शुभकरमन? ते कबहुं न टरूं
अब हमारे पीएम को ही देखिए. उनका चेहरा एकदम भावहीन होता है. न दुख का भाव. न सुख का भाव. माधो की मूरत लगते हैं. इस देश की दुखभरी सूरत लगते हैं. पता ही नहीं चलता कि वे किसी गलतफहमी में हैं या फिर किसी खुशफहमी में. नपा-तुला हंसते हैं. नपा-तुला मुस्कुराते हैं. हां, अंगुलियों को दो फाड़ करके विक्टरी की साईन जरूर बनाते हैं. आप भले ही अमरनाथ की राजनीति करतें हो वे सीधे शिव से वर मांग लेते हैं-
देहु शिवा वर मोहे, शुभकरमन ते कबहूं न टरूं. शिव ने किसका साथ दिया यह जगजाहिर है. विश्वास पर दुनिया कायम है. हमने न जाने कितनी चीजों पर विश्वास कर रखा है. विश्वास के शाब्दिक अर्थ पर मत जाईये. इसका मतलब यह नहीं कि विश्वास एक भाव है. इसे यूं समझिए कि शेयर बाजार का सारा भाव विश्वास के उस तर्क और तथ्य पर आधारित होता है जो होते हुए भी नहीं होता. यही विश्वास है.
अब देखिए कितना बढिया वाक्य है पीएम इन वेटिंग. हिन्दीवालों ने भी सोचा कि क्यों अनुवाद किया जाए- प्रमं प्रतीक्षारत. करने दो वेटिंग. जिसको भी वेटिंग करना है वह कर सकता है. लेकिन यह बहुत ही दुख की बात है कि प्रमं प्रतीक्षारत लोकसभा में विरोधी दल के नेता भी होते हैं. जब बोलते हैं तो लगता है कि वह किसी सत्संग में 1950 के कल्याण का हिन्दू अंख खोल रहे हैं.
यह लिखना भी झूठ ही होगा कि वह असत्य और भ्रामक स्थितियों के अमरनाथ हैं. जैसे बर्फानी शिला पिघलती रहती है वैसे ही उनके असत्य की झंडेवालान शिला भी पिघलती रहती है. अपनी गलतफहमी व्यक्त करना हो तो वो एक पूरी किताब भी लिख सकते हैं. फिर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं होती है. क्यों हो भाई? वह तो पीएम इन वेटिंग हैं. कभी डीपीएम भी रह चुके हैं. इसलिए उन्हें अंदाजा है कि पीएम के लिए गलतफहमी कितनी जरूरी होती है.
संसद में जो कुछ हुआ उससे इतना तो तय हो गया कि इससे बढिया रियलिटी शो अभी तक नहीं हुआ था. हंसी की हंसी नवजोत सिंह सिद्धू की भी हंसी रूक गयी थी. यहां पर हंसाने का ठेका हमेशा की तरह लालू जी के ही पास था. वह क्या बोलेते हैं यह तो वह भी शायद ही जानते हों लेकिन उनमें बात ही कुछ ऐसी है कि वे कुछ बोलते हैं तो लोग हंसते हैं. यह लालूजी भी जानते हैं, और क्या चाहिए?
आपने देखा ही होगा कि संसद में महबूबा मुफ्ती कैसे शरमा रही थीं. क्या बोलूं मैं....फिर उन्हें लग रहा था कि क्या बोलूं मैं में कश्मीरियत नहीं है. अभी-अभी कश्मीर में एक सरकार गिरा चुकी हैं. सरकार गिराने का दर्द ताजा था इसलिए मुस्कराकर कह दिया - मैं सरकार का समर्थन करती हूं. उनके ही कश्मीरी भाई उमर अब्दुल्ला ने कितनी नयी जानकारी दी. कहा कि मुस्लिम होना और इंडियन होना एक बात है. बहुत बड़ी जानकारी है यह. इस विश्वास बहस ने मेरी आस्था फिर से बढ़ा दी है. इस बात पर कि जिद करो. प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने की जिद करो. यहां तो ऐसे-ऐसे फद्दू प्रसाद हैं जो अमर सिंह से भी इस्तीफा मांग लेते हैं.
लेकिन बोलकों के बोलक साबित हुए राहुल गांधी. क्या बात कही उन्होंने- कलावती. अब कलावती की कहानी सब लोग जान रहे हैं. क्या अंदाजे बयां था कि कलावती के दुख का कारण देश में बिजली का न होना है. पर मुझे लगा कि राहुल भैया क्या बात कर रहे हैं? जबकि कलावती को भी नहीं मालूम था कि यह राहुल कौन है? वह तो कलावती को किसी ने बताया - हा राहुल आहे, इंदिरा गांधी च नातू. कितना बड़ा सच. सोचिए राहुल इंदिरा गांधी के कुछ न होते तो क्या होते? कम से कम बहनजी के ब्रजेश पाठक तो नहीं होते.
विश्वास पर बहस बहुत की जा सकती है लेकिन हम सबको यह ध्यान रखना चाहिए कि अभी हाल में ही लोकसभा ने तय किया है कि विश्वास पर 48 घण्टों में सिर्फ 12 घण्टे ही बहस की जा सकती है. पूरे समय का सिर्फ 25 प्रतिशत. पूरा विश्वास यूं भी खतरनाक चीज होती है. लोकतंत्र में कुछ भोले लोग होते हैं, लेकिन जो लोकतंत्र में भोले नहीं होते उनका अपना ही एक तंत्र होता है. उस तंत्र को बहुत सारे नाम दिये जा चुके हैं. इस तंत्र में विश्वास की बहस के 12 घण्टों में पता चला कि यहां के समझदारों का सीबीआई तंत्र भी होता है और मायातंत्र भी. और सब सिर्फ अपनी-अपनी कहते हैं.
(जुगनू शारदेय जेपी आंदोलन से जुड़े रहे हैं. स्वतंत्र पत्रकार और टिप्पणीकार.)
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