Home | बात करामात | आधुनिक तकनीकि से लैस आतंकवाद

आधुनिक तकनीकि से लैस आतंकवाद

image

कंधे पर राकेट लांचर लादे, हाथों में राइफल संभाले, सिर पर पगड़ी बांधे, पुरानी जीपों में बैठकर बेकसूर लोगों को गोलियों का निशाना बनाते अर्धसाक्षर और धर्मांध जेहादियों का जमाना बीत चुका है। आज का आतंकवादी लंबा प्रशिक्षण प्राप्त आधुनिक युवक है जो जीन्स और कारगो पैंट पहने, पीठ पर असलहा भरे रकसैक लादे, फर्राटे से अंग्रेजी बोलने में सक्षम किसी फौजी कमांडो से कम नहीं है।

इतना ही नहीं, वह आधुनिकतम तकनीक से सुपरिचित है और अपना 'मिशन' पूरा करने के लिए मोबाइल फोन, जीपीएस युक्त गैजेट्स, ईमेल तथा इंटरनेट जैसे साधनों को बतौर हथियार इस्तेमाल करने में सक्षम है। ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों में अलकायदा आतंकवादियों ने हमें अपनी रणनीति, युध्द क्षमता और जुनून दिखाकर चौंका दिया था। अब मुंबई में पाकिस्तानी जेहादियों ने अधिकतम विनाश करने की काबिलियत और तकनीकी दक्षता दिखाकर सुरक्षा एजेंसियों को चिंता में डाल दिया है। प्रश्न उठता है कि क्या हमारा सुरक्षा तंत्र तकनीक के शातिराना इस्तेमाल से उपजी गंभीर आतंकवादी चुनौती का सामना करने को तैयार है?  

जिस समय पूरी दुनिया सांस रोके टेलीविजन के जरिए मुंबई में आतंकवादियों के पर नजर लगाए हुए थी, ठीक उसी समय होटलों में घुसे आतंकवादी विश्व भर में फैले डर, आशंका और नफरत को देखकर आनंदित हो रहे थे। होटलों के केबल कनेक्शन काट दिए जाने के बाद भी वे अपने-अपने ब्लैकबेरी स्मार्टफोनों के जरिए बाहरी दुनिया से लगातार जुड़े हुए थे। वे न सिर्फ सेटेलाइट फोन के माध्यम से पाकिस्तान स्थित नियंताओं से लगातार निर्देश ले रहे थे बल्कि इंटरनेट पर उपलब्ध खबरों और संवेदनशील सूचनाओं से भी अवगत हो रहे थे। अगर वे 60 घंटे तक भारत के श्रेष्ठतम कमांडो से लोहा लेते रहे तो इसलिए भी कि वे हर क्षण ताजा सूचनाओं से लैस थे। दूरसंचार के आधुनिक तौर तरीकों और इंटरनेट के आगमन ने आतंकवाद के विरुध्द लड़ाई का दायरा बढ़ा दिया है। अब यह लड़ाई सिर्फ हथियारों और हथगोलों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि सूचना तंत्र की भी लड़ाई है। नई-नई इंटरनेट आधारित सुविधाओं और सूचनाओं के विस्फोट ने आतंकवादियों को वह शक्ति दे दी है जो उन्हें पहले प्राप्त नहीं थी। उन्हें अपनी बात कहने का वैकल्पिक मंच उपलब्ध करा दिया गया है जो किसी भी किस्म की सीमाओं और प्रतिबंधों से मुक्त है। उन्हें संचार का बेहद कारगर समानांतर माध्यम दे दिया गया है जिसकी बदौलत वे न्यूनतम खर्च में विश्व स्तर पर अपने सूचना तंत्र का संचालन और प्रसार कर सकते है। और वे ऐसा ही कर रहे हैं। मुंबई नरसंहार के लिए दोषी माना जा रहा लश्कर ए तैयबा अपने प्रचार-तंत्र के रूप में बाकायदा एक वेबसाइट चलाता है जिसमें दावा किया गया है कि इस आतंकवादी हादसे के लिए वह नहीं बल्कि भारत के 'हिंदू आतंकवादी' जिम्मेदार हैं। इधर मुंबई कांड के दौरान तथाकथित 'डेक्कन मुजाहिदीन' के नाम से अखबारों और टीवी चैनलों को ईमेल भेजकर इस हमले की जिम्मेदारी ली गई थी। पिछले दो साल में हुए ज्यादातर हमलों की जिम्मेदारी लेने का दावा और पूर्व सूचनाएं ईमेल के जरिए ही मिलती रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि जहां टेलीफोन से किए जाने वाले कॉलों की पुख्ता जांच-पड़ताल संभव है वहीं ईमेल भेजने वाले का पता लगाना बेहद मुश्किल है। खास तौर पर तब जब उसे भेजने किसी अन्य के ईमेल खाते और इंटरनेट ब्राडबैंड कनेक्शन को 'हैक' कर ले।

यह ईमेल आतंकवादियों के तकनीकी कौशल का सबूत है जिन्होंने विशेष किस्म की 'रीमेलर सर्विस' के जरिए इसे भेजा। आम ईमेल खातों में जहां प्रेषक कंप्यूटर के आईपी एड्रेस का पता लगाना संभव है वहीं इस तरह की अधुनातन सेवाओं में उसकी पहचान या स्थान गुमनाम बना रहता है। यह अलग बात है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की मदद से इस ईमेल के उद्गम (लाहौर) का पता लगा लिया गया है। दिल्ली के हालिया बम विस्फोटों के बाद 'याहू' के तकनीकी विशेषज्ञ मंसूर पीरभाई की गिरफ्तारी से इस बात का खुलासा हो गया था कि आतंकवादियों को किस स्तर के विशेषज्ञों की सेवाएं हासिल हैं।

ताजमहल और ओबेराय होटलों में आतंकवादियों ने सूचना तकनीक का जिस हद तक इस्तेमाल किया वह रक्षा और आईटी विशेषज्ञों को भौंचक्का करने के लिए काफी है। ताज होटल में फंसे एंड्रियास लिवेरस नामक एक 73 वर्षीय ब्रिटिश-साइप्रियट व्यापारी ने किसी तरह बीबीसी से संपर्क कर लिया और इस टीवी चैनल को दिए टेलीफोनी इंटरव्यू में बताया कि वह किस हालत में और कहां पर फंसे हुए हैं। इसके थोड़ी ही देर बाद वे आतंकवादियों की गोलियों के शिकार बन गए। होटल के भीतर से जो लोग टेलीविजन चैनलों और अन्य मीडिया संस्थानों के संपर्क में थे और जिनके पास टेलीफोन कॉल, एसएमएस संदेश और ईमेल आ रहे थे उन्हें आशंका थी कि इससे आतंकवादियों को उनके छिपने की जगह का पता चल सकता है। कारण, आतंकवादी खुद भी सेटेलाइट फोन और इंटरनेट से जुड़े हुए थे।  अजमल कसब
मुंबई के कुछ युवकों को अपने खींचे चित्र और सुरक्षा बलों की कार्रवाई का ब्यौरा ब्लॉगों, टि्वटर, लिकर और यू-टयूब आदि इंटरनेट ठिकानों पर रखने के लिए दुनिया भर में काफी प्रसिध्दि मिली है। लेकिन उनका यही कृत्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता था क्योंकि अगर आतंकवादी अपने ब्लैकबेरी स्मार्टफोन के जरिए उन्हीं इंटरनेट ठिकानों पर पहुंच जाते तो उन्हें बाहर हो रही कार्रवाई की पल पल की खबर मिलती रहती। इसके लिए उन्हें कोई बहुत दिमागी कसरत करने की जरूरत नहीं थी। गूगल पर एक सर्च ही पर्याप्त थी क्योंकि मुंबई के ब्लॉगरों की डाली सूचनाओं का जिक्र इंटरनेट पर सैंकड़ों स्थानों पर हो रहा था। इस बात को भी असंभव मत मानिए कि कल को ये तत्व खुद भी 'माइक्रो ब्लॉगिंग' या 'मोबाइल ब्लॉगिंग' जैसी सुविधाओं का प्रयोग अपने 'आतंकी मिशन' को पूरा करने और उसकी प्रगति पर निगाह रखने के लिए कर सकते हैं।

माना कि साइबर कैफे पर आने वाले अवांछित तत्वों पर हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ हद तक काबू पा लिया है लेकिन साइबर अपराध और साइबर आतंकवाद रोकने के हमारे प्रयास एक दशक पहले के आईपी एड्रेस ढूंढने, ईमेल फिल्टरिंग और स्पाईवेयर के इस्तेमाल जैसे पारंपरिक तौर तरीकों तक ही सीमित हैं। आतंकवादी इन सबका जवाब ढूंढ चुके हैं और इससे पहले कि लोकतांत्रिक शक्तियां साइबर युध्द में इन विनाशकारी शक्तियों से पिछड़ जाए, हमारी सरकार को एक आक्रामक एवं आधुनिक साइबर सुरक्षा तंत्र बनाने की जरूरत है। इस मामले में अब और ढिलाई की गुंजाइश नहीं है। जांच एजेंसियों ने आतंकवादियों को मुंबई तक लाने वाली 'कुबेर' नामक मछलीमार नौका से उनकी कुछ चीजें बरामद की थीं जिनमें एक सेटेलाइट फोन के साथ-साथ दक्षिण मुंबई के विस्तृत मानचित्र को दर्शाती एक ग्लोबल पोजीशनिंग डिवाइस (जीपीएस युक्ति) भी शामिल थी। गर्मिन कंपनी की यह इलेक्ट्रॉनिक युक्ति पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय है क्योंकि वह विश्व में किसी भी स्थान पर आपकी वर्तमान स्थिति को इंगित करने के साथ-साथ आसपास के रास्तों, इमारतों और नक्शों को अपनी स्क्रीन पर दिखाती रहती है। एक तरह का चलता-फिरता इंटेलीजेंट नक्शा, जो आपको किसी भी स्थान पर पहुंचने के शॉर्ट कट से लेकर दिशा और दूरी की तमाम उपयोगी सूचनाएं देता रहता है। 'गूगल अर्थ' के बारे में भारत सहित दुनिया की कई सरकारों को आपत्तिा रही है कि उसमें दिखाए जाने वाले अहम ठिकानों के त्रिआयामी चित्र आतंकवादियों के हाथ लगकर विनाश को न्यौता दे सकते हैं।  

मुंबई के हमलावरों ने गूगल की ही एक अन्य सेवा 'गूगल मैप्स' का अपने 'मिशन' के लिए इस्तेमाल कर उनकी आशंकाओं को सच कर दिखाया। आपने संवेदनशील स्थानों पर कैमरा ले जाने में मनाही वाले बोर्ड लगे देखे होंगे लेकिन जब गूगल अर्थ और गूगल मैप्स (सिर्फ गूगल ही क्यों, ऐसे और भी कई इंटरनेट ठिकाने हैं) पर सब कुछ पहले से उपलब्ध है तो अपराधियों और आतंकवादियों को फोटो लेने की क्या जरूरत है। इन वेबसाइटों में तो किसी भी घर, संस्थान या क्षेत्र के 3 डी चित्र देख सकते हैं और वह भी विभिन्न कोणों से। ऐसी कीमती सूचनाओं से लैस आतंकवादी क्या कुछ नहीं कर सकते? जेहादियों के हाथों सेटेलाइट फोन का प्रयोग दिखाता है कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन अब अलकायदा के तौरतरीके सीख रहे हैं जो तकनीक के प्रयोग में काफी आगे है। बताया जाता है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई के बाद से लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद अलकायदा की छत्रछाया में चले गए हैं। संभवत: यह उसी के प्रशिक्षण का नतीजा हो। सेटेलाइट फोन का स्थानीय दूरसंचार प्रोवाइडरों से संबंध नहीं होता और वे सीधे उपग्रह के माध्यम से अपने लक्ष्य से जुड़े होते हैं। ऐसे में उन्हें जाम करना या उनके संकेतों को इंटरसेप्ट करना मुश्किल होता है, खासकर तब, जब संबंधित सुरक्षा बल इस तरह की तकनीकों के प्रयोग में दक्ष न हों या ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार न हों।  

भले ही हमारी सुरक्षा एजेंसियां अब तक तकनीक से तालमेल न बिठा पाई हों मगर आज के आतंकवादी तेजी से प्रौद्योगिकी का अपने युध्द के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना सीख रहे हैं। वे मोबाइल कॉल करके बम विस्फोट करने लगे हैं। वे लापरवाह इंटरनेट यूजर्स के वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल कर धमकी भरे ईमेल भेजते हैं, प्रचार के लिए प्रजेन्टेशन तैयार करते हैं और ऑडियो या वीडियो फाइलों के रूप में जेहादी नेताओं के वीडियो जारी करते हैं। लेकिन तकनीक के इस सोफिस्टिकेटेड इस्तेमाल के बरक्स हमारा जवाब क्या है?

Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image बालेन्दु दाधीच माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.
Rate this article
5.00
More from बात करामात
Previous
image
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
image
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
image
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
image
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
image
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
image
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
image
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
image
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
image
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
image
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
image
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
image
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
image
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
image
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
image
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
image
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
image
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2