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फिल्मी समस्या और जुल्मी मीडिया

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12 फरवरी की सुबह सात बजे जब नाशिक से मुंबई के लिए निकल रहे थे तो ड्राइवर ने कहा कि "आज मुंबई में थोड़ा लफड़ा-विफड़ा रइंगा, क्योंकि शाहरुख खान का फिल्म आनेवाला है." शिवेसना से शाहरुख की टसन के बीच नाशिक से मुंबई पहुंचते हुए इतना सोचने में कुछ नाजायज नहीं था.

लेकिन सवा दस बजे तक लेकिन मुंबई दाखिल होने पर कुछ खास फर्क दिखा नहीं. मुंबई में कुछ जगह भीड़ जरूर दिखाई दी और उस भीड़ के कारण सड़कों पर जाम भी लगा हुआ था लेकिन इस भीड़ और जाम के लिए शाहरुख खान दोषी नहीं थे. इसका दोष अगर किसी पर देना है तो मुंबईकर शिवजी पर दे सकते हैं क्योंकि 12 को महाशिवरात्रि थी. मुंबई की सड़कों के किनारे जहां कहीं भी भण्डारे या कोई अन्य आयोजन किये गये थे उसके कारण थोड़ी समस्या हो रही थी. पूरा दिन ऐसे ही चलता रहा. मुंबई की चारों मुख्य सड़कें- इस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे और इन दोनों हाइवे के समानान्तर एक एक लिंक रोड. सभी पर भीड़-भाड़ आम दिनों जैसी ही थी और भागम-भाग तो लोगों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है ही.

पहले मैंने सोचा था कि एक पत्रकार के लिहाज से अच्छा रहेगा कि इस विवादास्पद दिन में मुंबई में रहूंगा तो पाठकों को कुछ खास पेशकश कर सकूंगा. अकेला आदमी कितनी जगह जाएगा. सो जितना देख सका देखा और अगले दिन अखबारों के आने का इंतजार किया. अखबार आये और अपने समय पर ही आये. लेकिन 12 फरवरी को मुंबई के घटनाक्रम को यहां की मीडिया ने जैसा रिपोर्ट किया है वह थोड़ा चौंकानेवाला है. हिन्दी मीडिया की यहां कोई खास वकत नहीं है. मुंबई पर मुख्यरूप से अंग्रेजी मीडिया राज करता है. टाइम्स आफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, डीएऩए, एक्सप्रेस, मुंबई मिरर, मिड डे और कुछ अन्य अखबार मिलजुलकर मुंबई को रिपोर्ट करते हैं. इसके बाद मराठी माणुस के मराठी अखबार. इन दोनों ही तरह के अखबारों ने एक तरह की रिपोर्टिंग की है. उस रिपोर्टिंग का सार तत्व है- शिवसेना हार गयी, शाहरुख खान जीत गये. लोकसत्ता और महाराष्ट्र टाइम्स जैसे मराठी के लगभग सभी अखबारों ने यही लाइन ली है सिवाय मराठी सामना के. मराठी सामना ने माना है कि फिल्म का विरोध सफल रहा है और बाला साहेब ठाकरे ने अपने बहादुर शिवसैनिकों को बधाई भी दी है.

क्या हम कभी शिवसेना और शाहरुख खान को इस बात के लिए दोषी करार दे पायेंगे कि उन्होंने नाहक ही करीब हफ्तेभर तक देश की मीडिया को बेवजह के सवाल पर अटकाये रखा. क्या शाहरुख खान की कोई फिल्म इतना बड़ा मुद्दा हो सकता है कि मीडिया उसे हफ्तेभर तक हेडलाइन बनाकर रखे? शायद यही मनोरंजन का आधुनिक युग है जो एक लाख करोड़ का व्यापार होने की ओर अग्रसर है. ऐसे में मीडिया सिर्फ उस इंडस्ट्री का विदूषक और प्रचारक होकर रह गया है जो उसी बाजार में अपनी सेंधमारी करना चाहता है जहां फिल्में पैसा बटोर रही हैं.

इसी तरह अंग्रेजी के अखबारों ने भी शाहरुख खान को सीधे तौर पर विजेता तो घोषित नहीं किया है लेकिन यह बताया है कि मुंबई में फिल्म का प्रदर्शन हुआ है और सबकुछ ठीक रहा है. अंग्रेजी के अखबार शिवसेना की निंदा तो नहीं कर रहे हैं लेकिन वे शिवसेना को कमतर और हारा हुआ जरूर बता रहे हैं. अंग्रेजी के सिर्फ एक अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने यह लिखा है कि शाहरुख खान ने आखिरकार माफी मांग ली जिसके कारण विवाद समाप्त हो गया है. यह तो पता नहीं लेकिन शाहरुख खान अपनी फिल्म के प्रीमियर के दुबई जा चुके हैं. कल जब मुंबई के चार चुने हुए सिनेमाघरों में सांकेतिक रूप से फिल्म का प्रदर्शन किया गया तो फिल्म देखनेवालों से ज्यादा खादी वर्दी और सादी वर्दी में पुलिस वाले तैनात किये गये थे. कांग्रेस के मुख्यमंत्री चाहते थे कि किसी तरह से 12 को फिल्म रिलीज हो जाए उसके बाद फिल्म जाने और शिवसैनिक जानें. फिल्म रिलीज हुई और खुद गृहमंत्री आर आर पाटिल ने जाकर फिल्म देखी. संदेश साफ था- सब ठीक है. मुंबई में फिल्म और फिल्मी लोग दोनों ही सुरक्षित हैं.

मुंबई के सारे अखबार चीख-चीख कर कह रहे हैं कि शिवसेना बुरी तरह से परास्त हो गयी है. अगर ऐसा है तो निश्चित रूप से इसका स्वागत किया जाना चाहिए कि शिवेसना की बंटवारे वाली राजनीति को मुंबई की जनता ने नकार दिया है. लेकिन सच शायद यह नहीं है. असल में एक लिहाज से देखें तो शिवसेना अपने मकसद में सफल रही है. वे मुंबई सहित पूरे देश में दोबारा चर्चा में लौट आये हैं. इधर डेढ़ हजार के करीब शिवसैनिकों को गिरफ्तार भी किया गया है जिसका मतलब है कि मुंबई के स्तर पर शिवसेना का कॉडर दोबारा सक्रिय हो गया है. इसका भी फायदा उन्हें आगे आनेवाले दिनों में मिलेगा. इधर मुंबई में मीडिया और प्रशासन के अलावा किसी और ने इस विवाद को कोई खास भाव नहीं दिया है. आम आदमी के बीच में न तो फिल्म की कोई चर्चा है और न ही बाल ठाकरे की. मीडिया प्रायोजित शाहरूख खान की फिल्म का विवाद का जमीन पर कोई खास असर नहीं है. आम मुंबईवासी अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त है क्योंकि जो मुंबई को जानते हैं वे जानते हैं कि न तो मुंबई पूरी तरह से फिल्मी है और न ही शिवसेना अब वैसी जुल्मी शिवसेना है जैसी उत्तर भारतीयों के खिलाफ होती रही है. सिर्फ एक ड्रामेबाजी थी. मीडिया कवरेज लेने की होड़ मची हुई थी जिसमें फिलहाल बाल ठाकरे, शिवसेना, अशोक चह्वाण, शाहरुख खान, फिल्म की वितरक कंपनी सब फायदे में रहे हैं. अब आप सोचिए कि करीब हफ्तेभर चले नाटक में घाटे में कौन रहा है?

बिना शक घाटे में वही आम आदमी है जिसके लिए रोटी दाल सबसे बड़ा मनोरंजन होकर रह गया है. हमारे अखबार और टीवी चैनल अगर इसी सक्रियता के साथ मंहगाई को मुद्दा बनाते और इसे आम आदमी के स्वाभिमान से जोड़ देते हो सकता है कि कोई सकारात्मक परिणाम निकल आता. लेकिन आप अपनी मीडिया के काम काज पर अगर नजर रखेंगे तो पायेंगे कि आपके लिए कोई गैर जरूरी मुद्दा ही उसके लिए सबसे जरूरी मुद्दा होता है. शाहरुख खान, उनकी फिल्म, उनका स्वाभिमान और बाल ठाकरे की धमकी न तो वास्तविक समस्या है और न ही किसी प्रकार का स्वाभिमान. वितरक कंपनी फाक्स स्टार स्टूडियो को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो इसलिए उसने फिल्म को मुंबई में रिलीज करने की बजाय उसका प्रीमियर दुबई में किया. इधर जितना अधिक विवाद बढ़ा उधर उस फिल्म की कमाई की संभावना और अधिक बढ़ती चली जा रही है. फिल्म के दुनिया भर में 2000 प्रिंट रिलीज किये गये हैं जिसमें करीब सात सौ दुनिया के दूसरे देशों में भेजे गये हैं. अगर वहां यह संदेश जाता है कि मुसलमानों की स्थिति भारत में बेहतर नहीं है तो इसका सीधा फायदा फिल्म के व्यवसाय को मिलेगा. इसलिए फिल्म को भारत के अलावा खाड़ी देशों में बड़ी प्रमुखता से भेजा गया है. फिल्म की कुल लागत 45 करोड़ है और उसे फाक्स स्टार स्टूडियो को 85 करोड़ रुपये में बेचा गया है. फाक्स स्टार स्टूडियो की कमाई कितनी होगी, इसका अंदाज अभी तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन शाहरुख खान की नीयत साफ है. वे अमेरिका गये थे तो उन्हें अपमानित किया गया था. उन्होंने कहा था- "मेरे साथ ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मेरे नाम में खान शब्द जुड़ा है." इस पर अमर सिंह ने कहा था कि शाहरुख खान का कोई अपमान नहीं हुआ है बल्कि वे अपनी फिल्म का प्रचार कर रहे हैं. अब अमर सिंह की बात सही नजर आती है. शाहरुख खान का ताजा स्वाभिमान और पाकिस्तान के प्रति लगाव इसी समझदारी का हिस्सा है. निश्चित रूप से वे एक चतुर व्यावसायिक हैं. हमें उनकी इस व्यवसाय बुद्धि का स्वागत करना चाहिए.

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Vicky G on 13 February, 2010 14:51;23
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सही लिखा संजय जी. लेकिन सबसे ज़्यादा फ़ायदे में रहे शाहरुख खान, जैसा कि श्री जयप्रकाश चौकसे ने अपने कालम मे लिखा था कि "अब यह फ़िल्म सिर्फ़ विरोध के चश्मे से देखी जाएगी" (यानी फ़िल्म की गुणवत्ता पर कोई बात नहीं होगी). और शाहरुख के मूढमति भक्तों को श्री चौकसे का आज (१३ फ़रवरी)का कालम भी पढना चहिए, जिसमें उन्होंने साफ़ लिखा है कि मध्यांतर के बाद फ़िल्म "अविश्वसनीय और अस्वाभाविक" हो जाती है (शाहरुख "खान" को महान बनाने के चक्कर में). हालांकि उन्होने कई पक्षों की सराहना भी की है. मेरे कहने का मतलब यह कि मूर्ख लोग मीडिया के बहकावे में आकर इसलिए फ़िल्म देखने जाएंगे ताकि "शिवसेना के गुंडों" को धूल चटा देने वाले "विजेता" की तरह महसूस कर सकें. और यह भी देखे कि मीडिया ने कितनी सफ़ाई से इस मुद्दे को शिवसेना के क्षेत्रवाद से जोड दिया, जबकि यह तो शाहरुख द्वारा हमारे घोषित दुश्मन पाकिस्तान का खुलेआम समर्थन करने का मामला है. ध्यान रहे, यह हिंदू-मुसलमान का मामला नहीं है.
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संजय तिवारी on 13 February, 2010 15:02;38
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कल ही टाइम्स आफ इंडिया ने भी फिल्म की समीक्षा लिखी है. उसके हिसाब से तो फिल्म पांच में पांच स्टार पाने की हकदार है. टाईम्स ने इस फिल्म को महान फिल्मों की श्रेणी में रख दिया है.
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KS on 13 February, 2010 15:03;33
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MANAVTA KE LIYE YAH FILM HAR BHARTIY KO DEKHNA HEE CHAHIYE. JISSE DESHI TALIBAANI TAAKTO KO SAHI SANDESH MIL JAYE KI YAH INDIA HAI. DERE SABER PUBLIC KEE SAMAJH ME AATA HAI TO JUTE BHI UTNE HEE PADTE HAIN.
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Vivek G on 13 February, 2010 16:13;35
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संजय जी, मेरा ख्याल है कि टाइम्स तो इस सीधे टकराव के माहौल में अपने फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में नाचने वाले परमानेंट नचनिया शाहरुख "खान" और उनकी फ़िल्म को महान बताएगा ही. इसमें न कोई शक है, न कोई हैरानी. वैसे अगर हिंदी सिनेमा के हिंदुस्तानी समीक्षकों की बात करें तो श्री जयप्रकाश चौकसे ने एक और बात लिखी है कि "फ़िल्म में शाहरुख खान को छोडकर बाकी सभी कलाकारों ने स्वाभाविक अभिनय किया है" (यानी शाहरुख ओवर एक्टिंग के शिकार हो गए हैं). इस पूरे मामले में हम गायक अभिजीत का समर्थन करते हैं, जो कलाकारों के भेष में आने वाले आतंकवादी देश पाकिस्तान के लोगों का खुलकर विरोध करते रहे हैं. हमें असली बंगाली (और असली भारतीय) अभिजीत पर गर्व है.
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Ashish on 13 February, 2010 16:45;20
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असल में भारत व्यक्ति पूजा से ग्रस्ति समाज है. हर बाबा,खिलाडी, नेता, अभिनेता को भगवान मानने लगते हैं सीधे साधे लोग .अपनी तर्कशक्ति का बहुत कम इस्तमाल करने लगे है.
और पत्रकारिता में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो निष्पक्ष होकर अपनी बात कहें इनको अपने आप को libreal और secular साबित करने में बड़ा मजा आता है चाहे गलत बात ही क्यूँ न हो.
प्रभाष जोशी मेरे पसंदीदा पत्रकार थे और हैं लेकिन मैंने कभी उनकी बात को बिना अपनी तर्कशक्ति पर आजमाए नहीं माना.
शाहरुख खान ने इसको केवल एक publicty stunt के तरह इस्तमाल किया और लोग ने पता nahi क्या -क्या इसमें जोड़ दिया राष्ट्रवाद , मानवतावाद , खेलभावना , हिन्दू -मुस्लिम एकता और गुंडई के खिलाफ आवाज़ .
शाहरुख़ खान कोई P.C. चिदम्बरम नहीं हैं जो कहते हैं की पाकिस्तानी खिलाडियों को लेना चाहिए था वो खुद एक IPL टीम के मालिक हैं चाहते तो 1 क्या 10 खिलाडियों को खरीद लेते लेकिन तब उनको और बाकि टीम मालिकों को लगा की यह नुकसानदेह हो सकता है.फिर जब इसकी निंदा हुई तो कहा की हाँ पाक खिलाडयों को लीना चाहिए ,किसने रोका है खरदी लो अगर कोई बिकता है.
और इस जनता का कुछ नहीं हो सकता जब तक न सोचेंगे और कुछ जो सोचने वाले है वो इनको भरमाते रहेंगे.
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Jeet Bhargava on 13 February, 2010 18:50;23
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आपने सटीक और निष्पक्षता के साथ अपनी बात रखी है. जब सेकुलर निजाम ने अपने सारे सिपाही शाहरुख के पोस्टरों की रखवाली में तैनात किए हो, जब मीडिया वास्तविक मुद्दे ताक में रखकर शाहरुख के महिमा मंडन में लग जाए तो शाहरुख क्या किसी की भी फिल्म की औकात बढ़ जायेगी. मुम्बई में शिवरात्री पर हाल ये था की बाबुलनाथ और पवई शिवालयो समेत प्रमुख मंदिरों में (जहां लाखो भक्त दर्शन हेतु आते हैं) पर्याप्त सुरक्षा इन्तेजाम नहीं था, क्योकि अधिकाँश पुलिस बल उस शाहरुख खान की फिल्म रिलीज करने के लिए तैनात था, जो खुद को इस्लामिक आइकन मानता है और दुबई में जा बैठा है. जो २६/११ मुम्बई समेत हिन्दुस्तान में हुए तमाम आंतकी हमलो के केंद्र पाकिस्तान की पैरवी करता है. अब कोंग्रेसी नेता शाहरुख खान के टिकट थोक के भाव खरीदकर लोगो को मुफ्त बाँट रहे है. इसका भी उनको फायदा मिलने ही वाला है. क्योंकि इसा फिल्म में भी उसी 'अल्पसंख्यकवाद' को स्थापित और महिमा मंडित करने का प्रयास किया गया है, जो कोंग्रेस के लिए वोट बैंक की जमीन तैयार करता है. इसा सारे घटनाक्रम से कई सवाल उपजे हैं. क्या भारत की जनता के पैसो से हित -सुपरहिट होने वाले कलाकार की अपनी पाकिस्तानी भाइयो की पैरवी सही है? क्या मीडिया फिल्म या व्यक्ति विशेष के लिए ही भोंपू बनाकर महंगाई, आतंरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को दबा दे यही पत्रकारिता है. देखना ये है कि पाकिस्तान-परस्त शाहरुख खान को हिन्दुस्तान-परस्त शिवसेना के सामने भारी दिखाने का यह खेल कितने दिन टिकता है? खैर इस सारे प्रकरण में मीडिया और शाहरुख खान ने अपनी जात दिखा दी है, जिसका असर उनकी आगामी फिल्मो पर भी पड़ा सकता है.
एक और बात अगर मीडिया इतनी मेहनत महंगाई कम करने के लिए सरकार पर दबाव डालने में करती तो एक शाहरुख खान क्या सारे हिन्दुस्तान की प्रजा को राहत मिलती.
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AMAN on 14 February, 2010 00:32;46
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MR KS, Kaun ho tum Dohre Charitra Wale INSAN,
Marathi film JHENDA Ka jab virodh hua to kis bil me chhupe the,
tab to Jhenda Ko bhi har bhartiyon ko dekhna chahiye
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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