस हैं तो आपकी कोई सोशल रिस्पांसबिलिटी होनी ही चाहिए. दैनिक भास्कर की यह कारपोरेट चिंता व्यक्त हो रही है. वे कह रहे हैं कि होली खेलने पर पानी बर्बाद होता है. इसलिए आप तिलक होली खेलिए. तिलक लगाईये और होली मना लीजिए. क्यों पानी की ऐसी बर्बादी करते हैं? यह सवाल अकेले भास्कर समूह नहीं कर रहा है. दर्जनों एनजीओ होली के आस-पास ऐसे सवाल उठाते हैं. आपके अंदर बार-बार यह अपराध बोध पैदा करने की कोशिश करते हैं कि त्यौहार और उत्सव मनाकर आप बहुत बड़ा अपराध कर रहे हैं.

भारत में हिन्दुओं की आबादी (अगर सरकार के आंकड़ों को सही भी मान लें तो) ८० से ८५ करोड़ के आसपास होगी. इनमें १५ से २० करोड़ की आबादी ऐसी है जो अति आधुनिक है और केमिकल युक्त रंगों के साथ होली खेलती है. मान भी लें कि हर व्यक्ति रंगों के साथ भयानक तौर पर होली खेलता है और होली के दिन दो से तीन बार नहाता है तो कितना पानी खर्च करेगा? प्रति व्यक्ति पानी का खर्च १०० लीटर भी मान लें तो २० अरब लीटर पानी 'बर्बाद' होता है. एनजीओवादी संगठनों और कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी का चोंगा ओढ़कर बैठे संगठनों का तर्क है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में २० अरब लीटर पानी की बर्बादी अक्षम्य सामाजिक अपराध है. वे बार बार उन लोगों को अपराधी होने का अहसास दिलाता है. लेकिन क्या वास्तव में ऐसे लोग कोई अपराध करते है?

देश की राजधानी और एक आधुनिक शहर दिल्ली को लेते हैं. दिल्ली में एमसीडी प्रति व्यक्ति प्रति दिन २५० लीटर पानी की सप्लाई करता है. यह सामान्य औसत है. दक्षिण दिल्ली में इससे कई गुना अधिक और बाहरी दिल्ली में इससे कम पानी दिया जाता है. फिर भी यह औसत आंकड़ा ही मान लेते हैं. दिल्ली की आबादी १.५ करोड़ है. यानी दिल्ली में प्रतिदिन औसत ३ अरब ७५ करोड़ लीटर पानी की सप्लाई की जाती है. इस पानी का उपयोग किस तरह से किया जाता है? अगर दिल्ली को ही हम उदाहरण मानें तो बाहरी दिल्ली सहित दिल्ली के अधिकांश गरीब इलाकों में पानी की सप्लाई ९२-१०० लीटर के आसपास है. अगर पानी के उपयोग को समझें तो यह बहुत सीमित पानी पर जिंदा रहने की कला है. रेगिस्तान में बसे यूनाईटेड अरब आफ अमीरात में भी प्रति व्यक्ति प्रति िदन पानी की खपत ५५० लीटर है. गल्फ न्यूज द्वारा कराये गये एक सर्वे में पिछले साल यह बात सामने आयी थी कि अमीरात के अमीर लोग बिजली को लेकर तो चिंतित हैं लेकिन पानी को लेकर उन्हें कोई खास चिंता नहीं है.tilak_holi.jpg

दिल्ली कोई डेजर्ट जोन नहीं है फिर भी यहां लोगों को अमीरात से भी औसत आधा पानी मिलता है. (वास्तविकता में तो शायद पांचवा हिस्सा) फिर भी यहां लोगों ने पानी को लेकर शायद ही कभी कोई कलह की हो. क्योंकि भारत में बिगड़ा से बिगड़ा आदमी भी पानी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है. सीमित पानी में गुजारा करना यहां के जीवन दर्शन का अनिवार्य हिस्सा है. इसलिए उन्हें यह कहना कि वे पानी को बर्बाद करते हैं बहुत मूर्खतापूर्ण है. असल में तो उन्हें पानी मिलता ही नहीं है. जितना मिलता है उसमें वे जियेंगे या बर्बाद करेंगे यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. इसके इलट दिल्ली में रईसी द्वारा पानी का उपयोग देखिए. पर्यटन उद्योग से कमाई बनाये रखने के लिए जरूरी है कि विदेशी मेहमान ज्यादा से ज्यादा संख्या में भारत आये. डब्लू-डब्लू-एफ की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में एक विदेशी पर्यटक एक दिन में ३०० से ८५० लीटर पानी खर्च करता है. विदेशी पर्यटक इतने से कम पानी में जी नहीं सकते. पता नहीं भारत में कितने लोग हैं जिन्हें स्वीमिंग पुल में तैरने का मौका मिलता है. लेकिन किसी भी पंचसितारा होटल को पांचतारा तभी मिलता है जब उसके आंगन में स्विमिंग पुल के साथ-साथ हर कमरे में एक बाथ टब लगाया जाए. बाथ टब अलग-अलग साईज के हो सकते हैं. फिर भी एक बाथ टब एक बार नहाने पर २०० से २५० लीटर पानी बर्बाद करता है. अगर विदेशी पर्यटक आपके पानी पर मेहरबानी भी करे और केवल शावर बाथ ले तो भी एक शावर बाथ में औसतन ७५ से ९० लीटर पानी बर्बाद हो जाता है. याद रखिए लगभग इतने ही पानी में दिल्ली का एक नागरिक अपने दिन भर के सारे काम निपटा लेता है. शौच, नहाना, भोजन, पीना और कपड़ा धुलाई भी शामिल है. लेकिन हम इन बातों पर कभी सवाल इसलिए नहीं उठाते क्योंकि हमें लगता है कि जिनकी जेब में पैसा है उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के दुरूपयोग का लाईसेंस अपने आप मिल गया है. कोई कभी यह सवाल नहीं उठाता कि एक गोल्फ कोर्स को हरा भरा रखने में जितना पानी बर्बाद किया जाता है क्या वह पानी का दुरूपयोग नहीं है. एक गाड़ी धोने और चमकाने में प्रतिदिन जितना पानी बर्बाद किया जाता है क्या वह अपराध नहीं है? 

दिल्ली में यमुना का पानी किसी काम का नहीं बचा है. अगर आप चार छह घण्टे यमुना के किनारे पर बैठ जाएं तो आप बेहोश हो सकते हैं. दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार यमुना को लेकर लगातार चिंतित रहती है. पिछले २५-३० सालों से यह चिंता लगातार बढ़ती गयी है और यमुना का प्रदूषण भी. सारी कोशिशों के बाद भी २००० एमएलडी उद्योग से निकला गंदा पानी यमुना जी में रोज बहा दिया जाता है. अगर घरों से निकलनेवाले सीवेज को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो आंकड़ा तीन अरब लीटर (३,२९६ एमएलडी) को भी पार कर जाता है. इस गंदे पानी में विकास की कीमत छिपी हुई है. विकास के नाम पर हमारे शहर जिस तरह के शहरीकरण और औद्योगीकरण को अपना रहे हैं उसमें यमुना की यह दुर्गति होना स्वाभाविक है. लेकिन आश्चर्य इस दुर्गति पर कम सरकार और कंपनियों के रवैये पर ज्यादा होता है. तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी शीला दीक्षित दो बार यमुना के घाट पर उसे साफ करने के इरादे से फोटो खिंचाने गयी थी. दोनों ही बार एक ही संदेश दिया कि लोग अपने घरों का कूड़ा यमुना में न डालें. अपील के साथ साथ एक पुरजोर व्यवस्था यह की गयी कि दिल्ली में यमुना पर बने पुलों को लोहे की जालियों से ढंक दिया गया. यानी यहां भी यह बताने की कोशिश की गयी कि मंदिरों और घरों में पूजा के बाद बचनेवाले फूलों को यमुना में फैंकना बहुत बड़ा अपराध है और सारे प्रदूषण का कारण यही फूल पत्तियां हैं. लेकिन अरबों लीटर सीवेज को जस का तस यमुना में बहा देना विकास के लिए की जानेवाली कुर्बानी  है.

होली में पानी बचाने का अभियान भी कुछ ऐसा ही है. ऐसा नहीं है कि यह भारतीयों के खिलाफ कोई षण्यंत्र है लेकिन इतना जरूर है कि विदेशी दानदाताओं से पैसा लेने के चक्कर में देश के अधिकांश गैर सरकारी संगठनों को इस तरह की चोंचलेबाजी करनी पड़ती है. इससे उनकी दालरोटी चलती है. ऐसे में दैनिक भास्कर समूह को अगर तिलक होली की सूझी है तो इसमें अन्यथा कुछ नहीं है क्योंकि ऐसा करके वे अपने आप को पर्यावरण हितैषी साबित करेंगे और अपने फाउण्डेशन के लिए करोड़ों रूपये फण्ड डकार जाएंगे. सीएसआर की जिम्मेदारी मुफ्त में पूरी हो जाती है. राजेन्द्र सिंह, रामदेव बाबा जैसे लोग भास्कर के कहने पर तिलक इसलिए भी लगाने लगते हैं क्योंकि फोटो न छपे तो इन्हें अपने होने का अहसास ही नहीं रह जाता. लेकिन श्रीमान, रमेश चंद्र अग्रवाल अगर आपको पर्यावरण और पानी की इतनी ही चिंता है सवाल वहां खड़ा करिए जहां सचमुच पानी और पर्यावरण की बर्बादी की जा रही है. क्यों अपने छोटे से फायदे के लिए देश के लोगों को बिना अपराध के अपराध बोध से ग्रसित कर रहे हैं.

मेरी मानें, जमकर होली मनाएं. पानी और पर्यावरण के प्रति आप पहले से इतने जागरूक हैं कि आप इसे अनावश्यक बर्बाद नहीं करेंगे. रमेश चंद्र अग्रवाल और राजेन्द्र सिंह जैसे लोगों की अपील अपने एनजीओ को मजबूत करने का बेतुका प्रयास है. बिना किसी अपराध बोध के न सिर्फ होली मनाएं बल्कि तीन नहीं पांच बार नहाएं. क्योंकि एक बार में आप ज्यादा से ज्यादा २० लीटर पानी खर्च करेंगे. आपके पांच बार नहाने पर जितना पानी खर्च होगा वह किसी अमीरजादे के एक बार नहाने से भी आधा होगा. होली मनाईये, आपके चार पिचकारी चला देने से संसार का पानी खत्म नहीं हो जाएगा वैसे ही जैसे आपके ढिबरी बुझा देने से कार्बन फुटप्रिंट कम नहीं होगा. 

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Suresh Chiplunkar on 10 March, 2009 16:01;01
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बेहद उम्दा, धज्जियाँ उड़ाता, पोल खोलता हुआ लेख…
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समीर लाल on 10 March, 2009 18:43;11
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होली की बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!!
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Arjun Sharma on 10 March, 2009 19:40;22
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cllasicle anylisis
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vishwendra singh on 10 March, 2009 20:40;39
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its good, holi par pani bachaiya, diwali par patake mat calaiye, kya majak hai. rang aur patake banane wale majdor kya kaaige socha hai kabhi.
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Dr. Aazad Singh on 10 March, 2009 20:52;11
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bilkul sahi kaha, isliya mene bhi ek din pahle hi sabko yahi msg kiya he, jiska zikra aapne bhi kiya SHADYANTRA wala.
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यशवंत on 10 March, 2009 21:45;14
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बहुत बढ़िया संजय भाई। बहुत दिन बाद बहुत उम्दा पढ़ने को मिला। कीप इट अप। शुभकामनाएँ।
होली की बधाई।
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Abhimanoj on 10 March, 2009 21:52;09
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es lekh ke liye badhai.tark aur prasutikaran ke liye.thakathit corporet media ke girgit ban jane ki katha khulashe ke liye bhi.
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amarnath on 10 March, 2009 22:37;59
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wah...
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prabhat gopal on 10 March, 2009 22:51;42
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होली की बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!!
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PRASHANT mehrishi on 10 March, 2009 22:55;41
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ye jo NGO ban rahi hai kuchh to atankwadio ke manavadhikaro ke liye kam karti hai aur kuchh hindu samaj ki manyatao ko samapt karne ka prayas kar rahi hai . turant band honi chahiye
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