हिन्दी 'नीचता' बनाम अंग्रेजी 'श्रेष्ठता' की लड़ाई
अभी एक दो दिन पहले ही किसी ने यह सवाल पूछा था कि क्या हिन्दी अखबार सिर्फ इसलिए राष्ट्रीय मान लिए जाएं क्योंकि वे सर्कुलेशन में सबसे अधिक हैं? मुश्किल सवाल है लेकिन एक किला तो हिन्दी पत्रकारिता ने फतेह किया ही है. सर्कुलेशन के लिहाज से हिन्दी के अखबार अब देश ही नहीं दुनिया के सबसे अधिक प्रसारित अखबारों में अव्वल हैं.
ऐसे ही वक्त में पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव होता है और हिन्दी अखबार के मैनेजरों की मनमर्जी के कारण हिन्दी अखबारों की ऐसी 'नीचता' सामने आ जाती है. उत्तर के कई प्रत्याशी हिन्दी के बड़े अखबारों पर आरोप लगाते हैं कि वे अखबार उनसे समाचार छापने के एवज में पैसा मांग रहे हैं. इन बड़े अखबारों में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अमर उजाला का नाम प्रमुखता से उछला. पैकेज मांगने की खबरों में सच्चाई भी थी. टीवी चैनलों ने भी पैकेज लिए लेकिन उनका नाम नहीं आया. अखबारों ने क्योंकि स्थानीय स्तर पर डीलिंग शुरू कर दी और एक प्रत्याशी को दूसरे प्रत्याशी पर भारी दिखाना शुरू कर दिया इसलिए स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों ने विद्रोह कर दिया. रामइकबाल सिंह, लालजी टंडन, हरमोहन धवन ने अखबारों पर आरोप लगाया कि अखबार उनसे पैसा मांग रहे हैं और पैसा न देने पर खबरों से गायब कर देने की धमकी दे रहे हैं.
चुनाव के दौरान कुछ हिन्दी वेबसाइटों ने ही इसे खबर के रूप में प्रकाशित किया. चुनाव के दौरान साधन संपन्न अंग्रेजी मीडिया ने इन शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं धरा. चुनाव बीत गये. बात बीत गयी. लेकिन हिन्दी के ही पुरोधा पत्रकार ने बात पकड़ ली. प्रभाष जोशी ने वेबसाइटों पर चल रही खबरनवीसी को खंगाला और अपने द्वारा तैयार किये गये हथियार "जनसत्ता" में चार लेख लिखे. जो मिला उसको कहा कि इसके खिलाफ आवाज उठाओ. लोग ऐसा कहते हैं कि वे जानबूझकर दैनिक जागरण को अपना निशाना बना रहे थे. हालांकि हमसे तो उन्होंने यही कहा था कि हो सके तो संजय गुप्ता से बात करो और उनका वर्जन लो. मैंने पूछा क्यों? उन्होंने कहा था कि उनके ऊपर आरोप तो लग रहे हैं लेकिन इन आरोपों पर वे खुद क्या सोच रहे हैं यह भी लोगों को पता होना चाहिए. लेकिन अधबीच में ही प्रभाष जोशी चले गये. दैनिक जागरण ने उनकी मौत का भी बहिष्कार करके अपने तरीके से बदला भले ही ले लिया हो लेकिन प्रभाष जोशी ने जो हो हल्ला मचाना शुरू किया था उसने नाद पैदा कर दिया था. इस नाद की पहली तान सुनाई दी रामबहादुर राय की पत्रिका प्रथम प्रवक्ता में. प्रवक्ता ने अपना एक पूरा विशेषांक निकाला और खबरों की खरीद बिक्री का लेखा जोखा पाठकों के सामने रखा. लेकिन यहां से दिशा बदल गयी.
अब यहां से पेड न्यूज हिन्दी के 'अभद्र लोक' से निकलकर अंग्रेजी के 'भद्र लोक' में विराजित होने के लिए चल पड़ा. शुरूआत की द हिन्दू ने. हिन्दू में पी साईंनाथ ने दो तीन लेख लिखे और बताया कि कैसे अखबारों ने खबरों की खरीद बिक्री की. पी साईंनाथ ने भी अपनी खोजबीन भाषाई अखबारों पर ही फोकस रखी. इसके बाद आईबीएन के शेयरधारक और देश प्रतिष्ठित टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी इस जंग में सिर पर कफन बांधकर कूद पड़े. उन्होंने कहना शुरू किया कि मीडिया में, और खासकर चैनलों ने जिस तरह से खबरों के नाम पर पैकेज का खेल किया है उसकी पूरी जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए. ऐसे में भद्रलोक का सम्मानित नाम आउटलुक कैसे पीछा रहता? उसने भी एक विशेषांक निकाला और नाम ले लेकर बताया कि किस अखबार या किस टीवी चैनल ने खबर के नाम पर कितना रेट तय कर रखा था. अब बात पूरी तरह से हिन्दी नीचता बनाम अंग्रेजी श्रेष्ठता के रूप में तब्दील हो चुकी थी. प्रेस काउंसिल ने फौरी तौर पर जांच के लिए जो समिति बनायी उसमें हिन्दी जमात से किसी व्यक्ति को रखने लायक ही नहीं समझा और भद्र लोक के ही एक पत्रकार प्रांजय गुहा ठाकुराता की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी. कमेटी अपनी जांच पड़ताल कर रहा है और अगले महीने तक अपनी रिपोर्ट प्रेस परिषद को सौंप देगा.
ऐसे ही समय में भद्रलोक के संपादकों की एक संस्था एडिटर्स गिल्ड ने 23 जनवरी को एक प्रेस नोट जारी करके एक बार फिर मांग की है कि पेड न्यूज पर सख्त रवैया अख्तियार किया जाना चाहिए और जो दोषी हैं उनको सजा मिलनी चाहिए. यहां आपको बता दें कि राजदीप सरदेसाई इस वक्त भद्रलोक के संपादकों की इस संस्था के अध्यक्ष हैं. लेकिन अब मुद्दा शायद पेड न्यूज का रहा भी नहीं. अब मुद्दा पूरी तरह से हिन्दी नीचता बनाम अंग्रेजी श्रेष्ठता का हो गया है. यह सच है कि पेड न्यूज के कारोबार में जो नाम उभरें हैं वे सभी हिन्दी अखबारों या फिर स्थानीय भाषा के अखबारों के नाम हैं. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि आम मतदाता तो अंग्रेजी अखबार पढ़ता नहीं है इसलिए उसको कोई उम्मीदवार घास क्यों डालेगा? लेकिन अंग्रेजी अखबारों के दामन बहुत पाक साफ हैं ऐसा समझने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. हिन्दी और स्थानीय भाषा के अखबार अगर मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं तो अंग्रेजी अखबार उन मतदाताओं के चुने गये प्रतिनिधियों की योजनाओं को प्रभावित करते हैं. ऐसे में इधर दिल्ली में एक और खेल हुआ है. भद्र लोक के उन सभी अखबारों और चैनलों की सभी पार्टियों ने जमकर आवभगत की है लेकिन ऐसी खबरें शायद कभी बाहर नहीं आती है. उनके खेल भी पांच दल लाख के नहीं होते इसलिए लेन-देन पत्रकार या फिर टुंटपुजिए मैनेजर के जरिए नहीं किया जाता. मालिकों का काम होता है इसलिए नीचे किसी को भनक भी नहीं लगती है.
हिन्दी या स्थानीय भाषा के अखबारों ने पैसे लेकर अपनी कलम बेच दी, इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन भद्रलोक के अखबार या टीवी चैनल क्या दिल पर हाथ रखकर इस बात से इंकार कर सकते हैं कि उन्होंने खबर खरीदने बेचने का खेल नहीं किया है? खेल सबने किये हैं लेकिन अंग्रेजी भद्रलोक इस मुद्दे को भुनाकर अब स्थानीय भाषा और हिन्दी की पत्रकारिता पर एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता और विश्वसनीयता सिद्ध करना चाहता है. उनकी शायद ही इस बात में कोई रुचि हो कि पत्रकारिता में कोई सुधार हो. रणनीतिक रूप से वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि वे राष्ट्रीय हो चुके अखबारों की विश्वसनीयता को ध्वस्त कर दोबारा उसे अपने साथ जोड़ सकें. इसीलिए अब यह पेड न्यूज से अधिक हिन्दी बनाम अंग्रेजी का खेल हो गया है. अंग्रेजी की पूर्वाग्रहग्रस्त पत्रकार बिरादरी एक बार फिर हिन्दी और स्थानीय भाषा की पत्रकारिता को दोयम दर्जे का साबित करने में लग गयी है, यह जानते हुए भी कि वे खुद दूध के धुले नहीं है. शायद सर्कुलेशन के अलावा और किसी भी रूप में हिन्दी पत्रकारिता राष्ट्रीय नहीं हो पायी है इसलिए वह गधे की तरह इन सारे आरोपों को सुन रहा है और चुप है.
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एक प्रमुख अख़बार ने तो हिन्दी पत्रकारिता के मुंह पर कालिख ही पोत दी ! राजनीति की घिनौनी बेशर्मी अब हिन्दी अख़बारों के मालिकों में आ गयी है -थू है उन पर ..थू.... थू ......
खैर, अंग्रेजी पत्रों की हिन्दी पत्रों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति नई नहीं है। वे अंग्रेजों के समय से करते आ रहे हैं। हिन्दी में अब वह क्षमता है कि इसका मुहतो।द जबाब दे सकती है किन्तु हिन्दी पत्रकारों में न तो ऐसी कोई चेतना है न एसके लिये आवश्यक एकता।
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