दिल्ली के मीडिया मण्डी की मजबूर लड़कियां
आज हम आपका परिचय कराते है देश की राजधानी दिल्ली के मीडिया घरानों और उससे जुड़े कुछ ऐसे पत्रकारों से जिन्होंने उदारीकरण के इस दौर में खुलेपन का भरपूर फायदा उठाया है या फिर आज भी फायदा उठाकर पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं। सबसे पहले संगठित रूप से मीडिया में यौनाचार की कहानी हमें झंडेवालान इलाके में एक अखबार में देखने को मिली थी।
अखबार के मालिक एक बड़े आदमी थे। 16 आदमी का स्टाफ था यहाँ। चार महिला पत्रकार भी थीं। इन चारो को कहीं का नहीं छोड़ा गया। इस मालिक-सम्पादक के साथ दो और पत्रकार शाम को आते और शराब के साथ जश्न मानते थे। वह मालिक तो एक बम कांड में मारा गया और हर शाम मजा लेने वाले दोनों पत्रकार आज यहाँ बड़े पत्रकार बने बैठे है। महरौली इलाके से निकलनेवाले एक अखवार की नकचढ़ी महिला को बहुत लोग जानते होंगे। यह महिला मालिक के साथ न सिर्फ सोती थी वल्कि कई और महिलाओं को भी हाजिर करती थी। पश्चिम विहार इलाके में एक छोटे अखवार दे दफ्तर से ६ लड़किया पकरी गयी थी। १९९९ की घटना है। दिन में पत्रकारिता और रात में ब्लू फिल्म की कहानी यहाँ दोहराई जाती थी। पत्रिका के मालिक आजकल एक चानेल में वरिस्ट पत्रकार है। इसी दिल्ली में पोर्न पत्रकारिता करने वाले कम से कम १५ लोग आज कई अखवार निकाल रहे है । इनके यहाँ सिर्फ लड़किया ही काम करती है। ये लड़किया यहाँ क्या करती है नहीं कह सकता। लडकियों के रसिया एक पत्रकार महोदय एक बड़े अखवार में समय से पहले ४ लडकियों को प्रोनात्ति दिला चुके है। नॉएडा में एक अखवार के दो वरिस्ट पत्रकार लड़कियों के चक्कर में अपना घर तोड़ चुके है। कनाट प्लेस स्थित एक अखवार के सम्पादक की लड़किया कमजोरी है। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अखबार में तिन लड़कियों ने एक कार्टेल बना कर तमाम तरह की सुविधाए लेती रही। अंग्रेजी अखवार की ये लड़कियां अपने दम पर अब तक ७ लोगो की नौकरी ख़त्म कर चुकी है। इनमे से एक लड़की दक्षिण दिल्ली से आती है और अपने परिवार से अलग रहती है। दिल्ली के कई इलाको से निकलने वाले दर्जनों अखवारो और पत्रिकाओं में महिलाओं के शोषण की अनंत गाथा है।
लक्ष्मी नगर में ही दो अखवार के मालिक सम्पादक पीटे जा चुके हैं सेक्स के आरोप में । दिल्ली से ही निकलनेवाली एक पत्रिका के तीन वरिष्ठ लोग सदा से ही कामुक रहे है। जब ये अखवार में थे तो वहां भी रास रचाते थे। वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह कहते है कि राजनीति में कई महिलाओं का प्रवेश बिस्तर से होकर गुजरता है ठीक उसी तरह पत्रकारिता में भी कई महिलाओं का प्रवेश शायद इसी तरह से हो रहा है। कई उदाहरण है इसके। एक ऐसी पत्रिका के प्रकाशन की दास्ताँ हमारे सामने है जिसकी बुनियाद ही सेक्स की भावना से दी गयी थी। दो लड़कियों के करामात के कारण ये पत्रिका तो बंद हो गयी । सम्पादक पत्रकार सड़क पर आ गए लेकिन वो दोनों महिला पत्रकार आज सेलिब्रेटी बनी हुयी है। देश में प्राइवेट चैनेल की उम्र कोई १५ सालों की है। इन १५ सालो में पत्रकारिता के रूप रंग, आचार, विचार, सब बदले है। मिशनरी पत्रकारिता का रूप प्रोफेशन और कैरियर के रूप में सामने है। बाजार ब्यवस्था है। और उसका व्यापक असर भी। जब मिशन की बात ही नहीं है तो ग्लैमर की इस दुनिया में भला कौन नहीं आना चाहे? बाजारवाद के इन्ही दिनों में लोगो की प्रतिबद्धता समाज से कम होकर ब्यक्ति के प्रति बढ़ गयी। आज टीवी की दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है उसके लिए हम सब दोषी है।
नॉएडा आज टी वी की दुनिया का केंद्र बना हुआ है। लेकिन यहाँ दर्जनों ऐसे केस है जो आधुनिक पत्रकारिता और पत्रकार के चरित्र को दिखाता है। यहाँ के ही एक ऐसे प्रबंध संपादक है जिन्हें एक महिला पत्रकार से बेहद लगाव है। कहते है की इस महिला पत्रकार से हर कोई डरता है। एक चैनेल के एक एसाइनमेंट एडीटर को लड़कियों की ऐसी भूख थी की उसे हर रो़ज किसी का साथ चाहिए था। लड़कियां आपस में बात करती थी कि आज उन्होंने कैसे क्या किया। पांडव नगर से एक चैनेल में काम करने वाली लड़की अपने इनपुट एडिटर की खासी प्यारी रही है। इस लड़की को दो प्रमोशन मिल चुका है। एक चैनेल की एंकर अपने लटके झटके के दम पर आउटपुट एडिटर को फंसाया। फिर यह लड़की सम्पादक से मिलकर उसकी छुट्टी करा दी। इस लड़की की उस चैनेल में खूब चल रही है और नौकरी के डर से कोई बोलने को तैयार नहीं है। एक चैनल की प्रोग्रामिंग एडिटर को मालिक ने खूब आगे बढ़ाया। बाद में इसकी विदाई हो गयी। यह महिला आज नोएडा में ही काम कर रही है।
एंकरों की दुनिया भी खूब है। दिल्ली की चार एंकर की सीडी बनी हुई है और उसमे भीतर के खेल को दरशाया गया है। एक चैनल के मालिक और उसके पुत्र अपने दोस्तों के साथ ही महिलाओं की इज्जत उतारते है। जिन लोगो ने विरोध किया उनकी नौकरी चली गयी। एक स्टिंग आपरेशन टीम के सीइओ ने बंगलौर जाकर तीन लड़कियों के साथ गड़बड़ किया। उस लड़की ने पुलिस में कम्प्लेन करने की बजाय नौकरी छोड़ दी। इनमे दो लडकियां सबसे तेज चैनेल में है और एक नॉएडा की एक चैनेल में। इसी नॉएडा के एक बड़े चैनेल में दो पत्रकार महोदय पहले 16 लडकियो की बहाली की। बाद में चार लडकियां निकाल दी गयी। इन लड़कियों ने मेल के जरिये बताया है की उसे कुछ पाने के लिया कुछ देने की बात कही गयी थी। एक प्रोडक्शन हाउस में एक भी सिटी एडिटर को खुश करने के लिए लड़कियों ने काफी लिफ्ट दी। बाद में उसी के जरिये ये लडकियां एक चैनेल में सामूहिक रूप से पहुच गयीं। दो लड़की अभी झंडेवाला में काम करती है। विशेष संबाददाता के रूप में काम कर रही इस लड़की के पास शायद मुक्कम्मल डिग्री भी नहीं है। ग्रेटर कैलास से आने वाली उस एंकर को फिल्म सिटी में कौन नहीं जानता जो हेड से ही गाली गलौज से बात करती है।
हमारे मेल पर दर्जनों महिलाओं ने अपनी बात भेजी है और दर्जनों पुरुष पत्रकारों ने भी अपने अनुभव भेजे है। इनमे कई लोगो के नाम और काम भी है। कई मालिको के कारनामे भी। बावजूद इसके पत्रकारिता एक पवित्र धर्म है। समाज में बदलाव लाने का जरिया है। केवल नौकरी के नाम पर सब कुछ गवा देने की जो परम्परा चल रही है हमें रसातल की और ले जाएगा। इस पुरे खेल में काम करने वाले लोग परेशान हो रहे है। चाहे वह पुरुष हो या महिल्ला। इस पुरे मामले को चैनेल मालिको को भी समझना चाहिए।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
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- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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विस्फोट पर इस रपट की शीर्षक पढ़ कर दिल दु:ख गया।
विस्फोट के सैकड़ों पाठक हैं, जो इस तरह की भाषा पसंद नहीं करते हैं। देश में गली मुहल्ले से निकलने वाले कई ऐसी पत्र पत्रिकाएं हैं, जहां इस तरह के असंसदीय शब्दों का प्रयोग कर पत्रकारिता की जाती है। भले ही ऐसे शब्दों के उपयोग के साथ सच का उजागर किया जाता हो, पर ऐसे सच के पाठकों का वर्ग अगल होता है। ऐसे सच का उजागर जब बड़े और प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में होता है, तो शीर्षक में ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं दिखता है। सभ्य भाषा में भी असभ्य विषय की रिपोर्ट समाज और प्रशासन की आंखे खेलती है और उन्हें सोचने को मजबूर करती है।
श्री अखिलेश जी जिनके लिए जहां-जहां यह लिख रहे हैं, उन्हें पता है कि शारीरिक संबंधों के दम पर पत्रकारिता करने वाली को क्या कहा जाएं?
मेरी राय में शीर्षक में उपयोग किया गया असंसदीय शब्द विस्फोट की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला है।
AGAR AAPME DAM HAI TO, UN SAMPADKO AUR MALIKO KE NAMO KA KHULASA KARE, NAHI TO YE APNA MANSIK VIKAR AUR KUNTHA KO KISI AUR MADHYAM SE NIKALEN.
Lekin AAP NE JO SHABD ISTEMAL KIYA HAI WO THIK NAHI HAI, USE WAPAS KISI AUR NAM SE LIKHE
विस्फोट का स्तर है, भाषा को उसी अनुरूप बनाए रखें. आप भाषा के जानकार लोग है इसलिए कहता हूँ, वर्तनी दोष भी इतने है कि अखर रहे हैं.
भारतीय ब्लॉगिंग दुनिया के समस्त ब्लॉगरों से एक स्वतंत्र पत्रकार एवं नियमित ब्लॉग पाठक का विनम्र अपील-
संचार की नई विधा ब्लॉग अपनी बात कहने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है, परन्तु कुछ कुंठित ब्लॉगरों के कारण आज ब्लॉग व्यक्तिगत कुंठा निकालने का माध्यम बन कर रह गया है | अविनाश (मोहल्ला) एवं यशवंत (भड़ास 4 मीडिया) जैसे कुंठित
ब्लॉगर महज सस्ती लोकप्रियता हेतु इसका प्रयोग कर रहे हैं |बिना तथ्य खोजे अपने ब्लॉग या वेबसाइट पर खबरों को छापना उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि बिना गवाही के सजा सुनाना | भाई अविनाश को मैं वर्षों से जानता हूँ - प्रभात खबर के जमाने से | उनकी अब तो आदत बन चुकी है गलत और अधुरी खबरों को अपने ब्लॉग पर पोस्ट करना | और, हो भी क्यूं न, भाई का ब्लॉग जाना भी इसीलिए जाता है|
कल कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात चल रही थी कि अविनाश आलोचना सुनने की ताकत नहीं है, तभी तो अपनी व्यकतिगत कुंठा से प्रभावित खबरों पर आने वाली 'कटु प्रतिक्रिया' को मौडेरेट कर देता है | अविनाश जैसे लोग जिस तरह से ब्लॉग विधा का इस्तेमाल कर रहे हैं, निश्चय ही वह दिन दूर नहीं जब ब्लॉग पर भी 'कंटेंट कोड' लगाने की आवश्यकता पड़े | अतः तमाम वेब पत्रकारों से अपील है कि इस तरह की कुंठित मानसिकता वाले ब्लॉगरों तथा मोडरेटरों का बहिष्कार करें, तभी जाकर आम पाठकों का ब्लॉग या वेबसाइट आधारित खबरों पर विश्वास होगा |
मित्रों एक पुरानी कहावत से हम सभी तो अवगत हैं ही –
'एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है', उसी तरह अविनाश जैसे लोग इस पूरी विधा को गंदा कर रहे हैं |
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