महात्मा गांधी का आखिरी जन्मदिन
अक्तूबर 1947 की दो तारीख गांधीजी का जन्म दिवस उनके जीवनकाल में मनाया जाने वाला अंतिम जन्मदिवस था। सुबह भोर होते ही उनके दल के लोग उन्हें अभिवादन करने आ गए। उनमें से एक ने कहा, बापूजी हम अपने जन्मदिन पर अन्य लोगों के चरण छूकर आशार्वाद ग्रहण करते हैं. लेकिन आपके मामले में बात इसके बिलकुल विपरीत होती है। क्या यह उचित है?
गांधीजी हंसकर बोले- "महात्माओं के तरीके भिन्न होते हैं. इसमें मेरा कोई दोष नहीं। आपने मुझे महात्मा बना दिया. भले ही मैं नकली महात्मा होऊं, पर अब आप लोगों को सजा तो भुगतनी पड़ेगी."
उन्होंने अपना जन्मदिन हमेशा की तरह उपवास, प्रार्थना और विशेष कताई करके मनाया। उन्होंने बताया कि उपवास आत्मशुिद्ध के लिए है और कताई द्वारा मैं ईश्वरीय सृिष्ट के सबसे दीनहीन लोगों की सेवा में जीवन अर्पण करने के अपने प्रण को दोहराता हूं।
मैंने अपने जन्म-दिवस समारोह को चरखे के पुनर्जन्म के समारोह के रूप में परिवर्तित कर दिया है। चरखा अहिंसा का द्योतक है। वह प्रतीक समाप्त हो गया मालूम पड़ता है। मगर इस आशा से कि शायद चरखे के संदेश के प्रति निष्ठावान कुछ थोडे़ से लोग जहां-तहां हो सकते हैं, मैंने यह आयोजन बंद नहीं किया और इन्हीं लोगों की खातिर चरखाजयन्ती का आयोजन आगे जारी रखने का निर्णय किया।
साढ़े आठ बजे स्नान के बाद जब वे अपने कमरे में प्रविष्ट हुए तो वहां कुछ अंतरंग साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इन लोगों में पंडित नेहरू, सरदार, गांधीजी के मेजबान घनश्याम दास बिड़ला और दिल्ली स्थित बिड़ला परिवार के समस्त सदस्यगण शामिल थे। मीराबहन ने गांधीजी के आसन के सामने का भाग रंगबिरंगे फूलों से कलापूर्ण ढंग से राम और ऊं लिखकर खूबसूरती से सजाया था। एक संक्षिप्त प्रार्थना हुई, जिसमें सबने भाग लिया। उसके बाद उनका एक प्रिय अंग्रेजी भजन-आई सर्व द वन्ड्रस क्रास, गाया गया। साथ ही उनका एक और प्रिय हिन्दी भजन- हे गोविन्द राखे शरण का भी गायन हुआ।
दिन भर राष्ट्रपिता को अपनी श्रद्धांजलि अर्पण करने के लिए आगंतुकों एवं मित्रों का तांता लगा रहा। इसी प्रकार राजदूतावासों से प्रतिनिधिगण भी आए, उनमें से कुछ अपनी सरकार की ओर से गांधीजी के लिए शुभकामना संदेश लेकर आए। अंत में लेडी माउंटबैटन अपने साथ गांधीजी के लिए लिखे गए पत्रों और तारों का पुलिंदा लेकर आईं।
गांधीजी ने सब लोगों से अनुरोध किया कि वे इस बात की प्रर्थना करें कि- ईश्वर या तो इस दावानल को शांत कर दे अथवा उन्हें उठा ले। मैं कतई नहीं चाहता कि भारत में मेरा एक और जन्मदिन होने पाए। वे सरदार से बोले- मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था कि जो ईश्वर ने मुझे इस सारे संत्रास का साक्षी बनने के लिए जीवित छोड़ रखा है. अपने आसपास हो रहे अग्निकांड के बीच वे विवशता की भावना से जकडे़ नजर आते थे। सरदार की पुत्री मणिबहन ने उस दिन अपनी डायरी में दुख प्रकट करते हुए लिखा- उनकी व्यथा असह्य थी। हम लोग उनके पास उत्साह के साथ गए थे, मगर बोझिल हृदय लेकर घर लौटे।
मुलाकातियों के चले जाने के बाद उन्हें खांसी का एक दौरा आया। वे धीरे-धीरे बोलते रहे, यदि प्रभुनाम की सर्वरोगहर प्रभावकारी शक्ति मुझमें व्याप्त नहीं हो जाती, तो मैं इस अस्थिपंजर को त्याग देना अधिक पसंद करूंगा। एक भाई द्वारा दूसरे भाई की हत्या का सिलसिला जारी देखकर मेरी 125 वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा पूर्णतया जाती रही है। मैं इन हत्याओं का विवश साक्षी बनकर नहीं रहना चाहता ।
तो 125 वर्षों से आप शून्य पर पहुंच गए हैं। किसी ने बीच में पूछा- हां, जब तक यह दावानल शांत नहीं हो जाता....।
आकाशवाणी पर गांधीजी का जन्मदिन मनाने के लिए विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने का आयोजन किया गया था। जब गांधीजी से पूछा गया कि क्या आप अपवाद स्वरूप सिर्फ इस बार रेडियो का विशेष कार्यक्रम नहीं सुनेंगे तो उन्होंने उत्तर दिया, नहीं मुझे रेडियो के बजाय रेटियों (चरखा) ज्यादा पसंद है। चरखे की गुनगुनाहट अधिक मधुर है। उसमें मुझे मानवता का निस्तब्ध विषादपूर्ण संगीत सुनाई देता है। गांधीजी ने विश्व के सभी भागों से उनके जन्मदिन पर आए बधाई संदेशों तारों और पत्रों को प्रकाशनार्थ जारी करने से इनकार कर दिया। मुसलमान मित्रों से भी उन्हें अनेक आकर्षक संदेश प्राप्त हुए थे लेकिन गांधीजी ने महसूस किया कि जब आम जनता में सत्य और अहिंसा के प्रति, कम से कम फिलहाल अविश्वास नजर आता है तो यह वक्त इन पत्रों को प्रकािशत करने का नहीं है। (गांधी मार्ग के सौजन्य से)
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