हारे हुए बहादुरशाह की प्रेस कांफ्रेस
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चेहरे पर न तो उत्साह था, न ही ताजगी। वे थके हारे लग रहे थे। सोमवार की प्रेस कांफ्रेंस भी रूटीन की प्रेस कांफ्रेंस थी। कारपोरेट मीडिया को कारपोरेट प्रधानमंत्री जवाब दे रहे थे। प्रधानमंत्री को देश में सबकुछ ठीक नजर आ रहा है। उनसे सवाल पूछने वाले मीडिया को भी देश में सबकुछ ठीक नजर आ रहा है।
यूपीए-2 के एक साल पूरा हो गया, प्रधानमंत्री ने कहा कि अभी और टास्क पूरा करने है। टास्क पूरा करने तक अपने कुर्सी पर वे बैठेंगे। राहुल गांधी के लिए दरवाजा खुला है, वे चाहे तो मंत्रिमंडल में आ सकते है। लेकिन राहुल गांधी फिलहाल संगठन को मजबूत करने के लिए पूरे देश के दौरे पर है। उतर प्रदेश को फतह करने के बाद वे दिल्ली की तरफ देखेंगे। फिलहाल दिल्ली का जिम्मा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास है। यही कुछ लब्बोलबाव प्रधानमंत्री के सोमवार के प्रेस कांफ्रेंस में था।
प्रधानमंत्री ने किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दिया। घोटाले पर घोटाला, और हिंसा पर हिंसा पर प्रधानमंत्री गोलमोल जवाब देते रहे। यही हाल कुछ मीडिया का था। मीडिया बिरादरी के लोग प्रधानमंत्री को परेशान नहीं करना चाहते थे। वे उन्हें पूरी मदद कर रहे थे। कोई भी इस तरह का सवाल नहीं पूछा गया। गरीबी क्यों बढ़ी, हिंसा क्यों बढ़ी, भ्रष्टाचार क्यों बढ़ा, इन पर नुकीले और कटीले सवाल प्रधानमंत्री से नही पूछे गए। रूटीन के सवाल थे और प्रधानमंत्री की तरफ से रूटीन का जवाब था। हां यह जरूर कहा कि सोनिया से उनके मतभेद नहीं है। यह तो मनगढ़ंत खबर है। न तो ए राजा पर संतोषजनक जवाब था न आईपीएल घोटाले पर संतोषजनक जवाब। आईपीईएल घोटाले पर सीधे जवाब के बजाए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी पर सारी जिम्मेवारी डाल दी जबकि ए राजा के घोटाले की जिम्मेवारी पूर्ववर्ती एनडीए सरकार पर डाल दी।हमारे देश का दुर्भाग्य देखे। एक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। अपनी लोकसभा सीट भी नहीं। पहले प्रधानमंत्री है जो कभी आसाम में रहे नहीं। पर आसाम से अपना निवास दिखा कर राज्यसभा में आ गए। हालांकि खुद उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि प्रधानमंत्री बनेंगे। पर किस्मत ने बना दिया। सल्तन्नत और मुगलकाल के कमजोर शासकों की याद आती है, जो किसी के दया या रहम से गद्दी सम्हालते थे और पूरे साम्राज्य में जागीरदार और जमींदार लूट खसोट मचाते थे। हमारे प्रधानमंत्री भी कुछ यही है। कुछ लोगों की दया से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। इसलिए इनके पास खोने के लिए क्या है। या तो दया सोनिया गांधी की है या अमेरिकी प्रशासन का। फिर ये दो ताकतवर धूरी साथ हो तो कुर्सी से कौन हटा सकता है। हां दोनों धुरियों के बीच अगर विवाद हो जाए तो बीच में पीस जाएंगे। विवाद कभी भी हो सकता है।
हमारे प्रधानमंत्री मुगलकाल के कमजोर शासकों की तरह है जिनकी बात उनके दरबारी ही नहीं मानते। प्रधानमंत्री मुगलकाल के कमजोर शासक बहादुर शाह जफर की भूमिका में है जो बाहर से अमेरिकी दबाव में और अंदर से अपने दरबारियों के दबाव में है। प्रधानमंत्री की कैबिनेट में ही कुछ मंत्री ऐसे है जो प्रधानमंत्री की परवाह नहीं करते। शरद पवार, डीएमके के मंत्री और ममता बनर्जी। वे प्रधानमंत्री को कुछ नहीं समझते। शरद पवार ने अभी तक अपनी मर्जी ही चलायी है। आईपीएल घोटाले में उनका नाम आया। वे महंगाई के लिए भी जिम्मेदार थे। लेकिन प्रधानमंत्री उन पर लगाम नहीं लगा सके। यही कुछ हाल ममता की है। वे प्रधानमंत्री की परवाह नहीं करती। प्रधानमंत्री की परवाह तो छोड़ वे सोनिया गांधी की परवाह नहीं करती। पर प्रधानमंत्री बेबस होकर देखते है। डीएमके के मंत्री तो सरेआम वो कर रहे है जो चाहते है। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले को दोषी ए राजा को वे हटा तक नहीं सके। करूणानिधि की घुड़की पर ही सारे डर गए। देश के कई बड़े पत्रकार सोमवार के प्रेस कांफ्रेंस में थे। उसमें कई सीनियर पत्रकार भी थे। वही बता सकते है कि क्या इस तरह की प्रेस कांफ्रेंस इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और लाल बहादुर शास्त्री करते थे। क्या वे प्रेस कांफ्रेंस करते हुए इतने ही थकान से भरे, बीमार से लगते रहे।
राहुल के लिए प्रधानमंत्री ने कहा कि दरवाजे खुले है। यह एक अजीब सा ब्यान है। दरवाजा तो राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए खोला है। प्रधानमंत्री उनकी मर्सी पर है। जब चाहे तो मनमोहन सिंह को उनकी औकात बताया जा सकता है। फिर प्रधानमंत्री का यह कहना है कि राहुल गांधी मंत्रिमंडल में आ सकते है। क्या प्रधानमंत्री इस बात से अनभिज्ञ है कि नेहरू गांधी परिवार की परंपरा मंत्री बनने की काफी कम रही है। एक बार सिर्फ इंदिरा गांधी मंत्री बनी थी। नहीं तो सीधे प्रधानमंत्री पद पर काबिज होना उनकी परंपरा रही है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी विफलता को जानते है। यूपीए-1 और 2 के कार्यकाल में जो कुछ सरकार के हाथ लगा है सबको पता है। सिर्फ पता कारपोरेट मीडिया और कारपोरेट प्रधानमंत्री को नहीं है। पूरा मध्य भारत नक्सली हिंसा के चपेट में आ गया है। यह मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सारा कुछ हुआ। नक्सलियों के 180 जिलों में कार्यविस्तार मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ। इसके लिए अकेले जिम्मेवार सिर्फ नक्सली नहीं है, मनमोहन सिंह की कारपोरेट नीति भी है। देश के खाद्यानों की लूट प्रधानमंत्री करवा रहे है। देश के संसाधन इस्ट इंडिया कंपनी के तर्ज पर देश से बाहर की कंपनियां लूट रही है। उसमें हमारे मीर कासिम और मीर जाफर शामिल है।
प्रधानमंत्री जानते है कि देश में गरीबी बढ़ी है। उनके कार्यकाल में भूख से होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ी है। उनके कार्यकाल में पचास करोड़ जनता गरीबी रेखा के नीचे चली गई है। यह भी प्रधानमंत्री के अपने सलाहकार और उनके कागज बोलते है। देश का एक दुर्भाग्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है तो उससे बड़ा दुर्भाग्य विपक्षी दल भाजपा है। मनमोहन सिंह और यूपीए-2 इसलिए दुबारा आए कि उनके सामने उनसे भी गई गुजरी भाजपा जनता के सामने विकल्प के रुप में आयी थी। आखिर जनता उस भाजपा को कैसे चुन लेती जिसका मोह झारखंड जैसे छोटे राज्य से खत्म नहीं होता। जिसके एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह संसाधन लूट में भागीदार बनने के लिए शीबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हो गए। जबकि नीतिगत रुप से भाजपा और जेएमएम में कहीं कोई मेल नहीं है। और तो और जब शीबू सोरेन ने धक्का दिया तो फिर उनकी लात खाकर भी मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हो गए। आखिर देश की जनता उस भाजपा को कैसे मौका देती जिसका नया राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ अपने बिजनेस इंटरेस्ट में पार्टी का महत्वपूर्ण काम को छोड़ विदेश दौरे पर चले जाते है। आखिर ये लोग सता में बैठेंगे तो क्या करेंगे, यह सबको पता है। मनमोहन सिंह जैसे कमजोर प्रधानमंत्री के लिए सिर्फ सोनिया, अमेरिका जिम्मेवार नहीं है। बल्कि विपक्षी दल भाजपा भी जिम्मेदार है जिसके बारे में जनता की राय है कि यह मनमोहन सिंह से भी कमजोर होंगे।
कमजोर प्रधानमंत्री का नेतृत्व देखे। पूरा उतर-पूर्व अलगाववादियों के चपेट में है। मध्यभारत में नक्सलियों ने पैर जमा लिए है। नक्सली उतर भारत की ओर बढ़ने की चेष्टा कर रहे है। लोगों को खाना मयस्सर नहीं है। लोग रोटी के लिए मोहताज है। क्योंकि बीस रुपये किलो आटा खरीदने की क्षमता पचास करोड़ जनता के पास नहीं है। सब्जी मिलती नहीं है, दालें भी महंगी हो गई है। बीस रुपये वाली दाल अस्सी रुपये किलो पहुंच गई है। यानि की रोटी अब नमक के साथ खाइए। फिर प्रधानमंत्री अब कौन सा बचा टास्क पूरा करने वाले है। शायद बचा हुआ टास्क और भयावह होगा। बचे हुए टास्क में पूरी जनसंख्या को गरीबी रेखा के नीचे ले जाना शामिल है। प्रधानमंत्री के बचे हुए टास्क में पूरे देश को नक्सलियों और कारपोरेट के संग्राम स्थल के रुप में बदलना भी शामिल है। अगले दो-तीन सालों में शायद उनका यह ख्वाब पूरा हो जाए।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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मनमोहनजी भी वही सोच सोच के परेशान थे और सायद सदमे में भी की कब राहुल आयेगा और बहार का रस्ता दिखा देगा.
क्योंकि कांग्रेसीयों की गुलाम मानसिकता है वे गाँधी परिवार को ही देश का सर्वेसर्वा मान बैठे है.
क्या केवल नेहरु ने ही आज़ादी पाने की कोसिस की थी, नहीं, वो तो विलासिता के जीवन जीने में यकीं करते थे, गरीब भारत के उस नेता के कपडे तक बहार धुलाई के लिए जाते थे,
और कांग्रेसी समझतें है की वो शायद भारत के धोबियों को कष्ट नहीं देना चाहते थे.
मेनका गाँधी भी तो उस गाँधी परिवार की ही बहु है, तो राहुल जब बत्त्चा था तो किसी कांग्रेसी ने मेनका को क्यों प्रधानमंत्री बनाने की जुगत नहीं लगाई?
जब ये कांग्रेसी महात्मा गाँधी के ही नहीं हुए तो देश के क्या होंगे? जिस गाँधी ने अंग्रेजों से लड़ने के लिए कांग्रेस बनाई थी, उसी गाँधी ने अपनी दूरदृष्टि से भांप कर कहा था की जब देश आजाद हो जायेगा तब कांग्रेस पार्टी को भंग कर दिया जायेगा ताकि कोई भी कांग्रेस के नाम पे इस देश को न लुट सके और न पीत्वा सके. पर हायरे कांग्रेस बेडा गर्क हो तुमारा, नेहरु ने चाइना से पिटवाया, इन्द्र ने पाकिस्तान के साथ टेबल पे, राजीव ने LTTE से, अब्ब राहुल किस से पिटवाएगा अगर बदकिस्मती से प्रधानमंत्री बना तो ? शायद माओवादियों से .
कुर्सी से लात मर के उत्तर,...
सायद, बहार का रस्ता, कांग्रेसीयों, कोसिस, बहार धुलाई, बहु, बत्त्चा, लुट, पीत्वा, अब्ब...
आपके टाइपिंग का काम कैसा चल रहा है और व्याकरण की पतली क़िताब खरीदी या नहीं. आप यकीन मानिए, वह माओवाद से बचाने के बहुत का आएगी.
और मैंने जो लिखा है वो समझदारों के लिए है, वो कहतें है ना, की समझदार को इशारा ही काफी होता है, तो यहाँ समझदार वो लोग है जो विचारों पे जयादा ध्यान देतें है ना की व्याकरण की गलती को, खेर आप से वो उम्मीद भी नहीं है क्योंकी अप्प इशारे नहीं समझ सकते.
प्रतिकिरिया देते समय आप जैसे मओवादिओं की हिम्मत तो देखिये अपना नाम तक नहीं लिख पाते डर के.
और अपनी चेतना को गधे और शैतान तक सिमित रख के अपनी चेतना का खुद परिचय दे रहा है
चलिए मेरा न सही, अब आप आपके जन्म देने वाले/वाली का ही नाम पता बता दीजिये. मैं यहाँ संख्या के बारे में नहीं पूछ रहा हूँ, अन्यथा आप जोश में आकर नरेन्द्र मोदी का भी नाम शामिल कर सकते हैं.
जहाँ तक नरेन्द्र मोदी के कद का सवाल है तो इसमें कोई धन्यवाद न दीजिये- बाकायदा नाम, जात, धर्म वाले गधों की संख्या बढ रही हैं. और आपके जैसा कोई भी गधा नरेन्द्र मोदी के बराबर तो अपनेआप ही खड़ा है. इसलिए धन्यवाद कहकर काहे को शर्मिंदा करते हैं.
बाकी आपके व्याकरण का ज्ञान अभी भी सुधरा नहीं है. क्या इस मामले में आप शायद अपने पितातुल्य नरेन्द्र मोदी के बराबर बैठना चाहते हैं. मुझे मालूम है आपकी पूरी ज़मात में ही अनपढ़ लोग हैं. दीनदयाल से लेकर....संजय मोदी तक... एक से बढकर एक नमूने हैं...
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