घराना पत्रकारों को जमाने की चिंता
इस बार उदयन शर्मा की पुण्यतिथि मनाने के लिए उनके समर्थकों के पास शायद सबसे नायाब तरीका मौजूद था. उन्होंने उनको एक संवाद के जरिए याद किया. मौका यह कि अभी हाल में ही लोकसभा चुनाव हुए हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया ने जिस तरह से पैसा बटोरा वह पत्रकार बिरादरी को नैतिकता इत्यादि पर बहस के लिए अच्छा मौका दे देती है. चार घण्टों के दौरान कोई 14 वक्ताओं ने धुंआधार तरीके से अपने तर्क रखे, नाराजगी दिखाई, मजबूरी भी बताई और आह्वान किया कि बदलाव जरूरी है. फिर सब बाहर निकले, चाय पी, एक दूसरे से परिचय बढ़ाया और अपने अपने काम पर वापस लौट गये. पत्रकारिता पर चिंता का उबाऊ और थका देनावाला चार घण्टा पूरा हो गया था.
जिन व्यक्ति उदयन शर्मा के नाम पर "संवाद 2009" का दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजन किया गया था वे माद्दे और मुद्दे की पत्रकारिता करते थे. कम से कम आज वक्ताओं में कुछ लोगों ने जो उनके बारे में बताया उससे यही लगा कि वे पत्रकारिता को सामाजिक काम मानते थे इसलिए उनकी पूरी पत्रकारिता एक सामाजिक उत्तरदायित्व थी. उनके साथी रहे सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने बताया भी कि "उदयन पत्रकारिता को सामाजिक जिम्मेदारी मानते थे. वे मजाक में कहते थे कि तुम लोग बाद में नेता बनोगे, मैं तो अभी से यह काम कर रहा हूं." साफ है जो कटाव आज साफ दिखाई देता है वह जुड़ाव उदयन शर्मा का था. इसलिए ऐसे पत्रकारों को याद करने के बहाने हम बहुत सारी उन समस्याओं का हल खोजने की कोशिश करते हैं जहां हमारी तर्क बुद्धि आकर रूक जाती है. उदयन शर्मा के नाम पर किया गया संवाद ऐसा ही मौका बनना चाहिए था. लेकिन वह नहीं बना.
कपिल सिब्बल की इस धमकी के साथ कि अगर पत्रकारों का लिखने और सूचना देने का यही तरीका रहेगा तो राजनीतिज्ञों पर पत्रकारों के लिखने और बोलने का कोई फर्क नहीं पड़ेगा, यह संवाद शुरू हुआ. कपिल सिब्बल देश के मानव संसाधन विकास मंत्री हैं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता. पहले भी वे राजदीप सरदेसाई को उनके ही चैनल पर इसी सवाल पर घुड़क चुके हैं. फिर उसके बाद जो भी वक्ता आया उसके लिए आमचुनाव के दौरान पत्रकारो और अखबारों की भूमिका ही मुख्य विषय बना रहा. विषय था भी यही. लेकिन साफ दिख रहा था कि कोई पत्रकार जानबूझकर यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि हां, वह उस पाप का बराबर का हिस्सेदार है जो नवउदारवादी ताकतें कर रही हैं. संतोष भारतीय ने थोड़ी हिम्मत करते हुआ कहा जरूर कि "हम सब लुच्चे और बेईमान लोग हैं, यह हमें स्वीकार करना होगा." लेकिन केवल कहने भर से क्या हो जाता है? अभी थोड़े दिनों पहले ही पुण्य प्रसून वाजपेयी ने चौथी दुनिया की उनकी दूसरी पारी पर यह कहते हुए सवाल उठा दिया था कि "यह चौथी दुनिया भी वह चौथी दुनिया नहीं है." फिर भी उन्होने यह हिम्मत तो दिखाई कि वे अपनी जमात के बारे में साफ बोल सके. लेकिन बाकी लोग तो अपने अपने पाप छिपाने के तर्क ही खोजते रह गये.
कुलदीप नैयर ने असल मर्म को स्पर्श करते हुए कहा कि "पत्रकार को भी साधन और सुविधा चाहिए. उसे डर है कि कहीं उसकी नौकरी न चली जाए." उन्होंने आगे बताया कि अस्सी के दशक से पहले ऐसा माहौल नहीं था. अस्सी के दशक से पहले अखबारों में लिखने पढ़ने की आजादी होती थी और पत्रकार भी किसी खास व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि आम जनमानस के सर्वव्यापी हित के लिए काम करता था. अस्सी के दशक के बाद से पत्रकारिता में तकनीकि और बड़ी पूंजी का हस्तक्षेप तेजी से बढ़ा है. जैसे जैसे बड़ी पूंजी भागीदार हुई स्वाभाविक रूप से पत्रकारिता एक पेशे में तब्दील होती चली गयी. अखबार मालिकों ने संपादकीय विभाग में अपना दखल बढ़ाया तो पत्रकार भी कलम और कागज लेकर संपादक के केबिन में जाने की बजाय अखबार मालिक की चौखट के बाहर खड़ा हो गया. आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष कहते हैं "जमाना बदल गया है और आप पत्रकारिता की कसौटियों को 47 और 77 के पैमाने पर ही नहीं कस सकते." निश्चित रूप से आशुतोष एक कड़वी सच्चाई बयान कर रहे हैं. लेकिन उन्हें शायद यह नहीं मालूम नहीं है कि बहस तरीकों और तकनीकि के बदलाव पर नहीं है. बहस और चिंता उस कंटेट की है जिसे बड़ी चतुराई से अंदर ही अंदर बदल दिया गया.
पूंजीवादियों का प्रभुत्व मीडिया पर है इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन उदयन शर्मा को याद करने जितने लोग यहां इकट्ठा हुए थे वे सब उसी पूंजीवाद का बटर टोस्ट खाते हैं जिसकी निंदा करके चैन की नींद लेना चाहते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो हाल की दो घटनाएं ऐसी है जिस पर इस देश की मीडिया गैर जिम्मेदाराना रोल न निभाती. एक है आमचुनाव और दूसरा लालगढ़ की लड़ाई. लालगढ़ में जिस तरह से जानबूझकर सज्जन जिंदल को बचाया गया वह पूंजी का मीडिया के मानस पर छाया सीधा प्रभाव है. एनडीटीवी इंडिया के एंकर और पुराने पत्रकार पंकज पचौरी इमानदारी से यह स्वीकार करते हैं कि "देश में दो तरह का मीडिया काम कर रहा है. एक वह जिसके पास पैसा है और दूसरा वह जो पैसा विहीन है." यह पैसे वाला मीडिया सीधे तौर पर यस और नो के खेल में समाहित है जिसकी खबरें मनोरंजन है और उसकी कड़ियां किसी बदलाव से नहीं जुड़ती बल्कि किसी मोबाइल कंपनी से एसएमएस कंटेस्ट पर जाकर जुड़ जाती हैं. कोवर्ट की संपादक सीमा मुस्तफा ने कहा भी कि "जब समाचार एक पैकेज हो जाए तो व्यापार अपने आप ही आ जाता है. इस बार आमचुनाव में यही दिखा भी है. पत्रकार का काम यह बताना नहीं होता कि कौन हार रहा है और कौन जीत रहा है. पत्रकार तो जनमानस को भांपता और उसे ही रिपोर्ट करता है." तो क्या अगर इस बार आमचुनाव में पैकेज की पत्रकारिता चली तो पत्रकारों ने किसके कहने पर अपना काम किया? राजनीतिक दलों के कहने पर? मालिकों के कहने पर? या फिर अपनी ओर से ही उसने भांप लिया कि ऐसा ही कुछ किया जाए कि राजनीतिक संबंध भी बने रहें और मालिक भी खुश रहे ताकि कन्ट्रैक्ट दो साल के लिए और बढ़ जाए.
असल में घराना पत्रकार जो समझना नहीं चाहते वह यह कि जमाना बदल गया है. उन्हें यह समझना होगा कि किसी बड़े मीडिया हाउस के साथ जुड़कर क्रांति तो छोड़िये पत्रकारिता भी नहीं हो सकते. सूचना देने का एक सामान्य कर्म भी इस पूंजीवादी पत्रकारिता के दायरे में संभव नहीं है. अगर हिन्दी के लोग ईमानदार होते तो कम से कम सूचना देने का काम ईमानदारी और प्रोफेशनल तरीके से करते. तब भी स्थिति इतनी बदतर नहीं होती कि वे अपने मालिकों के लिए एक दलाल से अधिक किसी काम के नहीं है. वे एक ऐसे बिचौलिए की भूमिका में आ गये हैं जो मंत्रियों के घरों के दरवाजे अपने मालिकों और मैनेजरों के लिए खुलवाता है. इस बार आम चुनाव में भी यही हुआ है. चंडीगढ़ में पहली बार दैनिक भास्कर का मैनेजर एक पत्रकार को लेकर ही उनके घर पहुंचा था और अगली बार सीधे आ गया था. आश्चर्य देखिए कि जो लोग आज लोकसभा चुनावों को मीडिया द्वारा की गयी गड़बड़ियों की नजर से देखना चाहते थे उन्हें यह भी होश नहीं रहा कि कम से कम उन पत्रकारों और उम्मीदवारों को तो बुलाते जिन्होंने मीडिया के खेल को सार्वजनिक करने का बीड़ा उठाया था. बड़े पत्रकारों में प्रभाष जोशी ही अकेले ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने जनसत्ता में लिखकर सबसे पहले यह सवाल खड़ा किया था. इसके बाद प्रथम प्रवक्ता ने मीडिया के इस गोरखधंधे पर अपना एक विशेषांक निकाला. बाकी का काम कुछ वेबसाईटों और ब्लागों ने ही किया. लेकिन आश्चर्य देखिए इनमें से एकाध लोग ही यहां मौजूद थे.
यहां जो पत्रकार पत्रकारिता के इस पतन पर चिंतित थे उनकी चिंता न्यूज रूम और संपादकीय विभाग में जाने के बाद भी बनी रहती है और वे किसी संगोष्ठी में बोलने की बजाय अपने अखबार या चैनल पर यह बहस चलाते हैं तो निश्चित रूप से विश्वास किया जाना चाहिए कि ये सारे पत्रकार पत्रकारिता के स्तर में सुधार चाहते हैं. अन्यथा ऐसे संवाद और उस संवाद की चिंताएं उस हाजमोला गोली की तरह होती है जो हर तरह का अखाद्य खाने के बाद पाचक के तौर पर खा ली जाती है. अगर ऐसा नहीं है तो क्यों नहीं ये पत्रकार घारनों को छोड़कर सड़कों पर नहीं उतर आते? अगर वे घरानों को बदल नहीं सकते तो कम से कम घरानों से मुक्त तो हो सकते हैं? लेकिन इन पत्रकारों की दिक्कत यह है कि ये क्रांतियां और पत्रकारिता तो करना चाहते हैं लेकिन मोटी सैलेरी का मोह नहीं छोड़ पाते हैं. और शायद इसी एक जगह पर आकर पत्रकारिता के सारे तर्क कुतर्क में बदल जाते हैं, जिसका परिणाम गोष्ठियों और संवाद के रूप में अक्सर दिखाई दे जाता है. कम से कम यहां लोगों को सुनकर इतना जरूर लगा कि इन घराना पत्रकारों को जमाने की चिंता तो है लेकिन सैलरी मिलने के बाद.
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