एक दिन सामना से सामना
सामना का संपादकीय लिखा जा चुका है. मराठी में लिखा गया बाल ठाकरे का संपादकीय हिन्दी में अनुवादित किया गया है जिसमें कहा गया है कि पुणे विस्फोट के बाद अब कांग्रेसियों को सुन्नत करा लेनी चाहिए और पाकिस्तान जाकर बस जाना चाहिए. बाल ठाकरे का यह संपादकीय हो सकता है कल फिर मीडिया में चर्चा का विषय बने कि उन्होंने कांग्रेसियों को सुन्नत कराने और पाकिस्तान बसने की सलाह दी है. लेकिन खान विवाद और पुणे विस्फोट के बीच बाल ठाकरे का यह रुख उनकी विचारधारा के अनुसार ही है.
इधर संपादकीय विभाग के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम पूरा हुआ तो काम करनेवाले लोग स्थानीय खबरों और अन्य पृष्ठों को बनाने संवारने में जुट गये. आज रविवार है इसलिए लोगों की संख्या कम है. फिर भी पूरे सामना कार्यालय में आम दिनों जैसी चहल पहल है. सामना मराठी और हिन्दी दोनों के संपादक यहीं बैठते हैं. प्रभादेवी के इस इलाके में कभी सिर्फ चाल और खपरैल के मकान ही हुआ करते थे. आज भी अधिकांश मकान और दुकाने उसी तरह से हैं. सामना दफ्तर के सामने वाकड़ चाल आज भी भरी पुरी अवस्था में है जिसमें डेरी और अन्य कई दुकानों के मालिक उत्तर भारतीय हैं. फिर भी अब यह इलाका ही मंहगा हो चला है इसलिए प्रभादेवी से सामना कार्यालय के लिए मुड़ते ही आपको सामने ऊंची अट्टालिकाएं बनती दिखाई देंगी. सामना का कार्यालय जिस सद्गुरू दर्शन नामक बिल्डिंग में है वह खुद भी पांच मंजिला है जिसमें दो मंजिलों पर सिर्फ सामना के कार्यालय हैं. इनमें संपादकीय विभाग के अलावा विपणन और विज्ञापन विभाग के लोग भी शामिल हैं. जैसे ही सामना कार्यालय के लिए अंदर आते हैं सामने दो गार्ड बैठे हैं जो इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि वे किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं बल्कि किसी मीडिया हाउस के दरवाजे पर बैठे हैं. वे आपसे ज्यादा पूछताछ नहीं करते. ऊपर आकर बायीं ओर संपादकीय विभाग और दाहिनी ओर एक कांफ्रेस टेबल रखी हुई है. यह कांफ्रेस टेबल अंशकालिक संवाददातओं से मिलने से लेकर व्यापारिक गतिविधियों की योजना बनाने तक सबके लिए इस्तेमाल होती है. गैलरी के आखिर में बाला साहेब ठाकरे की हाथ जोड़े एक फोटो लगी है जो हर आने जानेवाले व्यक्ति का अभिवादन करती नजर आती है. उसी फोटो के पास कार्यकारी संपादक का कमरा है.
जिस दिन मैं सामना के कार्यालय में दाखिल हुआ उस दिन सामना के लिखे एक संपादकीय को आधार बनाकर अखबारों ने काफी हल्ला मचाया था. सामना के संपादकीय आमतौर पर मीडिया के बाल ठाकरे का बयान ही होते हैं क्योंकि जब बाल ठाकरे खूब भाषण देते थे तब भी अपनी असली बात लिखकर ही कहते थे. एक लिहाज से देखा जाए तो बाल ठाकरे ने राजनीति में पत्रकारिता को अपने ही अंदाज में बचाये रखा है अन्यथा किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपना मुखपत्र निकालने के बारे में सोचना या तो चाटुकारों का प्रपोजल होता है या फिर डरपोकों का प्रस्ताव. राजनीतिक दलों में सिर्फ शिवसेना ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो अपने कार्यकर्ताओं के लिए हिन्दी और मराठी में दैनिक अखबारों का प्रकाशन करती है. संभवत: बाल ठाकरे का अपने कार्यकर्ताओं से नित्य संवाद करने का अपना तरीका है क्योंकि वे मानते हैं कि वे अखबार आम आदमी के लिए नहीं बल्कि अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए निकालते हैं. अगर यह गांधी के बाद अपनी तरह का अकेला प्रयोग है तो इसके विषय वस्तु की भले ही निंदा कर लें लेकिन इस प्रयोग की निंदा करने से पहले थोड़ा सोचना जायज होगा. अगर हर राजनीतिक दल आज यह तय कर ले कि वह अपनी विचारधारा का घोषित तौर पर मुखपत्र प्रकाशित करेगा तो संभवत: राजनीतिक मैनेजरों को मीडिया पर पानी की तरह पैसा नहीं बहाना पड़ेगा. लेकिन राजनीतिक दलों के मैनेजर अंदर से न तो पार्टी के बारे में और न ही उसकी विचारधारा के बारे में इतने मजबूत हैं कि इस बारे में कोई विचार कर सकें. लेकिन बाल ठाकरे ने अपनी पत्रकारिता को अपनी बात अपने समर्थकों तक पहुंचाने के लिए बहुत सटीक तरीके से इस्तेमाल किया है. पिछले कई महीनों से उन्होंने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है. उन्हें जो कुछ कहना होता है वे लिखकर कहते हैं. शुरुआती दिनों में बाल ठाकरे का संपादकीय उनके कार्यकर्ताओं के लिए नियमित संदेश भले ही होता लेकिन अब ऐसा लगता नहीं है. अब बाल ठाकरे का संपादकीय मीडिया के लिए खबर होता है. फिर भी यह क्रम अनवरत जारी रहता है.
मैं एक उत्तर भारतीय हूं. शिवसेना की भाषा में कहें तो भैया. मैं उनके दफ्तर में जाता हूं. हिन्दी में ही बात करता हूं लेकिन यहां का सारा स्टाफ मेरे साथ हिन्दी में सहज नजर आता है. ऐसे वक्त में जब शाहरुख खान विवाद के कारण शिवसेना राष्ट्रीय मीडिया की चर्चा के केन्द्र में खड़ा हो मैं सामना के कार्यालय में पांच-छह घण्टे बैठा रहता हूं लेकिन मुझे वह विद्वेष कहीं दिखाई नहीं देता जिसकी चर्चा हमारा मीडिया हमें बता रहा है. क्या मेरी मति मारी गयी है या फिर सचमुच हालात वैसे नहीं है जैसे मीडिया हमारे सामने रख रहा है?
संपादकीय लेखन पूरा हुआ तो लोग तितर-बितर हो गये. मैंने एक कर्मचारी से आग्रह किया कि मुझे पिछले महीने की फाइल दे सकते हैं? उसने सामना की फाइल लाकर दे दी. हिन्दी का सामना 16 पृष्ठों का टेबलाइड साइज का अखबार है. पहला पूरे महीने पहला पन्ना उसी तरह के खबरों को समर्पित है जो मुंबई की मांग हो सकती है. लेकिन जब-तब बाल ठाकरे का विशेष संपादकीय भी दिखता है. वैसे नियमित संपादकीय तो अंदर के पृष्ठ पर जाता ही है. सामना के एक महीने की फाइल जब मैंने सरसरी तौर पर देखी तो स्पष्ट तौर पर दो बातें समझ में आयी. हो सकता है वह बाल ठाकरे की पार्टी का मुखपत्र हो लेकिन उसने बाजार और टैबलाइड अखबारों की मांग का भी ध्यान रखा है. सोलहवें पन्ने पर सोलहों दिन किसी न किसी मादक अदाकारा की अधनंगी फोटो प्रकाशित होती है. उन फोटोग्राफ्स के साथ अंगूठा चूसने और राज की बात फाश हो जाने जैसी फिल्मी गाशिप भी मौजूद होते हैं. अंदर के पन्नों पर खबरें मुंबई के हिन्दी पाठकों के अनुसार ही हैं. कहीं नल टूटा है तो कहीं सड़क खराब हो गयी है. किसी की चैन छिन गयी है तो कहीं किसी कार्यक्रम में किसी उत्तर भारतीय का स्वागत हो गया है. राष्ट्रीय स्तर की कुछ खबरों को भी जगह दी जाती है लेकिन वह जगह सिर्फ जगह देने के लिए ही दी जाती है. संभवत: सामना का संपादकीय विभाग इस बात को जानता है कि उन्हें क्या पढ़वाना है और उनका पाठक क्या पढ़ना चाहता है. फिर भी आज मुंबई के हिन्दी अखबारों के टैबलाइड बाजार में हिन्दी सामना सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है.
यहां आकर एक बात का अहसास जरूर होता है कि हमें कल्पनालोक में जीवित रहने में आनंद आता है. सामना का दफ्तर भी आम अखबारी दफ्तर जैसा ही है सिर्फ एक विशिष्टताबोध के अलावा कि यह शिवसेना का मुखपत्र है. रोजमर्रा की जिंदगी से दो चार होते इस अखबार के पत्रकार भी खबरों की उसी समझ के साथ काम करते हैं जैसे कोई सामान्य पत्रकार करता है. लेकिन आमतौर पर जब हम सामना का नाम लेते हैं तो एक हौव्वा के रूप में उसे परिभाषित करते हैं. संभवत: मीडिया को सामना और शिवसेना का यही स्वरूप चाहिए इसलिए वे उसे उसी रूप में सामने रखते हैं. सामना कार्यालय में बैठे हुए मेरे मन में बार बार यही बात आ रही है कि अन्य राजनीतिक दल अखबार न सही कम से कम मासिक पत्रिका तो प्रकाशित करते ही हैं. फिर सामना में ऐसा क्या है कि उसके संपादकीय लगातार खबरों में बने रहते हैं और पत्रिकाओं के जरिए अपना वैचारिक फैलाव करनेवाले कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों की भी कभी कोई चर्चा नहीं होती?
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जय विदर्भ, जय महाराष्ट्र, जय बिहार
aakhir me aapne jo sawal puchha hai
vah ek Yaksha prashn ki tarah khadaa hi rahega, anuttarit
Aapne to Aankho dekhi likh daali. Bahut khoob bhai....
हाँ सामना सेना का मुखपत्र है ,और सभी दलों की तरह यह सेना का हक़ है.बहुत सरे मुद्दों पर उस से असहमत हूँ पर हिन्दी सामना हिन्दी भाषियों को भी तवज्जो देता है और छापता भी है.एक अख़बार की ही तरह .
और कमाल है संजय जी . प्रेम जी ने तो लिख ही दिया .....वहीं से सामना का सामना :) .
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