Home | बात करामात | गगन घटा गहरानी हो-1

गगन घटा गहरानी हो-1

image

हिन्दी दिवस आया और इस बार बम धमाकों के शोर के बीच चुपचाप चला भी गया. कई मायनों में यह अच्छा ही हुआ. साल-दर-साल साल कमजोर होती हिन्दी पर भारी पड़ते दिवस और समारोह जितनी जल्दी रूकें उतना अच्छा. इस मौके पर प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में दो किश्तों में एक लेखमाला लिखी है. भाषा के लिए भाव से लिखे गये ये लेख ऐतिहासिक हैं और आनेवाले वक्त के लिए धरोहर साबित होंगे. हम वह लेखमाला सादर प्रस्तुत कर रहे हैं.

हिन्दी भाषा के रूप में मर कर गरीब से गरीब और पिछड़ों से पिछड़े लोगों की बोली होकर रह जाएगी ऐसा डर एक नहीं कई बोलने वालों ने बताया। मौका दिया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में `हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी´ पर दो दिन की गोष्ठी ने। उनका कहना था- ज्ञान आयोग ने पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की सिफारिश की है। चौथी-पांचपीं से सभी विषय अंग्रेजी में पढ़ाने की बात भी कही गई है। कई राज्यों ने प्राथमिक स्कूलों में ही अंग्रेजी पढ़ाना शुरू भी कर दिया है।महानगरों और नगरों में ही नहीं कस्बे-कस्बे और गांव-गांव में अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं क्योंकि मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहते हैं। वही लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल में पढ़ाते हैं जिनके पास उतना पैसा नहीं कि अंग्रेजी पढ़वा सकें। यह सारे देश में मान लिया गया है। कि ज्ञान और बड़ी नौकरी और नए संसार की भाषा अंग्रेजी है। हमारे मित्र राजकिशोर ने अपने पर्चें में कहा- `इस तरह हिंदी पहली बार गरीब की जोरू बन (रही है) जिसके लहंगे के साथ कोई भी कभी भी खेल सकता है।´िशक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी के इस बोलबाले के बाद प्रौद्योगिकी भी अंग्रेजी को बढ़ाने और फैलाने में लगी है। मोबाइल पर संदेश नई किस्म की अंग्रेजी में आते जाते हैं। इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी है। अखबारों और विज्ञापनों का काम अब हिंदी से नहीं चलता। उनमें अंग्रेजी मिलाना अनिवार्य हो गया है। अध्यापक और आलोचक अजय तिवारी ने कहा-`जिन नागरिकों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी िशक्षा और रोजगार में है उनका माध्यम अंग्रेजी बन चुकी है।

हिंदी उन्हीं का माध्यम है जिनकी पहली-दूसरी पीढ़ी शिक्षा तक पहुंची है। ऐसे अधिकतर लोग निम्न और निम्न-मध्यवर्ग से हैं। इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों पिछड़े वर्ग और स्त्रियों की है।´ राजकिशोर और राहुल देव दोनों ने अपने-अपने ढंग से जो कहा- उसका मतलब है कि हिंदी जो भी आज बची हुई है या बचेगी वह हिंदी इलाके के पिछड़ेपन के कारण बचेगी। यानी पढ़े-लिखे और खाते-पीते हिंदी वाले की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है यह हो जाएगी। विकसित और महाबली भारत को हिंदी की कोई जरूरत नहीं होगी। इन लोगों के भाषण और पर्चे छोड़ दें और अपने आसपास अपनी ही नजर से देखें तो अंग्रेजी का जितना बोलबाला ओर हिंदी की जितनी अनदेखी आज हमारे सार्वजनिक, सामाजिक और निजी जीवन में हो रही है अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी। विकास मार्ग का निर्माण विहार के मेरे घर के पास मेट्रो स्टेशन बन रहा है। उस पर किसके लिए अंग्रेजी में-निर्माण विहार स्टेशन लिखा हुआ है मैं नहीं जानता। जो उसे बना रहे हैं सब हिंदी बोलते हैं। मेट्रो चलने पर जो उसका उपयोग करेंगे सब हिंदी बोलने वाले होंगे। फिर अंग्रेजी में निर्माण विहार स्टेशन किस के लिए और क्यों लिखा गया है? शान के लिए? प्रतिष्ठा के लिए? या हमारे मध्यवर्ग के लिए जो मानता है कि अंग्रेजी ही हमें विकसित और महाशक्ति बनाएगी?

दिल्ली को छोिड़ए और बनारस को देखिए जहां इस बार मैं नाग पंचमी के दिन था। सेंट जोन्स की नर्सरी में पढ़ने वाले हमारे मित्र के पोते ने कहा-मेम ने बताया कि आज स्नेक एनवर्सरी है। सुन के हमारे मित्र का सिर लटक गया- जनता हूं कि यह शर्मनाक और अपसंस्कृति है। लेकिन वहां नहीं पढ़ाऊं तो लोग कहेंगे कि बच्चों को पिछड़ा छोड़ दिया। फिर उनने उत्तर प्रदेश के एक नामी नेता का किस्सा सुनाया जिनका बड़ा बेटा उन्हें इसलिए गाली बकता था कि उसे उनने हिंदी में पढ़वाया और अंग्रेजी में पढ़ा उनका छोटा बेटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में मौज कर रहा है। वे उत्तर प्रदेश के बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रख्यात हिंदी सेवी थे। सरकारी और निजी दफ्तरों में ही नहीं कारखानों और बाजारों में भी अंग्रेजी का ऐसा ही दबदबा आप देख सकते हैं। जानकर कहते हैं कि महानगरों की नकल नगरों में ओर नगरों की नकल कस्बों और गांवों में होती है। जिस रास्ते पर महाजन जाते हैं वही सही रास्ता है। और भारत का महाजन यानी भद्रलोक यानी प्रभुवर्ग अंग्रेजी को ऐसे पकड़ रहा है जैसे वही उसे धनी और महाबली बनाएगी। इन्हीं के महानगरीय भारत को नया इंडिया कहा जा रहा है जो अगले दस-बीस बरस में विश्व की महाशक्ति हो जाएगा। यह महाशक्तिमान भारत किस भाषा में बोलेगा? शक्ति की तो एक ही भाषा यह जानता है- अंग्रेजी। दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने जब सत्याग्रह करना तय किया तो उन्हें बहुत खटका कि अपनी लड़ाई के लिए अपना शब्द भी नहीं है- इसे सिविल डिसओबिडियन्स- कहना पड़ेगा। तब उनने सदाग्रह और फिर सत्याग्रह निकाला। मौलिक काम करने वालों के पास अपना मौलिक शब्द होता है। महाशक्ति इंडिया के पास बोलने को क्या होगी- हिंगलिश! कोई मानेगा कि यह महाशक्ति और उसकी भाषा है?

अगर आप मनमोहन सिंह की नव उदार अर्थव्यवस्था के आने के पहले जन्में हैं तो नििश्चत ही जानते हैं कि सन नब्बे के पहले ये हाल नहीं थे। हमारे इंडियन एक्प्रसप्रेस में मुलगावकर और जॉर्ज वर्गीज जैसे अंग्रेजी दां संपादक थे जो खुद होकर हमें आकर कहते थे- भविष्य तो आप हिंदी वालों का है। राजकुमार केसवानी की यूनियन कारबाइड के कारखाने के बारूद के ढेर पर बैठे होने की जो खबर जनसत्ता में छपी थी और जिस पर उन्हें भगवानदास गोयनका पुरस्कार मिला था- उसका अंग्रेजी अनुवाद एक्सप्रेस में न छपने पर रामनाथ गोयनका ने परेड करवा दी थी। अखबार ही नहीं सत्ता के केंद्रों और प्रतििष्ठत संस्थानों में अंग्रेजी चलती थी। पर आम धारणा थी कि भविष्य तो हिंदी और भारतीय भाषाओं का है और लोग मेहनत करके हिंदी सीखते और प्रयत्न करके बोलते थे। माना जाता था कि भारत जब सही मानो में अपनी वाली पर आएगा यानी लोकतंत्र अपने केा सचमुच प्रकट करेगा तो हिंदी के साथ दूसरी भारतीय भाषाएं भी चलेंगी। अंग्रेजी रहेगी एक भाषा के नाते लेकिन राज तो भारतीय भाषाओं का ही होगा।

फिर क्या हो क्या गया? भारत पर फिर से अंग्रेजों का साम्राज्य तो स्थापित नहीं हुआ? सन इकानवे में भाषाविद और संस्कृतिविज्ञ नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह केा वित्त मंत्री बनाया और भारत ने विश्व बैंक के उबाव में उसी के नुस्खों पर अपनी अर्थव्यवस्था को खोला। भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण नई अर्थसंहिता के मंत्र बने। भूमंडलीकरण के आंधी की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि यह अमेरिकी और यूरोपीय पूंजी का भूमंडलीकरण था। इस उग्गत की पूंजी यानी सरप्लस केपिटल को भारत में चलाने की भाषा अंग्रेजी थी क्योंकि भूमंडलीकरण करवाने वाले विदेशी ओर करने वाले देसी दोनों की ही उसमें सुविधा थी। यही नहीं, प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह ऑक्सफोर्ड में सम्मान लेने गए तो उनने कहा कि आपकी सिखाई अंग्रेजी हमें आती न होती तो आज सूचना क्रांति में हमारा यह स्थान नहीं होता। भूमंडलीकरण तो और भी देशों में हुआ है लेकिन उनने उसे अपनी भाषा में किया। भारत के नेताओं, नौकरशाहों और भद्रलोक ने पूंजी के इस भूमंडलीकरण के लिए अंग्रेजाी को ही चुना। भारत के वसुधैव कुटुंबकम और पूंजी के इस नए भूमंडलीकरण का फर्क न समझने वाले बेचारे भोले लोग भूल जाते हैं कि इस भूमंंडलीकरण का भाषा, ज्ञान और संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। पिछले सत्रह वर्षों में जो भी परिवर्तन आप भारत में देख रहे हैं वे अप्सरा पूंजी के भूमंडलीकरण के अवांछित परिणाम हैं। पूंजी और मुनाफे को चूंकि नवउदार अर्थव्यवस्था ने ब्रह्म और मोक्ष का पर्याय बना दिया है इसलिए आध्याित्मक भारत भी माया के जबरदस्त फेर में पड़ गया है। अ बवह भारत भी नहीं रहना चाहता है। समाज, संस्कृति, धर्म और भाषा के जो पारंपरिक नियंत्रण और संतुलन जैविक ग्रामीण समाज में होते हैं वे महानगरों में टूट गए हैं। वे स्वच्छंद महाउपभोग के केंद्र हो गए हैं। और इसीलिए आप एक ऐसा इंडिया बनते देख रहे हैं जिसकी न अपनी कोई भाषा है न अपनी कोई संस्कृति। जिसमें किसी भी तरह कमाने और कितने ही और कैसे ही उपभोग की छूट हो वही इसकी संस्कृति, भाषा और जीवन शैली बन सकती है।

भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण ने अमेरिकी जीवन स्तर को इस नए इंडिया का लक्ष्य बना दिया है। उसे समझ नहीं आता कि खुद अमेरिका में भी सबको एक समान जीवन स्तर प्राप्त नहीं है और वहां भी तेरह प्रतिशत गरीबी है। वहां दुनिया की छह फीसद आबादी विश्व के तीस प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रही है। भारत का तो मध्यवर्ग ही अमेरिका से बड़ा है। भारत के सब लोगों को अमेरिका जीवन स्तर देने के संसाधन भारत में तो क्या दुनिया में भी नहीं हैं। इसीलिए भारत कुछ भी कर ले तथाकथित अमेरिका नहीं हो सकता। अमेरिकी सपना भारत के लिए असंभव है भले ही वह महान आर्थिक शक्ति हो जाए। लेकिन भारत में जो अंग्रेजीकरण होता हुआ आप देख रहे हैं वह पूंजी के भूमंडलीकरण से उपजे अमेरिकी सपने का ही नतीजा है। इस अंग्रेजीकरण में न अंग्रेजी की समझ है न यूरोपीय संस्कृति और ज्ञान की समझ। इसमें अमेरिका की स्वतंत्रचेता आत्मा के खुद के माने हुए बंधन भी नहीं हैं। कहते हैं नकल सिर्फ छिछली और भदेस चीजों की होती है। भारत में खासकर उसके मध्यवर्ग में वही हो रहा है।

जिस अंग्रेजी और जिस अमेरिकीकरण के कारण हिंदी और भारतीय जीवन पद्धति केा आप ग्रहण में पड़ी देख रहे हैं वह अंग्रेजी भाषा, यूरोपीय संस्कृति और अमेरिकी जीवन पद्धति के कारण नहीं- अमेरिकी- यूरोपीय पूंजी के भूमंडलीकरण की वजह से है। अप्सरा पूंजी इस लवारे को अपने साथ लाई है। आप जानते ही हैं कि सत्रह साल पहले भारत में यह परिस्थिति नहीं थी। भारतीय भाषाओं का अपना स्थान और सम्मान था। भविष्य हिंदी का माना जा रहा था क्योंकि भारत को भारत की तरह का भारत बनना था। जो सपना एक सौ नब्बे साल के संघर्ष में से निकला था वह सिर्फ सत्रह साल के पूंजी के भूमंडलीकरण से समूल नष्ट हो सकता है?

इस भूमंडलीकरण से मालामाल हुए लोग आपको बार-बार कहेंगे कि इसका कोई विकल्प नहीं है और यह जो प्रक्रिया चल रही है उसे अब सुई के कांटों की तरह वापस नहीं घुमाया जा सकता। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह कोई पहला भूमंडलीकरण नहीं है जिसमें भारत पड़ा है। साम्रज्यवद भी एक भूमंडलीकरण ही था जिसके जरिए यूरोपीय देशों ने एिशया, अफ्रीका, अमेरिका आदि महाद्वीपों में अपने साम्रज्य कायम किए थे। भारत को सभ्य बनाने के लिए अंग्रेज हम पर राज करने आए ही थे और हमें उन्हें वापस इंग्लैंड भेजना पड़ा था। भूमंडलीकरण के दिन भी अब आ गए हैं। इन्हीं लोगों का कहना और भय है कि चीनी और भारतीय पूंजी अगले दस-बीस बरस में दुनिया पर छा जाएगी। तब भी क्या अमेरिकी पूंजी से बना अंग्रेजी का दबदबा भारत और भारतीय पूंजी अंग्रेजी में राज करेगी?

Subscribe to comments feed Comments (2 posted):

t k marwah on 15 September, 2008 21:57;36
avatar
res.Joshi ji HINDI par aapki kasak bilkul jayaj he par aap videshon ki baat kar rahin hain par hamare apne hi desh main dunia ki sabse badi mumbai main ek star hindi main boli to unke pure pariwar par kahar toot pada aur pura desh kamosh raha aur akhirkar unhhen mafi mangni padi KYON ?........
Thumbs Up Thumbs Down
0
amarnath on 16 September, 2008 22:45;14
avatar
Hindi Divas aur Samvidhan me Ese mile adhikaro ki asali halat yeh hai ki Bharat sarkar ke adhin Chalane wale EK SCHOOL KE BACHE hINDI ME BOLANE KI WAJAH SE SAJA KE HAKDAR HOTE RAHE HAI. eesko jagjahir karane ke apradh me Gyandeo Tripathi namak shikshak ki naukari gayi, to ab tak unhe yogyata ke anurup naukari nahi mili.
amarnath
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
Rate this article
5.00
More from बात करामात
Previous
image
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
image
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
image
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
image
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
image
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
image
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
image
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
image
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
image
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
image
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
image
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
image
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
image
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
image
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
image
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
image
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
image
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2