अब कोई नहीं पूछता पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन
अब कोई नहीं पूछता पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन। शायद अब सब जान-बूझ गए हैं कि भारत में 25000 करोड़ रुपए की मीडिया इण्डस्ट्री मिशनरी भाव से खड़ी नहीं की जा सकती है। यह शुद्ध व्यावसायिक हितों से ही सम्भव है। बिरला से लेकर उषा मार्टिन तक हर तरह के व्यावसायी इस व्यवसाय में क्या किसी सामाजिक परिवर्तन की अकांक्षा लेकर आए हैं? बिल्कुल नहीं।
वैसे अगर देखा जाए तो यह व्यवसाय देश के तमाम व्यवसायों से अधिक चोखा है। समाज में सम्मान दिलाता है, इससे आमदनी होती है, और सरकार - प्रशासन के बीच अखबार के मालिक की हैसियत से रौब-दाब तो रहता ही है।
पिछले कुछ समय से पत्रकारिता में एक नया ट्रैण्ड देखने को मिल रहा है। खबरों की खरीद-बिक्री का। ऐसे में अखबार पढ़ने वाले उस खबर पर कैसे विश्वास करेंगे, जिसे एक समय वह ब्रम्हा का वाक्य मानते थे। उसमें छपे एक-एक शब्द को वह सत्य मानते थे। अरविन्द मोहन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के लिए, छपे हुए शब्द हमेशा वजनी रहे हैं। अब वे `वजनी´ शब्द अपना `वजन´ खो रहे हैं। इन्दौर से निकलने वाली `नई दुनिया´ जैसे अखबारों का एक समय ऐसा रुतबा था कि यह कहावत मशहूर हो गई थी- शहर में बारिश हुई और `नई दुनियां´ में नहीं छपी तो लोग-बाग मानने से इंकार कर देते कि कोई बारिश हुई है। अब मामला बिल्कुल जुदा है, अब आप मई की चिलचिलाती धूप में पैसे खर्च करके भारी बारीश की खबर छपवा सकते है। और इसमें अधिक शर्मनाक यह है कि इस घालमेल में बड़े घरानों के प्रतिष्ठित अखबार भी शामिल हैं। राजनीति और पत्रकारिता दोनों एक दूसरे के लिए किस प्रकार काम कर रहे हैं। इसकी एक मिशाल देखिए, पंजाब की सरकार ने एक अप्रैल 2008 से जनवरी 2009 तक एम एच वन नाम के एक समाचार चैनल को अठावन लाख, चौरासी हजार, आठ सौ उन्नीस रुपए का विज्ञापन दिया। उसी दौरान प्रसार भारती को मात्र दो लाख बासठ हजार उनहत्तर रुपए का विज्ञापन दिया गया।
क्या आपको लगता है कि इतना पैसा लेने के बाद कोई चैनल सत्तारुढ़ पार्टी के खिलाफ स्टोरी चलाकर अपनी वफादारी पर सवाल उठाने का उसे कोई मौका देगा? यह बड़े शातिर तरिके से सरकारी पैसे का इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार के लिए करने का भी मामला है। वरिश्ठ पत्रकार प्रभाश जोशी ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में खबर के लिए आरक्षित पृष्ठों पर विज्ञापनों की खबर की शक्ल में घुसपैठ के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी। अब वह नहीं है लेकिन मिलावटी खबरों के खिलाफ उनका जो आन्दोलन था उसे जारी रहना चाहिए। वह जंग सिफ पत्रकारिता ही नहीं( देश और समाज के भी हित में है।
खबर और विज्ञापन के इस घालमेल को लेकर पिछले दिनों अल्मोड़ा (उत्तरांचल) के वरिष्ठ पत्रकार शमशेर सिंह बिष्ट ने एक संस्मरण सुनाया। उस वक्त दिल्ली से `प्रथम प्रवक्ता´ के संपादक वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय जो उन दिनों `जनसत्ता´ में थे। देहरादून आए थे। उत्तरांचल में पत्रकारों से अखबार की नई नीति पर बातचीत के लिए। राय साहब से पहले वहां पत्रकारों को विज्ञापन विभाग से सम्बंधित लोगों ने संबोधित किया। जिसमें पत्रकारों को एक निश्चित विज्ञापन सीमा के सम्बंध में बताया गया था। अगले सत्र में पत्रकारिता के सरोकार पर राय साहब पत्रकारों के सामने अपनी बात रख रहे थे, उसी दौरान बिष्ट जी ने यह सवाल उठाया, हम यहां जान पर खेलकर कई तरह की धांधलियों का खुलासा करते हैं। अपने दुश्मन बनाते हैं। आप अखबार देख लें, अधिक विज्ञापन उन्हीं लोगों की तरफ से होते हैं, जो गलत होते हैं। जिनकी खबर छपने वाली होती है, वे विज्ञापन देतें हैं और खबर रुकवाने के लिए। विज्ञापन देने वाले अधिकांश लोग वही होते हैं, जिनका कोई ना कोई स्वार्थ अखबार से जुड़ा होता है। अब पत्रकार उनसे विज्ञापन मांगने लगे फिर किस मुंह से उनके खिलाफ खबर लगाएंगे। बिष्ट जी के अनुसार उनके इस सपाट बयानी से उस वक्त राय साहब बड़े प्रभावित हुए।
आज बात विज्ञापन से कई कदम आगे बढ़ गई है। आज विज्ञापन और खबर के बीच की गहरी खाई पटती जा रही है। `दि हिन्दू´ अखबार में छपी पी साईंनाथ के एक लेख की पंक्तियां देखें-
`एक ही सामग्री किसी अखबर में खबर के तौर पर छपी तो किसी अखबार में विज्ञापन के तौर पर।´
`लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है, यह शीर्षक है नागपुर (दक्षिण-पश्चिम) से निर्दलीय उम्मीदवार उमाकान्त (बबलू) देवताले की तरफ से खरीदी गई खबर की। यह खबर `लोकमत´ (06 अक्टूबर) में छपी थी। उसके आखिर में सूक्ष्म तरिके से एडीवीटी (एडवर्टिजमेन्ट यानी विज्ञापन) लिखा था। `द हितवाद´ (नागपुर से छपने वाला अंग्रेजी अखबार) में उसी दिन वह खबर छपी और उसमें कहीं विज्ञापन दर्ज नहीं था। देवताले ने सही कहा था लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है। लेकिन क्या कहे जब आज समाचार पत्र और समाचार चैनल खुलकर इस शर्मनाक काम को अंजाम दे रहे हैं। और उन्हें इसके लिए शर्म भी नहीं आ रही।
'हमने कलम को क्या-क्या ना बनाया अब तक
इस नए दौर में हथियार बनाने की जिद,
बिका दिमाग, बिकी रुह जुबां भी गिरवी
फिर भी अखबार को अखबार बनाने की जिद।'
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
गन्दा है पर धंधा है.
Post your comment