तमाशा चैनलों के नट बहुरूपिया
पतन की कोई सीमा नहीं होती. हिन्दी टीवी चैनलों के क्रियाकर्म देखें तो यह कहावत एकदम सही लगती है. फिलहाल तमाशा चैनलों का नया शगल नट बहुरूपिया है.
खबर से एकरूपता दिखाने के लिए या फिर अपनी ओछी समझ के कारण एंकरों द्वारा वही हो जाने की कला विकसित हो रही है जैसी वे खबर दिखाते हैं. यह कुछ-कुछ नट बहुरूपिया जैसा मामला है. नट बहुरूपिया भारतीय समाज में कलाकार जातियां रही हैं. समय के फेर ने उनको तो पता नहीं कहां मजदूर और बेगार करके छोड़ दिया लेकिन नट बहुरूपियों का काम हमारे टीवी चैनल के एंकरों ने आत्मसात कर लिया है.
कल तक सिर्फ अपराध जगत की खबरों के बारे में ऐसा दृष्टिकोण रखा जाता था लेकिन अब मामला एंकर के विशेष अंदाज में दिखने से आगे चला गया है। कोई खास खबर पेश करने के लिए एंकर अब बहुरूपिया के रूप में सामने आने लगे हैं। इसकी शुरूआत उसी महान आजतक चैनल ने की है जो अपने को सबसे सर्वश्रेष्ठ कहता है। यह वही चैनल है जिसे खबरिया चैनलों का नींवपत्थर कहा जाता है। पिछले कुछ महीनों में बजट, खेल खासतौर पर क्रिकेट, या खली (मूल नाम काली) का मामला हो, चैनल के रिपोर्टर का उसके हिसाब से अपना पहनावा होता है। मानों, उसके दर्शक सुन कर नहीं, देख कर कोई खबर समझ सकते हैं। दरअसल उसने अपने दर्शकों की श्रवण शक्ति हर ली है। चैनल की दुनिया में माना जाता है कि आजतक जो शुरू करता है, बाकी हिंदी चैनल (एनडीटीवी को छोड़कर) उसका अनुसरण करते है। हालांकि इस गंभीर चैनल में आजतक के कुछ रिपोर्टर गए तो वहां यह चर्चा रहती थी कि कहीं माहौल न बिगड़ जाए। खासकर प्रयाग कुंभ के अवसर पर आजतक से गए एक एंकर ने कुंभ स्थल से रिपोर्टिंग करती महिला पत्रकार से पूछा कि उसने स्नान का लुत्फ उठाया कि नहीं? कैसा लगा? क्या किसी महिला से उसके स्नान के बारे में पूछा जा सकता है? इस खबर के बाद ही कानाफूसी शुरू हुई कि यह आजतक से आने का प्रभाव है।
बजट पर चर्चा के समय आजतक के एक स्टार रिपोर्टर गंवई अंदाज में आए, तो एकबारगी लगा कि खबर को रोचक बनाने का प्रयास होगा ताकि उसका दर्शक भाग न जाए। लेकिन इस तरह का अंदाज अब आजतक चैनल की हकीकत बन चुका है। आईपीएल किक्रेट के शुरुआत में एंकर का क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में अवतरित होना बताता है कि वह ऐसे ऊटपटांग प्रयोग करने के लिए अभिशप्त है। यह सच तब सामने आया जब आजतक ने खली को देश के सामने पेश कर दिया। चैनल के स्टार एंकर खली से रिंग में बात करते हुए उससे धींगामुश्ती करते नजर आए। खली ने उनको एक-दो बार पटका भी। कार्यक्रम में खली की पत्नी भी थी। एंकर ने पत्नी से पूछा कि वह खली के साथ प्रेम के एकाध प्रसंग सुनाए। बेहद निजी रिश्ते के बारे में इस तरह पूछा मानो कोई प्रसाद हो जिस पर सबका हक हो। बहरहाल, हद तब हो गई जब नोएडा की अरूषि हत्या के मामले में आजतक के एंकर ने अपनी सहयोगी के साथ जासूसी जामा पहन लिया। दर्शकों को मशहूर जासूसी धारावाहिक करमचंद की याद आ गई। अनोखे अंदाज में मामले का पोस्टमार्टम करने लगे। उनके साथ में एक निजी जासूस था जो हत्या का बारीक संभावनाओं को बता रहा था।
सवाल सीधा है कि क्या बहुरूपिया बन कर खबर पेश कर सच को और ठोस तरीके से कहा जा सकता है। आजतक के पहले संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह आज अगर होते तो कहते नहीं। उनके खबर पेश करने के अंदाज को लोग भूले नहीं हैं। तब पूरा खेल शब्दों का था, बहुरूपिया बनने का नहीं। ऐसी रिपोर्ट पर एतराज जताने के लिए कोई संस्था नहीं है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में एंकरों को बहुरूपिया बनना अनिवार्य कर दिया जाए। दरअसल, चैनलों में होड़ उठने की नहीं, गिरने की है। जितना गिरो, टीआरपी में उतना उठो। सरकार मूकदर्शक है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने जब एक फर्जी स्टिंग आपरेशन के जिम्मेदार लाइव इंडिया चैनल की एक महीने के लिए जुबान बंद कर दी, घबराए सभी चैनल्स ने मंत्रालय को अवगत कराया कि उसने खबरों का मानदंड तय करने के लिए अपने यहां गाइडलाइंस बना ली है जिसका वह पालन करेगा। सवाल यह है खबर क्या केवल अंग्रेजी वालों के लिए हैं। क्या भाषाई आदमी टीवी पर खबर नहीं देख। समस्या यह है कि खबर देखते-देखते हुए अगर वह बहरूपिया बन गया तब चैनलों की क्या जरूरत रहेगी।
एक वरिष्ठ पत्रकार के नाती ने एक चैनल पर अपराध की दुनिया पर खबर पेश करते हुए पत्रकार के हावभाव देखकर कहा कि बाबा यह अपराधी टीवी पर क्या रहा है? ये हिन्दी के जानेमाने पत्रकार हैं और कोई दो साल पहले यह वाक्या एक कार्यक्रम में सुनाया था। उनकी यह बात सुनकर दिमाग में रघुवीर सहाय की वह लाइन घूम गई कि बलात्कार की खबर रोचक ढंग से लिखने का मतलब दूसरा बलात्कार होता है। भले ही यह बात उन्होंने तबके जमाने के प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के बारे में कही गई हो। लेकिन अब ऐसी खबरें जिस मसाले के साथ चैनल्स पर पेश या उनका रूपांतरण किया जाता है, सहाय की याद आती ही है। मानों हर चैनल्स खासकर हिंदी चैनल्स ऐसी ही खबरों की फिराक में रहते हैं कि कब रस का मौका हाथ लगे।
(राजेश कटियार मुक्त पत्रकार हैं. आप उन्हें rajeshkatiyar@rediffmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)
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अभय सिंह
Hume sharm aati hai inn logo ko 'Journalist' kehne me, kya inhe koi iski paribhasha batayega.
Ye log kaise kisi ki maut ko fuhad program me badal kar TRP ka khel rach sakte hai.
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