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वर्चुअल स्पेश के रीयल तानाशाह

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अब वर्चुअल स्पेश का इस्तेमाल भी प्रायोजित तरीके से किया जाने लगा है। पिछले कुछ समय से मीडिया के इस आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल भी निजी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए स्वहित तथा व्यक्ति विशेष को लाभ पहुँचाने के उदेश्य से किया जा रहा है। इसके ज्वलंत उदाहरण हैं - अविनाश (मोहल्ला लाइव) और यशवंत (भड़ास 4 मीडिया) की पत्रकारिता।

टेलीविजन और प्रिन्ट माध्यम पर अधिनायकवादी होने के आरोप लगातार लग रहे थे और न्यू मीडिया के बढते प्रयोग ने वेबसाइट को एक अच्छे विकल्प के रुप में प्रस्तुत किया। जिसका कारण यह था कि यहाँ समाचार टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं की तरह प्रायोजित और बनावटी नहीं होते थे। यहाँ लेखक ही नहीं पाठक भी अपनी प्रतिक्रिया बेबाकी के साथ व्यक्त करते थे तथा अपनी प्रतिक्रिया को लेकर पाठकों के मन में किसी शंका या संदेह की स्थिति नहीं रहती थी। मोडेरेटर भी निष्पक्षता को बरकरार रखने के लिए पाठक-प्रतिक्रियाओं के साथ छेड़छाड़ किए बिना उसे प्रकाशित करते थे। यहाँ तक कि पोर्टल के संचालक द्वारा अपनी कटु आलोचनाओं को भी पोर्टल पर जगह दी जाती थी। जो इस माध्यम की खास पहचान और ताकत दोनों है। किसी घटना के कई अनछुए पहलू तो पाठक-प्रतिक्रियाओं से ही उजागर होते थे।

लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं रही, अब वर्चुअल स्पेश का इस्तेमाल भी प्रायोजित तरीके से किया जाने लगा है। पिछले कुछ समय से मीडिया के इस आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल भी निजी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए स्वहित तथा व्यक्ति विशेष को लाभ पहुँचाने के उदेश्य से किया जा रहा है। इसके ज्वलंत उदाहरण हैं - अविनाश (मोहल्लालाइव) और यशवंत (भड़ास4मीडिया) की पत्रकारिता।

विरोध की चिट्ठीअविनाश जो लगातार एक साल से अधिक समय से वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की छवि खराब करने में लगे हैं, इनकी रिपोर्ट चंद ऐसे छात्रों से प्रभावित होती है या यूं कहें कि उन्हीं के द्वारा तैयार की जाती है जो बातें तो उँची करते  हैं पर उनकी प्रवृत्ति हमेशा विश्वविद्यालय का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करने की रही है। अविनाशजी जिन छात्रों के रिपोर्ट की दुहाई देते हैं, उनका विश्वविद्यालय और शिक्षा से कुछ लेना-देना नहीं, बशर्ते उनके हितों की पूर्ति होती रहे। ये वही छात्र हैं जो छात्रों के नामांकन से लेकर शिक्षकों की नियुक्ति तक में अपनी दखल चाहते हैं।

विश्वविद्यालय में पढाई लिखाई भले न हो, इसके इतर की गतिविधियाँ चलती रहें, यही उनका उदेश्य होता है। पता नहीं इससे उन्हें कितना फायदा या नुकसान हो रहा है, परन्तु विश्वविद्यालय की छवि को हो रहे नुकसान से अन्य छात्रों का 'करियर' जरूर बाधित होगा। पिछले दो-चार दिनों में म.गां.अं.हिन्दी विश्विद्यालय से संबन्धित कुछ खबरें 'मोहल्ला लाइव' और 'भड़ास 4 मीडिया' तथा 'जनतंत्र' पर आई हैं, जो एकपक्षीय तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। सिर्फ खबर ही नहीं उस पर आने वाली प्रतिक्रियाएं भी एकपक्षीय हैं। क्योंकि खबर के विरोध में लिखे जाने वाले प्रतिक्रियाओं को तीनों पोर्टलों के मोडरेटर द्वारा तुरंत मोडेरेट कर दिया जाता है। अगर इतने से काम नहीं चलता तो प्रतिक्रिया देने का विकल्प भी बन्द कर देते हैं।

खबर के एकपक्षीय होने की बानगी आप मोहल्ला लाइव पर छपे लेख - "तानाशाह कुलपति ने न्‍यायप्रिय प्रोफेसर को निकाल दिया" के हेडिंग से भी समझ सकते हैं, दूसरा- अविनाश इस पोस्ट की शुरूआत ही उन शब्दों से करते हैं जो खबर के एकपक्षीय होने की पुष्टि करते हैं, जो इस प्रकार है –

वर्धा से जब कुछ छात्रों ने फोन किया कि अनिल चमड़‍िया सर को निकाल दिया गया है, तो वी. एन. राय की गतिविधियों को लेकर पहले जितना गुस्‍सा था – वो लगभग घृणा में बदल गया। सृजन और लोकतंत्र का नकाब पहन कर कोई आदमी इस हद तक घिनौना हो सकता है कि एक असहमत आदमी को अपने घमंड की बूटों तले कुचल डाले?

कल हंस कार्यालय में कथाकार संजीव ने मिलते ही कहा कि आपलोग बहुत गलत काम कर रहे हैं। वर्धा प्रकरण में मोहल्‍ला की भूमिका संदिग्‍ध है। दरअसल संजीव उस सवाल से बचने के लिए सवालिया हमले की जमीन तैयार कर रहे थे कि अभी अभी हुए एक कथा आयोजन में वे कुलपति विभूति नारायण राय के मेजबान बने थे। संजीव जनसंस्‍कृति से जुड़े कथाकार हैं और पाठकों के बीच उनका सम्‍मान असंदिग्‍ध रहा है। लेकिन अपने समय के नायकों की पतित गाथा का ऐसा दृश्‍य हमें देखने को मिल रहा है – जब दलित छात्रों के आंदोलन पर हेय नज़र रखने और चोर गुरु के साथ षड्यंत्र करके एक योग्‍य गुरु को वर्धा से निकालने की मुहिम में हमारे कथाकार-रचनाकार एक बदबूदार वीसी के साथ खड़े हैं।

लेखक की यह पंक्तियां स्पष्ट करती हैं कि लेखक पूर्वाग्रह से ग्रसित है। और क्या देश में खबरों की इतनी कमी हो गई है कि एक ही दिन में अविनाशजी को लगातार पाँच-पाँच पोस्ट अनिल चमड़िया से सम्बन्धित छापना पड़ता है या अविनाशजी की नजरों में देश की सारी समस्याएँ अनिल चमड़िया के आगे छोटी हो गई हैं ? जब यही करना है तो अविनाशजी कुछ तो शर्म करो और खुद को पत्रकार कहना छोड़ दो। चाहे 'मोहल्ला लाइव' की बात हो या 'भड़ास 4 मीडिया' की इन्हें अपने पोस्टों के विरूद्ध प्रतिक्रिया झेलने की हिम्मत भी दिखानी चाहिए। अन्यथा पत्र/पत्रिकाओं और वेबसाइट/ब्लॉग में अन्तर ही क्या रह जाएगा?

(वर्धा विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों द्वारा भेजी गयी चिट्ठी जो अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं.)

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यशवंत सिंह on 07 February, 2010 16:30;19
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खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे...
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snirupam on 07 February, 2010 21:53;21
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महोदय,

आपका कहना बिल्कुल सही है। दूसरों को आईना दिखाते वक्त ऐसे सेटिंगबाज पत्रकार तो एक से बढ़कर एक बाते लिखते हैं और चिल्लाते हैं, लेकिन खुद का जुगाड़ हो जाए तो पटना यात्रा के 5 संस्करण निकाल देंगे। कुछ और ज्यादा मिले तो पूरी किताब लिखने बैठ जाएं । ऐसे में ये अपनी बुराई, या यूं कहिए सच्चाई सुन ही नहीं सकते, पढ़ ही नहीं सकते । हमारे एक मीडिया साथी और खुद उनके ही एक अभिन्न ने जब एक कमेंट को माध्यम से जब उनको आईना दिखाया तो इसका परिणाम क्या रहा ये देख कर आप भी हंसेगे , ऐसे वर्चुअल स्पेस के रियल तानाशाहों पर....कमेंट को अपनी प्रशस्ति गान बना दिया गया ।

आपके और विस्फोट के पाठकों की सुविधा के लिए वो लिंक दे रहा हूं, शीघ्रता से इसका आनंद उठाइए वरना हो सकता है ऐसी तानाशाही इसे डिलीट कर दे

http://www.bhadas4media.com/index.php?option=com_content&view=article&id=4040:maurya-tv-launch&catid=27:latest-news&Itemid=29

और दूसरे पोस्ट में देखिए

http://www.bhadas4media.com/index.php?option=com_content&view=article&id=4086:uday-shankar-khaware&catid=27:latest-news&Itemid=29

इसमें gr8 नाम वाले कमेंट की लेखनी पर ध्यान दीजिए । तानाशाह ने इस खुद मौडिफाई किया है। हम लोग उसकी इस हरकत पर हंस रहे हैं ।

और ज्यादा कहने की जरुरत नहीं । आपके इसी पोस्ट में तानाशाही अंधेपन में मदमस्त एक कमेंट आ ही गया है कि खिसियानी बिल्ली....।

दिनकर की कविता याद है आपको...कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है ।
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त्रिलोकीनाथ त्रिपाठी on 07 February, 2010 23:56;49
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यशवंत की असलियत भी अब ज़माने के सामने आ चुकी है। मीडिया और पत्रकारिता के नाम पर सच्चाई को दबाने का कारोबार कब तक चलेगा। तृतीय श्रेणी से स्नातक पास एक व्यक्ति को प्रोफेसर बनाकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का सिलसिला कब तक चलेगा। तहजीब के दायरे में रहकर तमीत से शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन शराब पीकर विश्वविद्यालय परिसर में दादागिरी दिखाना भी ठीक बात नहीं है। यहीं नहीं जब लोग कहे कि भाई परिसर में शराब पीकर मत आओं तो उन पर बिना देरी किए दलित नामक ब्रह्मास्त्र से वार करना दुनिया के किस संविधान में लिखा गया है। विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के अलावा अगर कोई शख्स राजनीति या बाबा साहेब आंबेडकर के नाम का दुरूपयोग करता है तो छात्र समुदाय के साथ साथ समाज और देश का सबसे बड़ा गुनहगार है।
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पंकज सिंह on 08 February, 2010 12:10;12
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अरे भाई किस चिरकुट का नाम ले कर आप लोग विस्फोट की गरिमा खराब कर रहे हैं। यशवंत एक पौव्वा दारु पर आपके लिए आपकी बड़ाई के लिए कुछ भी छाप सकता है।
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यशवंत सिंह on 08 February, 2010 13:55;48
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हा हा हा हा
जब कोई तुम्हारी बुराई करे तो समझो तुम सफल हो...
हा हा हा हा
लगे रहो भइयों....
हा हा हा हा
वेब डेमोक्रेटिक माध्यम है. किसी की अच्छाई बुराई नहीं छिप सकती. मेरे यहां नहीं तो तेरे यहां छपेगा. तेरे यहां नहीं छपेगा तो कोई ब्लाग बनाकर छापेगा. यही वेब और ब्लाग की ताकत है. मैं आप लोगों की राय का सम्मान करता हूं. अगर कुछ और सुझाव हो तो इसी तरह देते रहिए....
हा हा हा हा हा
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poora padhe on 08 February, 2010 17:15;56
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मित्रों यहां जब अविनाश और यशवंत जैसे लोगों पर पाठक-प्रतिक्रियाओं के साथ छेड़छाड़ किए जाने के आरोप लग ही चुके हैं तो यहां प्रस्तुत है इन दोनों के साथ - साथ जनतंत्र तथा अन्य वेब-ब्लॉग के मोडरेटरों द्वारा मोडरेटरेट किए कुछ प्रतिक्रिया, जो सिर्फ नमूना है, जिसे मोडरेटरेट कर प्रतिक्रिया और खबर दोनों को एकतरफा बना दिया जाता है, ये सभी प्रतिक्रिया मैंने चमड़िया जी से जोड़कर चलाए जा रहे प्रकरण के बीच ही इकट्ठे किए हैं, जो शाम को तो दिखते थे पर सुबह गायब रहते थे, कुछ तो घंटे भर भी नहीं रह पाते थे . शुरू-शुरू में यह मेरे लिए बहुत आश्चर्यजनक था, फिर मैं इन प्रतिक्रियाओं को यही सोच कर इकट्ठा करने लगा कि वेब-ब्लॉग के निष्पक्षता के विरूद्ध लिखने के काम आएगा | चलिए यहां प्रतिक्रिया के रूप में ही सही, किसी के द्वारा लिखी गई प्रतिक्रिया लोगों के सामने तो आ रही हैं . मेरे द्वारा इकट्ठे किए गए सभी प्रतिक्रियायें निम्नलिखित हैं -
written by Ramesh Parashar, January 30, 2010
अनिल चमड़िया का ये कहना कि वे दलित हैं, 100 फीसदी झूठ है। श्री चमड़िया पत्रकारिता में मौका पाने के लिए स्वयं को दलित कहते हैं। इनका तथाकथित दलित प्रेम भी एक स्वांग है क्योंकि अनिल जी और इनके परिवार को दलितों से कोई लेनादेना नहीं है। अनिल चमड़िया न जाति से और न कर्म से दलित हैं। बल्कि वे जाति से मारवाड़ी बनिया और बड़े व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनकी शिक्षा सासाराम में ही हुई है। अत: हर व्यक्ति इनके बारे में अच्छी तरह जानता है। इनका विवाह सासाराम शहर के बड़े वैश्य परिवार गिरीश चन्द्र जायसवाल की बेटी से हुआ है। जिनका शहर में दर्जनों मकान, मार्केट और व्यापार है। अन्य भाइयों और बहन की शादियां भी बड़े मारवाड़ी व्यापारी परिवार में हुई है। इनके परिवार के किसी भी दूर के रिश्तेदार का भी वैवाहिक सम्बंध किसी दलित परिवार से नहीं है। अनिल चमड़िया और उनके परिवार का एक संक्षिप्त परिचय-
अनिल चमड़िया, पिता स्व. राम गोपाल चमड़िया, निवासी -हरे कृष्ण कॉलोनी, कंपनी सराय, थाना- सासाराम, जिला-रोहतास, बिहार, अपने पांच भाई और एक बहन में सबसे बड़े हैं। इनके अन्य भाइयों का नाम सुनील चमड़िया पेशे से चार्टर्ड एकाउटेंट, आलोक चमड़िया और अमित चमड़िया पेशे से पत्रकार और अशोक चमड़िया पारिवारिक गल्ले के व्यवसाय में हैं। बहन प्रीती चमड़िया का विवाह हो गया है। इनके परिवार का लगभग 30-35 वर्षों से गल्ला के थोक दलाली का व्यवसाय है, जिसे पूर्व में इनके पिता और अब भाई संचालित करते हैं। ये लोग मूलत: मध्य प्रदेश के सागर शहर के निवासी हैं। जो बाद में व्यवसाय हेतु सासाराम आ गए थे। इनका परिवार सासाराम शहर के बड़े व्यवसायी मारवाड़ी परिवारों में शुमार होता है। अनिल चमड़िया के चचेरे चाचा श्री मनोहर लाल जी अपने ननिहाल के धन पर सागर से सासाराम आए। यहां आकर इन्होने अपनी सरनेम चमड़िया की जगह पोद्दार लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि इनके ननिहाल का उपनाम पोद्दार था। मनोहर लाल जी चूंकि अपने ननिहाल के घर पर आए तो इन्होंने अपना उपनाम पोद्दार रख लिया। परन्तु अनिल चमड़िया के पिता ने अपना मूल मारवाड़ी उपनाम चमड़िया बरकरार रखा। जो आज तक चला आ रहा है। श्री अनिल चमड़िया के दादा का नाम महावीर प्रसाद चमड़िया था, जो म.प्र. के सागर शहर में व्यवसाय करते थे। बाद में सासाराम आने से पहले इनके पिता और चाचा ने वहां की संपति बेच दी। आज श्री चमड़िया के परिवार के पास शहर और उसके आसपास करोड़ों का व्यवसाय पत्रकारिता के धौंस पर बखूबी चलता है। इनके और इनके भाइयों के पत्रकारिता की धौंस हमेशा इन लोगों के व्यवसायिक हितों के काम आई है।
चमड़िया के सरनेम वाले श्री सीताराम चमड़िया कांग्रेस के जमाने में बिहार सरकार के मन्त्री हुआ करते थे। जो मारवाड़ी बनिया थे। अनिल जी शायद देश के पहले स्वघोषित दलित हैं, जिन्होंने दलित जुमले का इस्तेमाल अपने पत्रकारिता के करियर को चमकाने में किया है। लेकिन श्री चमड़िया पहले शख्स होंगे, जो गैर दलित होते हुए दलित के नाम पर सहानुभूति लेते हैं। मैं पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ इनके तहसील का ही निवासी हूं। इसलिए इनसे जुड़ी हुई सारी जानकारी आप लोगों के सामने रख रहा हूं। इनके दलित होने और दलित प्रेम का खुलासा करना अभी बड़ा मौजूं था क्योंकि मैं भी बेसब्री से इस वक्त का इन्तजार कर रहा था। आशा है आपको यह तहकीकात अच्छी लगेगी।
रमेश पराशर
पत्रकार
rameshp125@rediffmail.comrameshp125@rediffmail.com


bebak:

भारतीय ब्लॉगिंग दुनिया के समस्त ब्लॉगरों से एक स्वतंत्र पत्रकार एवं नियमित ब्लॉग पाठक का विनम्र अपील-
संचार की नई विधा ब्लॉग अपनी बात कहने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है, परन्तु कुछ कुंठित ब्लॉगरों के कारण आज ब्लॉग व्यक्तिगत कुंठा निकालने का माध्यम बन कर रह गया है | अविनाश (मोहल्ला) एवं यशवंत (भड़ास 4 मीडिया) जैसे कुंठित
ब्लॉगर महज सस्ती लोकप्रियता हेतु इसका प्रयोग कर रहे हैं |बिना तथ्य खोजे अपने ब्लॉग या वेबसाइट पर खबरों को छापना उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि बिना गवाही के सजा सुनाना | भाई अविनाश को मैं वर्षों से जानता हूँ - प्रभात खबर के जमाने से | उनकी अब तो आदत बन चुकी है गलत और अधुरी खबरों को अपने ब्लॉग पर पोस्ट करना | और, हो भी क्यूं न, भाई का ब्लॉग जाना भी इसीलिए जाता है|

कल कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात चल रही थी कि अविनाश आलोचना सुनने की ताकत नहीं है, तभी तो अपनी व्यकतिगत कुंठा से प्रभावित खबरों पर आने वाली 'कटु प्रतिक्रिया' को मौडेरेट कर देता है | अविनाश जैसे लोग जिस तरह से ब्लॉग विधा का इस्तेमाल कर रहे हैं, निश्चय ही वह दिन दूर नहीं जब ब्लॉग पर भी 'कंटेंट कोड' लगाने की आवश्यकता पड़े | अतः तमाम वेब पत्रकारों से अपील है कि इस तरह की कुंठित मानसिकता वाले ब्लॉगरों तथा मोडरेटरों का बहिष्कार करें, तभी जाकर आम पाठकों का ब्लॉग या वेबसाइट आधारित खबरों पर विश्वास होगा |
मित्रों एक पुरानी कहावत से हम सभी तो अवगत हैं ही –
'एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है', उसी तरह अविनाश जैसे लोग इस पूरी विधा को गंदा कर रहे हैं |

डा.गोविन्द said...
इस लेख के लेखक जो कथादेश के मीडिया अंक के संपादक हैं इनकी कूपमंडूकता का सही चेहरा किसी से छुपा नहीं है.जिसके बारे में अनंत विजय साहब ने अपने ब्लौग पर लिखा है.जिसका लिंक है-
http://haahaakar.blogspot.com/
साथ में इस महोदय के चरित्र के बारे में कुछ मैं यहां बता दे रहा हूं.कथादेश के मीडिया अंक के अतिथि संपादक महोदय ने इस अंक में रद्दी के तरह के अपने कई लेख तो छापे ही हैं,साथ में अपने साथ शराब पीने वाले उन छात्रों का लेख भी छापा है जिनका ज्ञान दो कौड़ी के लाएक भी नहीं.उनके विश्वविद्यालय के सूत्रों के अनुसार-चूंकि विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या कम थी इसलिए उन्हें किसी तरह एम.ए.की परीक्षा में पास कर दिया गया,वे वैसे छात्रों को लेखक बनाने में जुटे हैं जिनका एम.फिल. में दाखिला भी प्रो.इलिना सेन की कृपा से हुआ.यह इलिना सेन हैं जो शायद उस विश्वविद्यालय को ढोंगी कम्युनिस्टों से भरने का जिम्मा उठाई थीं,जिन्होंने अपने ढोंगी कम्युनिस्ट छात्रों को,जो लिखित में 36 नम्बर पाए थे उन्हें 95 नम्बर देकर दाखिला दिलाया और फिर ढोंगी कम्युनिस्टों के लिय पी-एच.डी. का रास्ता भी खोल दिया. दिल्ली के हमारे मीडिया मित्रों को पता ही है कि अनिल चमड़िया जो खुद ढोंगी हैं,के ये प्रिय छात्र जिन्हें वे लेखक बनाने की कोशिश किए हैं उनका दाखिला पी-एच.डी.में कैसे हुआ ये किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं.इसलिये इन महान लेखकों का पोल खोलने की कोशिश करें,अगर इन महान लेखकों के चरित्र को खंगालने के बाद इनके कचड़े लेखों पर प्रकाश डालना चाहें तो या आपके कोई और पाठक इन दो कौड़ी के लेखकों के बारे में और इस कथादेश के अतिथि संपादक के चरित्र के बारे में जानना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं-
http://voiceofmedia.com/vom_voice
यहां अतिथि संपादक अनिल चमड़िया के प्रिय मगर नालायक और नाकाबिल छात्र,जो इस अंक में लेखक भी हैं(भले ही हाथी,घोड़े पर चार लाईन लिखने की काबिलियत भी ना रखते हों)को उस विश्वविद्यालय में बनाए रखने के लिए जहां वे किसी तरह शिक्षक बन गए हैं,किस तरह का जोड़-तोड़ किया गया और कैसे प्रतिकुलपति ने कुलपति के अनुपस्थित होने का फायदा उठा कर(कुलपति उस समय विदेश यात्रा पर थे) उस जोड़तोड़ की अगुआई की और अनिल चमड़िया के कहे अनुसार उनके प्यारे लेखक-छात्रों को हर हथकंडा अपनाते हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा में उतीर्ण करवाया.जिसे लेकर बेवजह वहां के कुलपति महोदय की भी बदनामी हुई.विश्वविद्यालय सूत्र यह भी बताते हैं कि वैसे इसकी कोशिश पूर्व में हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा,जिसमें चमड़ियाजी खुद विषेशज्ञ के रुप मे बैथे थे में भी चमड़ियाजी ने किया था,जिसका रिजल्ट कुलपति द्वारा कैंसिल कर दिया गया था.पर प्रतिकुलपति ने अपनी करनी से कुलपति के सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया.मेरे ये सब लिखने का आशय इतना है कि अतिथि संपादक अनिल चमड़िया का वास्तविक चरित्र सामने आए और पता चले की कैसे-कैसों को लिखने का मौका अतिथि संपादक महोदय ने दिया है और खुद तथा लेखक-छात्रों से इसे मीडिया के हैण्डबुक के रुप में प्रचारित करवा रहे हैं.इसके सभी वे लेखक जो अतिथि संपादक के छात्र हैं मीडिया का एम तक नहीं जानते.बात इतनी तक रही होती तब भी ठीक था पर विश्ववस्त सूत्रों के अनुसार अपनी खोखली विद्वता दिखाने के लिए उन्होंने विश्वविविद्यालय में अपने पिटठूओं के माध्यम से कथादेश के इस अंक पर चर्चा का आयोजन भी करवाया.....

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written by rinkoo singh, January 30, 2010
anil chamadiya ki kundali ye sabit karne ke liye kafi hai ki dalit shabd ka kitna najayaj istemal kiya ja raha. anil ji se main ek baat puchna chahta hu ki mera ek bahut hi kabil dost hai accountency ki field me lekin wo keval b.com 3rd division hi pass. jis company me kam karta hai waha se hamesh prashasti patra pata rahta hai. wo iss field me 10 salo se hai. kya aap usko desh ke kisi college me commerce deptt. me accounts ka professor banwa sakte hain. nahi. to phir aap ko kyo professor banaya gaya tha.aapke dost kripa ji media teaching ke baare me badaavachan karte hain unko bhi iss per apni baat kahani chahiye.aap professor shayad iss liye banaye gaye ki jin naxlites ko desh ki sarkar atankvadi manti hai unhe aap bbc ka journalist bata kar class me introduce karwate the. khair ye kam to aap ke ghanishth mitra kripa shankar ji karne ke liye hain hai hi. aap ke baare me yahi kaha ja sakta hai ki MAAR PADI SHAMSHIRO KI TO MAHARAJ MAIN NAAI HOON.

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written by kanhaiya kumar, Guwahati, January 30, 2010
anil chamariya ka mahimamandan karne wale mere bhai. lagta hai ki app bhi chijo ko tor maror kar pesh karne mein mahir ho. apni galat bayani ka jariye hazaro student ki kismat se khilwar mat karo mere bhai. varna bhai vijay tumhare nam ki viprit log tumhare karm ke aadhar per parajay kahna shuru kar denge

• pragati said:
लगता है चामड़िया जी शौर्ट टर्म मेमोरी के शिकार हो गए है, प्रोफेशर पद से हटाए जाने के बाद अपनी पहली ही प्रतिक्रिया में लिखते हैं-मेरा दलित और दलितवादी होना भी वीएन राय को बुरा लगा. और इस लेख में लिखते हैं- “न किसी से जाति पूछता हूं, न किसी को जाति बताता हूं”. बताईए अपना ईलाज कराने के लिए कांके(रांची)जाएंगे या आगरा या गजनी के डा. से संपर्क किया जाए?
# 31 January 2010 at 6:49 pm

tota ram said:
are bahi jati kaise batyegel jab jati hi badl liye ho.
# 31 January 2010 at 6:52 pm
• bebak said:
इस लेखक महोदय
अनिल चामड़िया को मैं टीवी.-9 के जमाने से जानता हुँ और किस बड़े चैनल के दिग्गजों की बात आप कर रहे हैं?
टीवी.-9 में काम करने के समय भी उन्हे गंदी राजनीति और स्वहित के लिए दलित तथा दलितमुद्दों का दुरुपयोग करते देखा है.मुझे पुरा यकिन है कि वह लोगों को गुमराह करने के अलावे कुछ कर ही नहीं सकते|जिन शुरुआती दिनों की बात आप कर रहे हैं उन दिनों मैं उनका जुनियर था,बहुत अरमान लेकर मैं वहां ज्वाईन किया था कि चामड़िया जी से कुछ सिखुंगा,पर उनकी गंदी रजनीति से परेशान होकर चैनल मालिक ने चैनल ही बंद कर दिया|
उस सौदेबाजी में भी चामड़ियाजी ने बहुत कमाए पर हम जैसे मिडिया कर्मी जो सपने लेकर वहां गए और उनके बहकाबे में नहीं आए, उनकी आवाज वह कभी नहीं बने.
और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल आप कर रहे हीं उससे स्पष्ट झलक रहा है कि आपको किस तरह की गंदी घुट्टी चामड़िया जी ने पिलाई है. अगर संभव है तो खुद को अभी भी बचा लिजिए.
# 30 January 2010 at 9:22 pm

bebak said:
आप दुसरों की लाईन छोटी कतने की क्यों सोचते हैं चामड़िया जी अपनी लाईन बड़ी कर लिजिए दुसरों की लाईन छोटी करने के चक्कर में तो आपकी लाईन ही मिटती जा रही है|
# 30 January 2010 at 9:29 pm

ritesh said:
चामड़ियाजी आपके अंदर जो कुंठा भरी है वह इतनी स्तरहीन होगी की विश्वविद्यालय छोड़ते ही सजातीय और विजातीय की बात करने लगेंगे ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.वैसे तो दुसरे विभाग के शिक्षक होने के नाते मेरा आपसे मिलना-जुलना कम होता था पर आप इतने छिछले होंगे, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.खाशकर जब TBI के जमाने के आपके कारनामें जो अलग-अलग रुपों में आज तक जारी है, के बारे में पढा तो यही सोचने में आया कि अगर आपका जमीर तनिक भी खुद को शिक्षक मानता है या जब पहली बार ही आप शिक्षक बनना चाहे, उसी समय आपको एक चुल्लू पानी की तलाश करनी चाहिए थी, अब उस एक चुल्लू पानी में आपको क्या करना है यह बताने की जरुरत नहीं है.
# 30 January 2010 at 9:33 pm

vabhav said:
संज्ञान में आया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पिछे उनके पूराने मित्र ‘चौबेजी’ हैं,जो शुरु से ही मौके की तलाश में थे,जैसा कि एक मानव स्वभाव माना जाता है कि अपनों-दोस्तों का आगे निकलना कुछ ज्यादा ही तकलिफदेह होता है,वैसे ही रिडर बने चौबे जी चामड़ियाजी का प्रो. बनना पचा नहीं पा रहे थे तथा मौका मिलते ही उनको विश्वविद्यलय से बाहर का रास्ता दिखलाने की कोशिश में लग गए और सुनने में आया है कि उनकी गिद्ध नजर तो उनकी पोस्ट पर अभी भी लगी है..
# 30 January 2010 at 9:36 pm

एक विश्वविद्यालय कर्मी said:
चुंकि मैं विश्वविद्यालय के लगभग प्रारम्भिक दौर से किसी न किसी रुप में जुड़ी हुई हूं,इसलिए विश्वविद्यालय को किसी ‘बक्से’ में बन्द करने,’वाद’ में संकुचित करने अथवा अनावश्यक विवाद खड़ा कर उसे बदनाम करने की साजिश रचने से बेहद आहत हूं.क्या अनिल चमड़िया इस बात की ओर गौर फरमाने की कोशिश करेंगे कि कक्षा में उनकी विषयगत अज्ञानता किसी भी छात्र से छुपी नहीं है और उनके गिने चुने शब्दों और उदाहरणों (जैसे-साधारण नमक कैसे आयोडिन नमक बना और जब मैं एक टेलीविजन चैनल में था तो मुझे कैसे ग्राहक के बदले कंज्यूमर लिखने के लिए कहा गया)को सुन-सुन कर छात़्रों के कान पक चुके हैं.जिसकी चर्चा करते उनके छात्र परिसर में इधर -उधर कहीं भी मिल जाते हैं.अब विषय की पढाई कर अपनी अज्ञानता कम कर खुद को अपडेट करने का उनके पास बेहतरीन मौका है, बेचारे अनिल चमड़िया मानसिक रुप से बिमार चल रहे हैं.इसलिए पहले अपनी बिमारी का इलाज करा लें जिससे उन्हे अपनी हकिकत का पता चल सके,संभव है उन्हें कभी अपनी गलती महसूस न हो और वह दूसरों पर ही किचड़ उछालते रहें और आप जैसे पत्रकार पत्रकारिता कम और इनकी चाटुकारिता अधिक करते रहें|पर अगर बिमारी ठिक हो जाए और अपनी गलतियों को महसूस कर सकें तो पहले एम.ए. कर लें,कहीं और से क्यों इसी विशवविद्यालय में आकर नमांकन करा लें|फिर प्रो. बनने का सोंचें|
# 30 January 2010 at 9:44 pm

एक विश्वविद्यालय कर्मी said:
शिखा चौधरी उर्फ चौबेजी, क्या करूं औरों को तो नहीं जानता पर ‘मैं’वर्तनी शोधक समिती में तो हूं नहीं. और, शायद आपको पता नहीं online typing की अपनी limitations होती है. सभी को आपकी तरह हिन्दी typing नहीं आती. आपका चरित्र भी कम संदेहास्पद नहीं है. विश्वविद्यालय में तो भिगी बिल्ली बने फिरते हैं पर चुपके से नाम बदल-बदल कर लेख/प्रतिक्रिया लिखने में भी लगे हुए हैं.वैसे चोर-चोर मौसेरे भाई होते ही हैं.लगे रहीए..
# 31 January 2010 at 6:44 pm
Ramesh Parashar said:
mr chamariaji lekh likhane se dunia nahi badalti. acharan se badalti hai .farji tarike se profesor banakar bina class liye 700000 wetan utha rahe the is par kabhi sharm nahi aai. 15 august ko jhandarohan me anupasthit hone ka jo gunah kiya, us par kabhi sochaa tha, aapko to turant usi smay terminet kar dena chahiye tha.aap to sukrira kahiye vc mahoday ka jo itne dino tak aapko maph karte rahe..
# 31 January 2010 at 7:01 pm
आनंद said:
कृपाशंकर चौबे पश्चिम बंगाल से अपनी “रिपोर्टों” में वहां के “दमित-शोषित और पीड़ित” जनता के दुखों को “सामने” लाने का “क्रांतिकारी” काम करते रहे हैं। क्या उन्हें वर्धा विश्वविद्यालय में हो रहा जातिवादी नंगा नाच नहीं दिखाई देता।
आवेश तिवारी के साथ बातचीत में वे कहते हैं कि वे पूरी तरह विभूतिनारायण सिंह के साथ है जिसने आरोप लगाया है कि अनिल चमड़िया छात्रों के साथ बैठ कर दारू पीते हैं। विस्फोट पर छपे अपने वक्तव्य का खंडन नहीं करते और निजी रूप से मोहल्ला को कहते हैं कि वे प
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poora padhe-2 on 08 February, 2010 17:19;01
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विस्फोट पर छपे अपने वक्तव्य का खंडन नहीं करते और निजी रूप से मोहल्ला को कहते हैं कि वे पिछले पच्चीस सालों से अनिल चमड़िया के मित्र रहे हैं और वे जानते हैं कि अनिल चमड़िया शराब नहीं पीते।
अगर उनकी “बंगाल क्रांति” के नीचे जरा भी जमीर रहा हो, तो खुल कर सच के साथ आना चाहिए। पता चला है कि वे अब मोहल्ला को दिए गए बयान से पलट रहे हैं। खैर, पेंडुलमता और पर्दा के पार उनका चरित्र यही रहा है, इसलिए उनसे बहुत उम्मीद नहीं किया जाना चाहिए। वर्धा विश्वविद्यालय के दलित छात्र भी चौबे के सवर्णवादी बर्ताव की शिकायतें करते हैं।
# 3 February 2010 at 2:43 pm
aam admi said:
कृपाशंकर चौबे जी,
आप “क्रांति” करते-करते पलटबयानी की “पोलिटिक्स” भी करने लगे !
कोई बात नहीं. यह दौर ही कुछ ऐसा है कि ” मलाई” पलटबयानी की “पोलिटिक्स” से मिलती है, क्रांति से नहीं.
# 3 February 2010 at 4:34 pm
Sharad said...
चमाडिया जी जिन छात्रों को बेवकूफ़ बनाकर कम निकाल रहे है असल मे वे वैसे है नही. अस्तु अनिल मिस्र जो क्रन्तिकारी होने का दम्भ भरता है उसकि हैसियत प्यादे की है.एम फ़िल के लिखित परीक्षा मे ३६ नं और साकक्षातार मे ९० नं . यह है मानवाधिकार की लडाइ लड्ने वाले विनयक सेन कि पत्नी एलिना सेन का कमाल. यही नही अनुपस्थित क्षात्र को भी अंक दिया एलिना ने .पर क्म्युनिस्त कुल्पति ने दंड नही दिया. आपको बिना अर्हता के प्रोफ़ेसर बना दिया. ज्वाइन करते समय शर्म आइ कि नही. विवि मे क्लास नहि लेते पर दिल्ली मे जरूर क्लास लेने आयेंगे. शाबाश मिट्टी के शेर
अन्नू said...
प्रकाश जी,आपने एक कहावत सुनी होगी सड़े आम की संगत में बाकी आम भी सड़ जाते हैं.पर जब पेड़(अनिल चमड़िया) ही सड़ा हो तो उनसे निकले फल तो निश्चित ही सड़े होंगे.अब सड़े फल से अच्छे स्वाद की उम्मिद रखना तो हमारी बेवकुफी होगी ना....
अब गुरु अनिल चमड़िया जैसे शब्द सिखाएंगे उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल ना उनके प्रिय "यार-मित्र" करेंगे.अब आप सोचेंगे कि मैं "यार-मित्र" का प्रयोग किसलिए किया हूं तो.....
जब मिल बैठेंगे सब यार,हम तुम और बैगपाईपर....
अब आगे लिखने की जरुरत नहीं,आप सभी समझ गए होंगे,जब हम,तुम और बैगपाईपर तब छात्र कहना उचित नहीं,"यार-मित्र" कहना ज्यादा उचित है.अब नादानों को माफ भी कर दिजिए......
गुरुजी के साथ-साथ बेचारे को "यार-मित्र" कहिए या छात्र,यह भी नशे में हैं.
aam aadmi:
bebaak ji aap sahi kah rahe hai. is tarah ki kuntha na likhi jaye to achha hi hai.
par aap bhi bad me usi raste par chale gaye hai.
aap hi gabhir rahate .aap to sabakaa nam le rahe hai aur ek khas jati par aakraman theek nahi. koi ganda kam kar raha hai to karane de.kaun pochhata hai aisee chhijo ko.isase bloginging ka uddeshya poora nahi hoga
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Ramesh Parashar on 08 February, 2010 21:58;56
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अविनाश कुछ तो शर्म करो चमड़िया की अंधभक्ति में अपनी लुटिया क्यों दुबो रहे हो यार..
क्या अपने वेबसाइट के viewership तुम्हे पता है? वही घिसे-पिटे दो-चार frustrate लोग, जो जिन्दगी में आज तक न कुछ किए हैं न कुछ करने की चाह में हैं और सच तो यह है कि उनसे कुछ होने वाला भी नहीं.... उनकी नाकाम जिन्दगी इसकी गवाह है, हकीकत के धरातल पर टाएं-टांए फिस्स.... चाहे वह चमड़िया ही क्यों न हों.
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Ramesh Parashar on 08 February, 2010 22:13;22
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वैसे सुनने में आया है किसी अमृतवर्षा नामक गुमनाम अखबार (जिसमें पता नहीं पैसा भी किसका लगा है, वह भी कोई गोरखधंधा करने वाला तो नहीं जो तुम जैसे ब्लैकमेलर - जैसा कि तुम्हारे वेबसाइट को देखने से लगता है, को संपादक बना दिया) में नौकरी लगने से तुम्हारी बेरोजगारी खत्म हो गई, चलो हो सकता है पैसा आने के साथ-साथ सुबुद्धी भी आ जाए और दिमाग से छद्म मार्क्सवाद/समाजवाद का भूत भी उतर जाए.
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Jeet Bhargava on 09 February, 2010 01:24;52
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भाई पराशर ने अनिल चमडिया का बिलकुल सही पर्दाफ़ाश किया है. मैं खुद मारवाड़ से हूँ और मेरे कई मित्रो के नाम के आगे सरनेम चमडिया लगता है. जो दर असल अग्रवाल समाज में प्रचलित है. यानी अनिल चंदिया कोइ दलित-वलित नहीं बल्कि पक्के मारवाड़ी अग्रवाल बनिए हैं. इनमे पोद्दार, अग्रवाल, गर्ग, गुप्ता, बिडला, सिंघानिया जैसे सरनेम भी प्रचलित हैं.
दुःख इस बात का है कि खुद वनिक होकर अपने 'चमडिया' सरनेम का दुरूपयोग करके और खुद को दलित बताकर यह शख्स जातिवादी राजनीति कर रहा है. और न सिर्फ दलित समाज को बल्कि पूरे देश और मीडिया को धोखा दे रहा है.
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