प्रिंट मीडिया में एफडीआई, हां या ना?
मिंट ने विभिन्न अखबार / मीडिया मालिकों से मीडिया में एफडीआई के मुद्दे पर बात की है. हम उसी आधार पर एक रिपोर्ट यहां दे रहे हैं.
नेटवर्क 18 के मैनेजिंग एडीटर राघव बहल कहते हैं कि "वैचारिक रूप से मैं मुक्त व्यापार का समर्थक हूं, इसलिए विदेशी पूंजी निवेश में किसी प्रकार के प्रतिबंध के खिलाफ हूं. मुझे लगता है कि भारतीय कंपनियां अब प्रिंट में एफडीआई से होनेवाली चुनौतियों से निपट सकते हैं. अगर भारती वोदाफोन से प्रतियोगिता कर सकती है और रिलायंस (टेलीकॉम) एमटीएन को खरीदने की बोली लगा सकते हैं तो मीडिया ऐसा क्यों नहीं कर सकता? फिर भी मैं सरकार के उस नजरिये का स्वागत करता हूं कि मालिकाना हक किसी भारतीय के पास ही रहना चाहिए." राघव बहल का कहना है कि 26 प्रतिशत की लिमिट स्टाक एक्स्चेंज में लिस्टेड कंपनियों के लिए बड़ी समस्याएं खड़ी कर सकता है क्योंकि ये कंपनियां अभी भी 23 प्रतिशत एफआईआई लाने के लिए स्वतंत्र हैं. ऐसे में एफडीआई के 26 प्रतिशत कैप का उनके लिए क्या मतलब होगा?
विदेशी-संबंधः एनबीसी, सीएनएन और फोर्ब्स पत्रिका के साथ सामग्री का अनुबंध. फाईनेंसियल टाईम्स के साथ बिजनेस अखबार लाने का अनुबंध.
एचटी मीडिया लिमिटेड की उपाध्यक्ष शोभना भरतिया का मानना है कि प्रिंट मीडिया में 49 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश को छूट मिलनी चाहिए. इससे स्वामित्व भी भारतीय लोगों के हाथ में रहेगा और पैसे की समस्या भी दूर होगी. भरतिया का कहना है कि भारत में मीडिया इंडस्ट्री में विकास की अकूत संभावनाएं हैं और अगर वित्तीय समस्याएं दूर होती हैं तो इससे भारतीय मीडिया कंपनियों को नया विस्तार करने में मदद मिलेगी.
विदेशी संबंधः एचपीसी (मारीशस) और सिटीकार्प फाईनेंस कार्पोरेशन के पास एचटी मीडिया में 18.13 प्रतिशत हिस्सेदारी. एचटी समूह के बिजनेस अखबार मिंट के लिए वाल स्ट्रीट जर्नल के साथ सामग्री का अनुबंध.
जी नेटवर्क के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा कहते हैं कि "पश्चिम के अधिकांश देशों में भारतीय उद्योगपतियों को 20 प्रतिशत से अधिक मीडिया हिस्सेदारी देने पर रोक है. जबकि भारत में पहले ही गैर-समाचार क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई का प्रावधान है. पश्चिमी देशों में आप किसी डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को नहीं खरीद सकते. जी नेटवर्क को बाहर से जो आय होती है उसका 60 प्रतिशत अनिवार्य रूप से हमें वहां के स्थानीय साझीदार को देना होता है. यह अनिवार्य है.
लेकिन उससे भी महत्पपूर्ण बात दूसरी है. आज दुनिया भारत को भारतीय के नजरिए से नहीं देखती. वह भारत के बारे में वही धारणा रखती है जो पश्चिमी मीडिया बताता है. यही बात हमारे ऊपर भी लागू होती है कि हम पश्चिम को वैसा ही जानते-समझते हैं जैसा पश्चिम का मीडिया हमें बताता है. ऐसा कहन के पीछे मेरा मकसद यह नहीं है कि यह समझ लेना चाहिए कि मैं किसी खास कारण से ऐसा कह रहा हूं. अगर बीबीसी ब्रिटिश पूर्वाग्रह का शिकार रहता है और सीएनएन अमरीकी पूर्वाग्रह से रिपोर्टिंग करता है तो इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है. लेकिन अगर हमने मीडिया में विदेशी पूंजी और स्वामित्व को छूट दे दी तो हमारा अपना दृष्टिकोण पूरी तरह से गायब हो जाएगा."
विदेशी संबंधः जी इंटरटेनमेंन्ट इंटरप्राईजेज लिमिटेड के पास टेन स्पोर्ट्स में 50 प्रतिशत की हिस्सेदारी.
हिन्दू अखबार समूह के समूह संपादक एन राम का मानना है कि "वर्तमान में 26 प्रतिशत एफडीआई की सीमा पर्याप्त है. इसे इससे ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए. वर्तामन में ही 26 प्रतिशत की सीमा बहुत सारी समस्याएं पैदा कर रहा है." उनका कहना है कि "भारत में वर्तमान मीडिया के बाजार को देखते हुए विदेशी निवेशक भी इससे खुश ही होंगे." एन राम कहते हैं कि पहले तो वे प्रिंट मीडिया में एफडीआई के पूरी तरह से विरोधी लेकिन बदले हालात में 26 प्रतिशत तक समझौता किया जा सकता है.
विदेशी संबंधः कुछ नहीं.
जागरण प्रकाशन लिमिटेड के अध्यक्ष महेन्द्र मोहन गुप्ता का कहना है कि "हम तो 100 प्रतिशत विदेशी पूंजी के पक्षधर हैं. लेकिन अगर प्रबंघन को लेकर कोई विवाद है तो इसे 49 प्रतिशत तो कर ही देना चाहिए. जब हम स्वास्थ्य, शिक्षा और यहां तक कि रक्षा उत्पादों में भी विदेशी निवेश ला रहे हैं तो मीडिया के बारे में हम एफडीआई के बारे में इतने चिंतित क्यों हैं?
विदेशी संबंधः जागरण समूह में 20.8 प्रतिशत हिस्सेदारी इंडिपेंडेन्ट न्यूज एण्ड मीडिया तथा 3.88 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है.
मलयालम मनोरमा कंपनी लिमिटेड के कार्याकारी निदेशक जैकब मैथ्यू का कहना है कि "हम मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश का विरोध करते रहेंगे. भारत जिस तरह का विविधतापूर्ण देश है उसे देखते हुए यह जरूरी है कि भारतीय मीडिया का नियंत्रण भारतीयों के हाथों में ही रहे. दुनिया के अधिकांश देशों में मीडिया पर विदेशी स्वामित्व को रोकने के लिए कड़े कानून बनाये गये हैं. अगर एक बार हम दरवाजा खोल देते हैं तो उत्पादन से लेकर विपणन तक विदेशी कंपनियां हावी हो जाएगीं जिससे देश के जनमानस को वे बुरी तरह प्रभावित करेंगी. अगर ऐसा होता है तो यह खतरनाक कदम होगा.
विदेशी संबंधः कुछ नहीं.
टाईम्स आफ इंडिया समूह के सीईओ रवि धारीवाल का कहना है कि प्रिंट मीडिया में ऊंचे स्तर पर एफडीआई के हम समर्थक नहीं हैं क्योंकि इससे कोई खास लाभ नहीं मिलता है. अगर आपको पैसे की दरकार है तो आज आप भारत में ही इकट्ठा कर सकते हैं. फिर, मीडिया में दूसरे सेक्टरों की तर्ज पर विदेशी पूंजी को खुली छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे मानस प्रभावित होता है. आप कल्पना करिए कि अगर मीडिया समूह में मालिकाना हक किसी विदेशी कंपनी के हाथ में रहता है तो क्या संपादक अपने समूह की शेयरधारकों की चिंता करेगा या जनता की?
विदेशी संबंधः वर्ल्डवाईड मैगजीन में बीबीसी की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी. रायटर के साथ टेलीविजन समाचार का समझौता. इसके अलावा डाउजोन्स के साथ वालस्ट्रीट जर्नल भारत में प्रकाशित करने का समझौता हुआ फिर टूट गया.
पायनियर समूह के एमडी और भाजपा के राज्यसभा सदस्य चंदन मित्र प्रिंट मीडिया में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी के प्रबल समर्थक हैं. वे कहते हैं कि "49 प्रतिशत विदेशी पूंजी आने के बाद भी मालिकाना हक और संपादकीय टीम भारतीय ही होगी इसलिए चिंता करने की कोई बात नहीं है."
विदेशी संबंधः कुछ नहीं.
यह तो हुई मीडिया दिग्गजों की बात. आप क्या समझते हैं कि प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश आना चाहिए या नहीं? इस मुद्दे पर आप विस्फोट फोरम की बहस में भी भाग ले सकते हैं.
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