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माइक्रोसाफ्ट से सावधान

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क्या आप मानेंगे कि दुनिया की सबसे बड़ी आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को `सन माइक्रोसिस्टम्स` या `लिनक्स` से नहीं, बल्कि 18 साल के एक कनाडाई किशोर से खतरा है? माइक्रोसॉफ्ट के वकीलों की फर्म `स्मार्ट एंड बिगर` ने वेंकूवर के हाईस्कूल छात्र माइक रो को महज इसलिए 25 पेज का कानूनी नोटिस भेजकर भयभीत कर दिया क्योंकि उसने अपनी वेबसाइट (माइक रो सॉफ्ट.कॉम) शुरू की थी।

माइक्रोसॉफ्ट ने दावा किया कि माइक ने अपनी वेबसाइट के जरिए उसके ट्रेडमार्क को चुनौती दी थी। लेकिन शायद ही कोई व्यक्ति `माइक रो सॉफ्ट.कॉम` नाम पर माइक के अधिकार से असहमत हो। क्या माइक्रोसॉफ्ट किसी के नाम पर आपत्ति कर सकता है? और किसी व्यक्ति का उसके अपने ही नाम से कारोबार करना अवैध माना जाएगा?

टकराव एक किशोर से

बताया जाता है कि दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बिल गेट्स की कंपनी ने माइक को यह नाम छोड़ देने के लिए दस डॉलर की पेशकश की थी- लगभग उतनी ही रकम, जितनी कि एक डोमेन नेम पर खर्च होती है। जवाब में माइक ने दस हजार डॉलर मांगे। उसे यह रकम मिली या नहीं, यह तो पता नहीं लेकिन इस विवाद से माइक की वेबसाइट इतनी ज्यादा लोकिप्रय हो गई कि महज 12 घंटे में उस पर ढाई लाख विजिटर आ गए और वह इतना वजन नहीं उठा सकी। दूसरी तरफ माइक्रोसॉफ्ट के हाथ क्या लगा? बताया जाता है कि अपने बर्ताव की खिल्ली उड़वाने के बाद उसे अंतत: माइक से क्षमायाचना करनी पड़ी। उसने कहा- हम अपने ट्रेडमार्क के उल्लंघन को बहुत गंभीरता से लेते हैं। ऐसे मामलों पर कार्रवाई करने को हम कानूनन मजबूर हैं। लेकिन इस मामले में, लगता है हमने कुछ ज्यादा ही गंभीरता दिखा दी।

सबसे सफल आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट संभवत: कानूनी पचड़ों में सबसे ज्यादा फंसी हुई कंपनियों में से भी है। अपने उत्पादों से जरा भी मिलते-जुलते नाम वाली कोई चीज नजर आने पर वह मुकदमा ठोंकने में पीछे नहीं रहती। बकौल माइक्रोसॉप्ट- हम अपने ट्रेडमार्क और प्रतिष्ठा की पूरी ताकत लगाकर सुरक्षा करते हैं। अगर कोई व्यक्ति इंटरनेट कनेक्शन लेकर और एक वेबसाइट बनाकर हमारी कारपोरेट छवि को नुकसान पहुंचाएगा तो हम चुप नहीं बैठने वाले। संदेश साफ है- ऐसे मामलों में माइक्रोसॉफ्ट अपनी `लीगल एडवाइजरी काउंसिल` और सैकड़ों वकीलों के जरिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। उसे पैसे और प्रतिष्ठा के नुकसान की परवाह नहीं। एक ब्लोगर ने माइक रो के मामले पर टिप्पणी करते हुए लिखा था- भई माइक, जरा बचना। कहीं माइक्रोसॉफ्ट तुम्हारे डोमेन नेम के साथ-साथ तुम्हें, तुम्हारे परिवार को, तुम्हारे घर, गली और द्वीप को ही न खरीद ले, और फिर `डिलीट` बटन दबा दे!

सौ करोड़ में नाम-परिवर्तन!

माइक्रोसॉफ्ट ने लिनक्स आधारित `लिंडोज` ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित करने वाली माइकल राबर्टसन की `लिंडोज` कंपनी को भी अदालत में घसीटा था। उसने `लिंडोज` पर ट्रेडमार्क उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा कि उसका नाम माइक्रोसॉफ्ट के `विंडोज` आपरेटिंग सिस्टम से मिलता है। बहरहाल, अदालत ने उसकी बात नहीं मानी, बल्कि खुद माइक्रोसॉफ्ट के ट्रेडमार्क को शक के दायरे में खड़ा कर दिया। अदालत का कहना था कि `विंडोज` (खिड़की) अंग्रेजी का एक आम शब्द है, कोई मौलिक नाम नहीं। अदालत को शक था कि शब्दकोश में मौजूद इतने आम शब्द (जेनेरिक वर्ड) पर अगर माइक्रोसॉफ्ट को ट्रेडमार्क मिल गया तो कैसे? माइक्रोसॉफ्ट के लिए तो सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए। अंतत: उसने पिछले रास्ते से अपनी बात मनवाने के लिए करीब सौ करोड़ रुपए की रकम दी। अब राबर्टसन ने अपने आपरेटिंग सिस्टम का नाम `लिनस्पायर` कर दिया है। सौ करोड़ में नाम बदलना भला क्या बुरा है?

माइक्रोसॉफ्ट ने मुकदमों के मामले में पत्रकारों को भी नहीं बख्शा। उसने मैकओपीनियनण्कॉम के स्तंभकार मार्क जेडर के खिलाफ करीब सवा दो सौ करोड़ रुपए के हर्जाने का दावा ठोंकने का एलान किया क्योंकि उन्होंने अपने लेख में `माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्सप्लोरर` को सिर्फ `इंटरनेट एक्सप्लोरर` लिख दिया था। माइक्रोसॉफ्ट ने कहा- यह `इंटरनेट एक्सप्लोरर` या `आई-ई` नहीं है, यह `माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्सप्लोरर` है। बिना `माइक्रोसॉफ्ट` शब्द जोड़े उसके नाम को लिखा जाना हमारे ट्रेडमार्क का उल्लंघन है। अब अगर माइक्रोसॉफ्ट यह मुकदमा जीत जाता है तो फिर उसके लिए तो सोने की खान ही निकल आएगी। दुनिया भर में रोजाना लाखों लोग इस शब्द को `माइक्रोसॉफ्ट` नाम लगाए बिना लिखते या बोलते हैं। क्या अब उन सबको करोड़ों रुपए का हर्जाना अदा करना पड़ेगा?

पाबंदी सिर्फ दूसरों के लिए

अब जरा मामले के दूसरे पहलू को देखें। माइक्रोसॉफ्ट का विश्वविजेता आपरेटिंग सिस्टम `विंडोज` बाजार में आने से पहले ही स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय ने `डब्लू विंडो` नामक पैकेज जारी कर दिया था। एमआईटी का `एक्स-विंडो` नामक यूनिक्स आधारित आपरेटिंग सिस्टम भी नवंबर 1985 में `विंडोज` जारी होने के एक साल पहले से उपबल्ध था। तो फिर माइक्रोसॉफ्ट का `विंडोज` शब्द प्रयोग करना ट्रेडमार्क का उल्लंघन नहीं है? माइक्रोसॉफ्ट के उत्पाद `विजुअल जावा` (लैंग्वेज पैकेज), `माइथिका` (कंप्यूटर गेम) आदि भी इसी तरह के विवादों में घिरे रहे हैं। लेकिन उसे इसकी परवाह नहीं। वह अपने खिलाफ मुकदमा करने वालों को खरीदने की क्षमता जो रखता है। अब जब भी आप खिड़की (`विंडोज`), दतर (`आफिस`), नजरिया (आउटलुक) आदि शब्द बोलें तो जरा संभलकर और कायदे से बोलें। इन शब्दों के ट्रेडमार्क माइक्रोसॉफ्ट के पास हैं।

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y on 13 August, 2008 00:51;49
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bahut achchha
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rajeev jain on 23 August, 2008 03:15;29
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bahut hi acchi jaankari
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image बालेन्दु दाधीच माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.
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