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वन्दे विशुद्ध विज्ञानौ

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अमेरिका के ट्रिनिटी कालेज ने एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट का नाम है वर्ल्ड व्यू एण्ड ओपीनियन्स आन साईंटिस्ट. मोटे तौर पर साररूप में समझना हो समझिए कि रिपोर्ट

इस बात के लिए भारतीय वैज्ञानिकों को हेय दृष्टि से देखती है कि वे आस्थावान होते हैं. मई 2007 से जनवरी 2008 के बीच भारत के 11 वैज्ञानिकों का एक सर्वे किया गया. यह सर्वे ट्रिनीटि कालेज के इंस्टीट्यूट फार द स्टडी आफ द सेकुलरिज्म इन द सोसायटी एण्ड कल्चर द्वारा किया गया. इस अध्ययन में देश के 130 विश्वविद्यालयों, कालेजों और तकनीकि संस्थानों को शामिल किया गया था. संभवतः इस अध्ययन का मूल मकसद यह देखना था कि भारत में ईसाई विज्ञान कितना गहरा पैठा है और अभी इसे कितना और नीचे धंसना है. इस रिपोर्ट की समीक्षा के पहले खुद उस आईंसटीन से बात शुरू करते हैं जो पश्चिम के विज्ञान की आधारशिला समझे जाते हैं.

आईंसटीन के बारे में एक पत्र आज से आठ साल पहले द हिन्दू में छपा था जिसमें लिखा गया था कि एक भारतीय वैज्ञानिक से आईंसटीन ने पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं. उन वैज्ञानिक महोदय ने जैसे ही कहा कि वे संस्कृत नहीं जानते आईंसटीन ने कहा कि आप अपने आप को वैज्ञानिक कैसे कहते हैं. हो सकता है इस पत्र में कुछ अतिश्योक्ति नजर आ जाए लेकिन आईंसटीन के उस महत्वूपर्ण दस्तावेज को तो कोई नहीं मिटा सकता जिसमें उन्होने कहा था कि "इवोल्यूशन" को सटीक तरीके से समझना हो तो भगवद्गीता से बढिया ग्रंथ कोई नहीं हो सकता. आईंसटीन ने लिखा है कि "एटामिक एक्सप्लोजन क्या होता है इसका सबसे सटीक उदाहरण भगवद्गीता में मिलता है."

ट्रिनीटी कालेज के सेकुलर विभाग ने भारत के जिन साईंसदानों को सर्वे में शामिल किया है उनसे एक सवाल यह भी पूछा है कि क्या आप बायोलाजिकल इवोल्यूशन को सही मानते हैं? 66 प्रतिशत भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा है कि हां वे इससे सहमत हैं. अब सवाल यह है कि जो 66 प्रतिशत भारतीय वैज्ञानिक इवोल्यूशन के सिद्धांत को सही मान रहे हैं उन्हें आईंसटीन के बराबर का समझा जाए या ऐसा पोंगापंथी जो बंदर से इंसान बनने की यात्रा को वैज्ञानिक होने के बाद भी नकारता हो? लेकिन ऐसे अध्ययनों का मकसद इन सवालों को सुलझाने और सत्य की तह में उतरना शायद ही कभी होता हो. यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध होता है जिसमें विज्ञान और वैज्ञानिकता जैसे शब्दों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

अपनी शब्दावली में सेक्ट हैं और न सेकुलर. आसपास का जो शब्द है वह है पंथ और संप्रदाय. पंथ सामाजिक व्यवस्था है और संप्रदाय ऐसे आशिर्वाद का वितरण है जो लोगों में समान रूप से वितरित होता हो. सेकुलर शब्द की पैदाईश ही पश्चिम में होती है और सेकुलर शब्द का पश्चिम ही जो अनुवाद करता है वह है- सांसारिक. अब अगर सेकुलर स्टडी में यह सवाल शामिल किया जाए कि सेकुलरिज्म से आप क्या समझते हैं और जवाब में 93 फीसदी लोग यह कहें कि विभिन्न संप्रदायों और दर्शनों के प्रति टालरेंस. तो इस सवाल और उससे मिले जवाब दोनों के औचित्य पर ही सवाल खड़ा हो जाता है. इस सवाल का कायदे से जवाब तो यह पूछा जाना चाहिए कि एक वैज्ञानिक होने के नाते आप अपने आप को कितना सांसारिक समझते हैं. जवाब जो भी आये लेकिन विज्ञान की यात्रा इसी बिन्दु से शुरू होती है. 

भारत में दर्शन के मुख्य छ मार्ग हैं. न्याय, वैशेषिक, वेदान्त, मीमांसा, सांख्य और योग. इन षट्दर्शनों में वेदान्त सबसे विकसित और सर्व समावेशक दर्शन के तौर पर स्थापित है. व्यक्ति के आंतरिक उत्थान की अगर कोई सीढ़ी बने तो वेदान्त शीर्ष पर होता है. यह वेदान्त की घोषणा है कि ज्ञान बंधः यानी परम ज्ञान वह जो जानने की पूरी प्रक्रिया के अंत सिरे पर आता है. जो कुछ जाना वह भी एक प्रकार का बंधन ही था. इसलिए विज्ञान तो छूटा ही था ज्ञान का दामन भी छोड़ देना होता है. शायद इसीलिए जैसे हमने इंजीनियरिंग के लिए उद्यम की जगह कला शब्द का प्रयोग किया है उसी तरह विज्ञान के लिए दर्शन शब्द का इस्तेमाल करते हैं. क्योंकि पश्चिम के विज्ञान का आधार जाना हुआ नहीं माना हुआ होता है. 100 प्रयोगों की 90-95 सफलताओं के आधार पर हम निष्कर्ष निकालते हैं और उसके वैज्ञानिक होने की घोषणा कर देते हैं. ऐसे प्रयोगों के भरोसे ही आज पूरा संसार खात्म के कगार पर है. भारत जैसे परंपरा प्रधान देशों में विज्ञान नहीं बल्कि विशुद्ध विज्ञान या फिर दर्शन और सम्मा सति जैसे माध्यमों का सहारा लिया गया. 

विज्ञान चेतना का माध्यमिक स्तर है. अगर ट्रिनीटी कालेज के लोग तंत्र पढ़ें तो उन्हें एक शब्द मिलेगा जिसे विज्ञानमय कोष कहते हैं. तंत्र मानवीय चेतना के जिस उद्भव और विकास को रेखांकित करता है उसके पांच सोपान है. ये पांच सोपान केवल इवोल्यूशन को ठीक से समझने में मदद करते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि मनुष्य के आंतरिक उन्नयन का एक क्रम लगातार चलते रहना चाहिए. लेकिन ईसाई विज्ञान की सारी दौड़ विज्ञान पर जाकर खत्म हो जाती है जबकि भारतीय विज्ञान इसे मात्र एस सीढ़ी मानता है. इसके आगे और अंतिम कोष आनंदमय कोष है. 

दुनियाभर की बात छोड़िए जो ट्रिनीटि कालेज इस तरह के अध्ययन के लिए पैसा फण्ड कर रहा है उसके अपने ही देश में समाज के स्तर पर ईसाई विज्ञान को लगभग नकार दिया गया है. तर्क और विज्ञान की जगह आस्था और श्रद्धा जैसे शब्द ज्यादा वैज्ञानिक आत्मविश्वास के साथ प्रयोग होते हैं. भारत में तो यह हमारी समझ है ही. इस समझ को तोड़ने और गलत साबित करने की कोशिश कोई नयी नहीं है. उपनिवेशकाल के दौरान लगातार ऐसे अध्ययन प्रायोजित किये जाते रहे जो भारत की समझ और प्रज्ञा को दोयम दर्जे का साबित करते हैं. प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद बीतने के बाद भी ऐसे प्रयास रूके नहीं है. भारत में सेकुलर इंडिया की पूरी बहस को पश्चिमी देश और चीन जैसे साम्यवादी फण्ड करते हैं. इसके निहितार्थ क्या हो सकते हैं इसे समझना कोई मुश्किल नहीं है.

क्या विज्ञान और आस्था में विरोधाभास है? अपनी राय देने के लिए यहां क्लिक करिए.     

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himanshu shekhar on 07 June, 2008 17:35;16
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badhiya hai,
ye america aur chin wale achhi tarah jante hai ki kahan vaar karna hai par dukhad to ye hai ki apne satadheesh bhi unke hathon beek chuke hain.
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