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यह समय...

image यह समय शब्द को सत्ता की हिंसा से बचाने का भी समय है।

यह सरल जीवन के जटिल हो जाने का समय है. यह समय आंसुओं के सूख जाने का समय है। यह समय पड़ोसी से रूठ जाने का समय है। यह समय परमाणु बम बनाने का समय है। यह समय हिरोशिमा और नागासाकी रचने का समय है। यह समय गांधी को भूल जाने का समय है। यह समय राम को भी भूल जाने का समय है। यह समय उन प्रतीकों से मुंह मोड़ लेने का समय है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं।

यह जड़ों से उखड़े लोगों का समय है और हमारे सरोकारों को भोथरा बना देने वालों का समय है। यह समय उजड़ते लोगों का समय है। गांव के गांव लुप्त हो जाने का समय है। यह समय 'हरसूद' को रचने का समय है। खाली होते गांव, ठूंठ होते पेड़, उदास होती चिड़िया, पालीथिन के ग्रास खाती गाय, फार्म हाउस में बदलते खेत, बिकती हुई नदी, धुंआ उगलती चिमनियां, काला होता धान ये कुछ ऐसे प्रतीक हैं, जो हमें इसी समय ने दिए है। यह समय इसीलिए बहुत बर्बर हैं। बहुत निर्मम और कई अर्थों में बहुत असभ्य भी।

यह समय प्रेमपत्र लिखने का नहीं, चैटिंग करने का समय है। इस समय ने हमें प्रेम के पाठ नहीं, वेलेंटाइन के मंत्र दिए हैं। यह समय मेगा माल्स में अपनी गाढ़ी कमाई को फूंक देने का समय है। यह समय पीकर परमहंस होने का समय है। इस समय ने हमें ऐसे युवा के दर्शन कराए हैं, जो बदहवास है। वह एक ऐसी दौड़ में है, जिसकी कोई मंजिल नहीं है। उसकी प्रेरणा और आदर्श बदल गए हैं। नए जमाने के धनपतियों और धनकुबेरों ने यह जगह ले ली है। शिकागो के विवेकानंद, दक्षिण अफ्रीका के महात्मा गांधी अब उनकी प्रेरणा नहीं रहे। उनकी जगह बिल गेट्स, लक्ष्मीनिवास मित्तल और अनिल अंबानी ने ले ली है। समय ने अपने नायकों को कभी इतना बेबस नहीं देखा। नायक प्रेरणा भरते थे और जमाना उनके पीछे चलता था। आज का समय नायकविहीनता का समय है। डिस्को थेक, पब, साइबर कैफे में मौजूद नौजवानी के लक्ष्य पकड़ में नहीं आते। उनकी दिशा भी पहचानी नहीं जाती। यह रास्ता आज के समय से और बदतर समय की तरफ जाता है। बेहतर करने की आकांक्षाएं इस चमकीली दुनिया में दम तोड़ देती हैं। 'हर चमकती चीज सोना नहीं होती' लेकिन दौड़ इस चमकीली चीज तक पहुंचने की है।

आज की शिक्षा ने नई पीढ़ी को सरोकार, संस्कार और समय किसी की समझ नहीं दी है। यह शिक्षा मूल्यहीनता को बढ़ाने वाली साबित हुई है। अपनी चीजों को कमतर कर देखना और बाहर सुखों की तलाश करना इस समय को और विकृत करता है। परिवार और उसके दायित्व से टूटता सरोकार भी आज के ही समय का मूल्य है। सामूहिक परिवारों की ध्वस्त होती अवधारणा, फ्लैट्स में सिकुड़ते परिवार, प्यार को तरसते बच्चे, अनाथ माता-पिता, नौकरों, बाइयों और ड्राइवरों के सहारे जवान होती नई पीढ़ी। यह समय बिखरते परिवारों का भी समय है। इस समय ने अपनी नई पीढ़ी को अकेला होते और बुजुर्गों को अकेला करते भी देखा है। यह ऐसा जादूगर समय है, जो सबको अकेला करता है। यह समय पड़ोसियों से मुंह मोड़ने, परिवार से रिश्ते तोड़ने और 'साइबर फ्रेण्ड' बनाने का समय है।

यह समय व्यक्ति को समाज से तोड़ने, सरोकारों से अलग करने और 'विश्व मानव' बनाने का समय है। यह समय पिताओं से मुक्ति का समय है। यह समय माताओं से मुक्ति का समय है। यह समय भाषाओं और बोलियों की मृत्यु का समय है। दुनिया को एक रंग में रंग देने का समय है। यह समय अपनी भाषा को अंग्रेजी में बोलने का समय है। इस समय ने हजारों हजार शब्द, हजारों हजार बोलियां निगल जाने की ठानी है। यह समय भाषाओं को एक भाषा में मिला देने का समय है। यह समय चमकीले विज्ञापनों का समय है। इस समय ने हमारे साहित्य को, हमारी कविताओं को, हमारे धार्मिक ग्रंथों को पुस्तकालयों में अकेला छोड़ दिया है, जहां ये किताबें अपने पाठकों के इंतजार में समय को कोस रही हैं। इस समय ने साहित्य की चर्चा को, रंगमंच के नाद को, संगीत की सरसता को, धर्म की सहिष्णुता को निगल लेने की ठानी है। यह समय शायद इसलिए भी अब तक देखे गए सभी समयों में सबसे कठिन है, क्योंकि शब्द किसी भी दौर में इतने बेचारे, ठिठके और सहमे हुए नहीं थे। शब्द की हत्या इस समय का एक सबसे बड़ा सच है।

यह समय शब्द को सत्ता की हिंसा से बचाने का भी समय है। यदि शब्द नहीं बचेंगे, तो मनुष्य की मुक्ति कैसे होगी? उसका आर्तनाद, उसकी संवेदनाएं, उसका विलाप, उसका संघर्ष, उसका दैन्य, उसके जीवन की विद्रूपदाएं, उसकी खुशियां, उसकी हंसी, उसका गान, उसका सौंदर्यबोध कौन व्यक्त करेगा? शायद इसीलिए हमें इस समय की चुनौती को स्वीकारना होगा। यह समय हमारी मनुष्यता को पराजित करने के लिए आया है। हर दौर में हर समय से मनुष्यता जीतती आई है। हर समय ने अपने नायक तलाशे हैं और उन नायकों ने हमारी मानवता को मुक्ति दिलाई है। यह समय भी अपने नायक से पराजित होगा। यह समय भी मनुष्य की मुक्ति में अवरोधक नहीं बन सकता। हमारे आसपास खड़े बौने, आदमकद की तलाश को रोक नहीं सकते। वह आदमकद कौन होगा? वह विचार भी हो सकता है और विचारों का अनुगामी कोई व्यक्ति भी। कोई भी समाज अपने समय के सवालों से मुठभेड़ करता हुआ ही आगे बढ़ता है। सवालों से मुंह चुराने वाला समाज कभी भी मुक्तिकामी नहीं हो सकता। यह समय हमें चुनौती दे रहा है कि हम अपनी जड़ों पर खड़े होकर एक बार फिर बड़े स्वप्न देखें। इसके चलते आने वाला समय बेहद कठिन और दुरूह नजर आने लगता है। कोई भी समाज अपने समय के सरोकारों के साथ ही जीवंत होता है। भारतीय मनीषा इसी चेतना का नाम है, जो हमें अपने समाज से सरोकारी बनाते हुए हमारे समय को सहज बनाती है। क्या आप और हम इसके लिए तैयार हैं?

[123dwivedi@gmail.com] [लेखक 'जी 24 घंटे' छत्तीसगढ़, के इनपुट एडीटर हैं]

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bharat sagar on 27 July, 2008 05:12;49
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Achchha likha hai Dwivedi ji ne , lekin ye likhna bhool gaye ki , Ye samay ' ek chhote se BREAK lene ' ka bhi samay hai.
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vivek on 27 July, 2008 10:04;57
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हमारे समय का कड़वा सच...........यही पुराणों में वर्णित कलिकाल है
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जयराम दास. on 27 July, 2008 15:44;12
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और यह समय संजय का भी है......उस संजय का जो दूर दृष्टि और पक्का इरादा लेकर काम करे....नए महाभारत को अपने शब्द और स्वर दे...तंत्रलोक को लोकतंत्र मे परिवर्तित करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करे...और यह सब किसी धृतरास्ट्र के लिए नहीं... अपितु राष्ट्र के लिए करे...!अच्छा आलेख....बहुत बधाई.
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PRASHANT on 27 July, 2008 16:43;13
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भारतीय मनीषा इसी चेतना का नाम है, जो हमें अपने समाज से सरोकारी बनाते हुए हमारे समय को सहज बनाती है। क्या आप और हम इसके लिए तैयार हैं?
ha hum taiyar hain .
prashant SVYAMSEWAK R S S
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veerendra mishra on 28 November, 2008 14:28;34
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ye bhrast netao ka samay hai
aur sab bakwas hai.
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