क्या आपने यावुरू का नाम सुना है
नहीं न. मैंने भी नहीं सुना था. हाल में ही इसके बारे में पढ़ा. यह पश्चिम आष्ट्रेलिया में बोली जानेवाली एक भाषा थी जिसे अब केवल एक ही आदमी बोल पाता है.
आपने यावुरू का नाम सुना है? नहीं न. मैंने भी नहीं सुना था. कल इसके बारे में पढ़ा. यह पश्चिम आष्ट्रेलिया में बोली जानेवाली एक भाषा थी जिसे अब केवल एक ही आदमी बोल पाता है. तो आश्चर्य भी हुआ और भय भी लगा. अभी तो खोजकर्ताओं को वह आदमी मिल गया जो यावुरू बोलता है इसलिए इतिहास में यह दर्ज हो गया कि यावुरू भी एक भाषा थी. लेकिन जहां तक खोजकर्ता नहीं पहुंच पाये होंगे ऐसी कितनी भाषाएं कब-कब लुप्त हुईं और हो रही हैं इसका ठीक अंदाज किसी को है?अनुमान लगाना हो तो कह सकते हैं कि दुनियाभर में सात हजार से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं. अंग्रेजी, चाईनीज, हिन्दी, स्पेनिश जैसी भाषाओं के बोलनेवाले करोड़ों में हैं तो मगाटा जैसी भाषाएं भी हैं जो तीन-चार लोगों की भाषा बन कर रह गयी है. जब ये तीन-चार लोग इस दुनिया से विदा होंगे तो उनके साथ विदा हो जाएगी वह भाषा भी. इस भाषा में ज्ञान की क्या धरोहर, जीवन के कौन से संस्कार और प्रकृति का कौन सा उपहार छिपा होगा वह तो खत्म हो ही जाएगा लेकिन खत्म हो जाएगी वह भावना जो प्रकृति में सह-अस्तित्व से सबको रहने और पल्लवित-पुष्पित होने की जगह देती है.
मेरा होना हो सकता है आपके लिए किसी काम का न हो लेकिन मेरा होना ही अकारण है यह कहना ठीक नहीं होगा. सबका होना जरूरी है. प्रकृति का दूसरा नाम विविधता है. क्योंकि विविधता न हो तो अभिव्यक्ति की सीमाएं लग जाती हैं. यह कभी ठीक नहीं कहा जा सकता है कि आप अभिव्यक्ति को भी सीमाओं में बांध दें. अगर ऐसा करते हैं तो नैसर्गिक शब्द को ही हमें अपनी शब्दावली से निकालना पड़ेगा. जो नैसर्गिक है उसकी कभी सीमा नहीं होती और जो सीमारहित होता है उसमें विविधता तो रहेगी.
प्रकृति में सबको विकसित होने का समान अधिकार प्राप्त है. सत्य को भी और असत्य को भी. अमृत को भी और विष को भी. अच्छे को भी और बुरे को भी. इनका द्वंद और संघर्ष रहेगा और इसका होना ही हमारे होने की सार्थकता है. हमें तय करना है कि हम किस ओर रहें. लेकिन नैसर्गिकता को ही चुनौती मिलने लगे तब? तब क्या करें जब योजनाबद्ध तरीके से हमारी आवश्यकताओं और अभिव्यक्ति का निर्धारण होने लगे? अगर हमें यह शिक्षा मिल जाए कि किसी खास भाषा में ही उन्नति की अच्छी संभावनाएं हैं तो अपनी मूल भाषा को पकड़े रहना बहुत मुश्किल होता है. हो सकता है यह मूर्खतापूर्ण भी हो.
लेकिन कुछ लोग इस स्वाभाविक मूर्खता को ओढ़ लेते हैं. वे अनाम लोग कौन होते हैं जो भाषा, भूषा, भेषज और भोजन की धरोहर पीढ़ी-दर पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं बिना इसकी चिंता किये हुए कि वे दुनिया से अलग-थलग पड़ गये हैं. ऐसे अनाम लोग ही प्रकृति की सच्ची धरोहर होते हैं. मानों कोई गुप्त शक्ति उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है. उन्हें नहीं पता होता कि ऐसा करने का तार्किक कारण क्या हो सकता है. डूबती नाव के साथ तैरने में कोई तार्किक कारण नहीं होता. लेकिन कुछ लोग डूबती नांव को ही अपनी नियती बना लेते हैं. वे इसके साथ तैरते हैं. और उनके साथ तैरती है एक पूरी संस्कृति. युग-काल और परिवेश के अनुकूल होते ही वही डूबती नाव फिर से जहाज बन जाती है.
आज के दौर में बहुत सी भाषाओं, बोलियों, पहनाओं और विविध खान-पान के लिए संकट का दौर है. भाषाविदों के इस भय के साथ इत्तेफाक रखना कितनी सही होगा कि सदी के अंत तक सिर्फ दो हजार भाषाएं ही बचेंगी, पता नहीं. लेकिन कुछ ही भाषाओं में हम व्यवहार करेंगे यह तो साफ दिख रहा है. यह कुछ भाषाओं का सोता उफनती नदी बन जाए यह बाजार की अनियंत्रित ताकते भी चाहती हैं. बाजार की ताकते अमरत्व चाहती हैं. स्थिरता चाहती हैं और समाज पर अपना स्थाई प्रभाव चाहती हैं. यह सब संभव हो इसके लिए समाज और संसार में एकरूपता होना बहुत जरूरी है. भाषा, भूषा, भेषज और भोजन हर स्तर पर एकरूपता होना जरूरी है. यह एकरूपता जितनी प्रगाढ़ होगी कंपनियों को अपना पैर जमाने में उतनी ही आसानी होगी. क्योंकि विविधता कभी मोनोपोली नहीं होने देती.
अब कोई भी कह सकता है कि इसमें हर्ज क्या है? अगर पूरी दुनिया एक जुबान बोलती है तो हम अलग-अलग हिस्सों के निवासी न होकर एक धरती के वासी हो जाएंगे जिसकी एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक भाषा होगी. फिर क्या फर्क पड़ता है कि मैं कौन सी भाषा बोलता हूं? मैं वही जबान बोलता हूं जो सारी दुनिया बोलती है क्या यह पर्याप्त नहीं है? इस सवाल का जवाब तो अपने आप से ही पूछना चाहिए. दिल से भी और दिमाग से भी. मेरा मानना है कि बहुलता में एकता भी होती है निजता भी. शायद हमारे होने की प्रासंगिकता भी. एकरूपता हमेशा नीरस होती है और हमारे होने पर ही सवाल खड़े करती है. अगर हमारी विविधता खत्म हो गयी तो हम बचे भी रहे तो हमारे बचे रहने का प्रयोजन क्या होगा?
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