गाय भैंस चराएंगे, ओलंपिक पदक लाएंगे
कारपोरेट मीडिया देश के तथाकथित कारपोरेट विशेषज्ञों के हवाले से हमें बता रहा है कि भारत में ओलंपिक पदक लाने की अकूत संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं बशर्ते पैसा पानी की तरह बहाया जाए. प्रशिक्षण को विश्वस्तर का बनाया जाए. निश्चित रूप से इससे व्यापार की अकूत संभावनाएं पैदा होगी जिसका कुछ फायदा इन सलाहकारों को भी मिलेगा. इस शोर के बीच मंगल सिंह की आवाज भी सुनी जानी चाहिए. वे किसान पत्रकार हैं और उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में रहते हैं. ओलंपिक में ग्रामीणों के प्रवेश से पैदा होनेवाली संभावना पर मंगल सिंह कह रहे हैं कि....
यदि सरकार ईमानदारी से देखें तो दूर दराज के गांवों में आज भी ऐसे अनेक लोग गांवों में मिल जांयेंगे ,जो रूखी सूखी खाकर जी रहे है या पषु चराते हैं । उन्हें खोजे एवं अवसर दे तो ओलंपिक में सोना जीतने वालों को मात दे सकते हैं एवं विश्व रिकार्ड तोड सकते हैं। बात है सिर्फ उन्हें सरकार अवसर तो दे।ग्रामीण तो एक डेढ मीटर का हाई जंप एवं एवं 5-6 मीटर का लांग जंप तो रोज ही लगाते रहते हैं ।
वेट लिफ्टिंग में काजू किशमिश रस मलाई खाकर जितना बजन दो सेकिण्ड को उठाकर रस मलाई खाने वाली शहरी महिला ओलंपिक में सोना जीतती है ,क्या रूखा सूखा खाने वाली ग्रामीण महिला जितना बजन या घास का गट्ठा 2-3 कि0मी0 दूर से लाती है ,क्या उतना बजन शहरी महिला ला सकती है?
पर ग्रामीणों को कौन पूंछता है? उनके लिये कोई स्कीम कहीं नहीं । यदि शहरी आदमी से कहा जाय कि लगातार 400 क्यूविक फीट चार खन्ती मिट्टी खोदकर सर पर रखकर या लेकर 10-20 मीटर पर दूर डालो ,कितने समय में डाल पाते हैं? फिर ग्रामीण से कहा जाय । पर सरकार ऐसे कार्यक्रम नहीं रच सकती । क्योंकि इसमें तो बाजी ग्रामीण ही मारेंगे । यदि शहर का आदमी बाजी मारेगा तो उसे तो घर आने से पहले ही दो करोड की धोषणा सरकार कर देगी लेकिन यदि ग्रामीण चार खन्ती मिट्टी सबसे कम समय में भी डाल देगा या चार घण्टे में तो उसे आधा दिन की भी मजदूरी सरकार नहीं देगी यदि आदेश भी हो जाये तो बीच में ही अधिकारी खा जांयेंगे।
क्या सरकार मजदूरों ग्रामीणों के लिये कोई ऐसी योजना बनायेगी कि जो मजदूर 5 घंटे में सबसे ज्यादा मिट्टी खोदेगा उसे एक करोड तो क्या एक लाख देगी? हर्गिज नहीं। ठीक इसी प्रकार से हमारे गांव का ओम प्रकाश नामक गवर्नमेंट इन्टर कालेज ललितपुर के 12वीं कक्षा के छात्र को अक्षय ऊर्जा दिवस के क्रम में पुलिस लाइन में हुई दौड प्रतियोगिता में शामिल नहीं किया तो दौड के समय ओम प्रकाश एक तरफ चुपचाप बगल में खडा रहा. ज्यों ही सीटी बजी तब सबके साथ वह भी दौड पडा, जो प्रथम रहा था। फिर आयोजकों को मजबूर होकर जिलाधिकारी के कर कमलों से उसे प्रमाण पत्र भी देना पडा था।
यदि ग्रामीण इलाकों में सरकार रूखी सूखी खानें वालों को खोजे तो ऐसे अनेक ग्रामीण दूर दराज के गांवों में मिल जायेंगे।जो सरकारी धन से काजू किषमिष रस मलाई खाने वाले बिन्द्रा एवं विजन्दर को अपनी कांख में दवाकर ले जायेंगे । सरकार दूर दराज के आदिवासी इलाकों में तीर कमान वालों को खोजे तो बिना कोच के ही ट्रेनिंग वाले गांवों में विश्व रिकार्ड बनाने बाले तीरंदाज एवं गोली से धागा में बंधी लोंग उडा देने वाले मिल जांयेंगे ।
सरकार सिंचाई के नाम पर 5 लाख रू0 प्रति हैक्टर फूंकती है एवं जो अधिकारी एनजीओ फैक्टरी वाले सिर्फ कागजों में ही सिंचित करते है।उन्हे करोडों की धनराशि देती है जो ग्रामीण मौके पर अपनी ग्रामीण तकनीकी से बिना डीजल बिना बिजली पानी लिफ्ट करके मोके पर 100 हैक्टेयर बंजर जमीन में मात्र 5-10 हजार रू0 प्रति हैक्टेयर में हरियाली करता है उसे मात्र 6400 रू0 उस डिवाइस की इण्डिया में मार्केटिंग को देती है. भारत सरकार की ग्रामीण तकनीकी विकास परिषद (कपार्ट) जितने की एक बार में उसके अधिकारी फाइव स्टार होटल में चाय बैठ कर चाय पीते हैें । अक्षय ऊर्जा दिवस पर देशद्रोहियों को संरक्षणता देने वाली सरकार उसका नाम तक नहीं लेती । काश ! सरकार ग्रामीणों की उपेक्षा करने वाली न होती तो खेल चैनल से पहले ग्रामीण कृषि चैनल चालू करती एवं सभी समाचार पत्रों से कहती कि खेल समाचार बिजनेस पेज की भंाति ग्रामीण कृषि पेज चालू करें जिसमें सिर्फ ग्रामीणों के ही विचार एवं समस्यायें छपें ।
वैसे अब किसी भी राष्ट्रीय पुरस्कार का कोई महत्व नहीं रहा उसकी गरिमा तो पूर्णत: समाप्त हो चुकी है। प्रजातंत्र पूर्णतः समाप्त हो चुका है सिर्फ माफिया तंत्र शेष है। ज्ञात हो जिला ललितपुर के ही एक ऐसे अध्यापक बालकृष्ण नायक जिसने 35 साल से स्कूल की शक्ल नहीं देखी, जो कांग्रेस के पूर्व सांसद श्री सुजानसिंह बुन्देला के यहां 24 घण्टे हैड मुनीमी का कार्य करता चलाया आया एवं फ्री का बेतन भी पाता रहा, ऐसे व्यक्ति को डा0 कलाम द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।एवं सभी अखबरों ने भी इस कहानी को छापा ।
(मंगल सिंह ने मंगल टरबाईन का आविष्कार किया है जो छोटे झरनों और जलस्रोतों के सहारे काम करता है घरेलू काम-काज और कुटीर उद्योग की बिजली जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. अपने इलाके में इसके कई सफल प्रयोग उन्होंने किये हैं. लेकिन सरकार और किसी कंपनी ने उनके इस छोटे बिजली घर को कोई महत्व नहीं दिया.)
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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क्षमा चाहता हूं लेकिन अापकी विवेचना बहुत ही सतही और अतार्किक है। विजेंदर और बिंद्रा ने तमाम कमियों और परेशानियों के बावजूद सफलता हासिल की है, सरकार की दूध मलाई खाकर नहीं। विजेंदर तो आपके अंध ग्रामीण प्रेम के मानदंडों पर भी खरा उतरता है। शायद आपको पता नहीं होगा, लेकिन वो हरियाणा के एक छोटे से गांव के निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है। बिंद्रा अमीर है, और यह बेहद गर्व की बात है, कि उसके परिवार ने सुविधाओं के अभाव का रोना न रोकर अपने खर्चे पर उसको प्रशिक्षण दिलवाया। पैसा उसका, जी तोड मेहनत उसकी, स्वर्ण पदक राष्ट्र का।। आप कौन होते हैं उसपर लांछन लगानेवाले?
भारत की प्रगति के लिये शहर और गांव, दोनों की प्रगति आवश्यक है। अगर खेलों को ही लें, तो इस बार विजेन्दर और सुजीत कुमार, ये दोनों पदक विजेता ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। तीरंदाजी और एथलेटिक्स मे तमाम खिलाडी गांवों से हैं।
आपकी बात सही है कि सरकार की तरफ से जितनी कोशिश होनी चाहिये, उसकी १०% भी शायद ही होती हो। लेकिन या तो हम रोना लेकर बैठे रहें, या तो विजेंदर, सुजीत और बिंद्रा की तरह मुश्किलों को हरा कर ही दम लें।
आपने अपने लेख मे एक ग्रामीण तकनीक का जिक्र किया। उस तकनीक के विकास और प्रचार के लिये सरकार पर निर्भर रहने की क्या आवश्यकता है? अव्वल तो अगर वह तकनीक इतनी असरकारी है तो ग्रामीण उसे स्वतः अपना लेंगे, और धीरे धीरे आविष्कारक का धंधा चल निकलेगा। यदि ऐसा नहीं है, तो आज देश मे ऐसी बहुत सी संस्थाएं हैं, जो जमीनी खोजों को बढावा दे रही हैं। मिसाल के तौर पर श्री अनिल अग्रवाल (अाइ अाइ एम अहमदाबाद) की संस्था (www.gian.org)। कई micro finance वाली संस्थाएं भी हैं, जो छोटे उद्यमियों को कर्जा देती हैं (sksindia.com)।
आज भारत मे तरक्की करने के तमाम रास्ते हैं। जो उद्यमी हैं, वो सफलता का मार्ग ढूंढ ही लेंगे।
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