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झूठ का पुलिन्दा है फिर भी चौथी दुनिया जिन्दा है

image अपने कमाल चौथी दुनिया के साथ संपादक संतोष भारतीय

चौथी दुनिया और झूठ का लगता है चोली दामन का साथ है. दूसरी बार जबसे चौथी दुनिया प्रकाशित होना शुरू हुआ है झूठी और मनगढंत रिपोर्टिंग की एक से एक मिसाल पेश कर रहा है. पहले अखबार ने दावा किया कि वह देश का पहला साप्ताहिक अखबार है, झूठ. वह लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज भी हो गया है, झूठ. हर अंक की कवर स्टोरी ऐसी कि पढ़कर आपके मन में पहला ख्याल यही आयेगा- झूठ बोल रहा है. फिर भी संतोष भारतीय देशभर में होर्डिंग लगाकर दावा कर रहे हैं कि वे देश के सबसे विश्वसनीय पत्रकार हैं.

'चौथी दुनिया' निश्चित तौर पर अपनी तरह का एक अलग साप्ताहिक अखबार है। इसका कंटेट भी सभी अखबारों से निश्चित रूप से सबसे अलग है। क्योंकि यह अखबार ऐसी रपटें छापता है, जो अविश्वसनीय लगती है। पिछले दिनों लगातार तीन अंकों में इस तरह के सम्पादकीय और रिपोर्टें प्रकाशित की गयीं जिनमें इतनी अविश्वसनीय बातें लिखीं गई थी कि जिसने भी उन्हें पढ़ा सिर पकड़ कर बैठ गया था। रिपोर्ट का सार कुछ इस तरह था- 'मोसाद और सीआईए ने हिन्दुस्तान को बर्बाद और टुकड़ों में बांटने के लिए 'स्माइल इंडिया 2015' प्लान बनाया है। इस प्लान के तहत आने वाले समय में देश के नामचीन लोगों के चरित्र हनन, हिन्दु-मुस्लिम दंगों और बड़े लोगों की हत्याओं का दौर शुरु किया जाएगा, जिससे पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल पैदा होगा। हालात 1947 सरीखे हो जाएंगे। देश को 31 भागों में बांटने की साजिश हो रही है। हालात पर काबू पाने के लिए अमेरिका भारत को गुलाम बना लेगा। आदि-आदि। यह भी कि इस काम के लिए सीआईए ने देश के बड़े-बड़े और असरदार लोगों को मुंहमांगी कीमत पर खरीद लिया है।'

अब 'चौथी दुनिया' ने  5-11 जुलाई के अंक में पहले पेज पर रुबी अरुण ने 'सोनिया गांधी और गुजरात' नाम की रिपोर्ट में लिखा है कि सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी को शिकस्त देने के लिए हर्शमंदर, फरहा नकवी और मिराई चटर्जी को मोहरा बनाया है। रिपोर्ट में भाजपा नेताओं का सहारा लेकर हर्शमंदर को भ्रष्ट साबित करने की कोशिश की गयी है। सवाल यह है कि जिस हर्शमंदर ने नरेन्द्र मोदी को पिछले आठ सालों से कठघरे में खड़ा कर रखा है, उस हर्शमंदर को भाजपा नेता किस तरह से अच्छा कह सकते हैं ? बात तो तब थी, जब कोई गैर भाजपाई उनके खिलाफ कुछ कहता। रिपोर्ट में यह कहने की कोशिश की गयी है कि चूंकि गुजरात कांग्रेस का कोई नेता इस काबिल नहीं है, जो नरेन्द्र मोदी का मुकाबला कर सके इसलिए सोनिया गांधी ने हर्शमंदर, फराह नकवी और मिराई चटर्जी को मुसलमानों का मसीहा बनाकर गुजरात के मुस्लिमों को कांग्रेस की ओर लाना चाहती हैं। यहां सवाल यह पैदा होता है कि गुजरात में मुसलमान कांग्रेस के अलावा और किसके साथ जा सकते हैं ? वहां उत्तर प्रदेश की तरह सपा या बसपा जैसी कोई क्षेत्रीय पार्टी तो है नहीं, जिसे मुसलमान भाजपा को रोकने के लिए इस्तेमाल कर सकें। गुजरात में मुसलमानों के पास एकमात्र विकल्प कांग्रेस ही है। सवाल यह भी है कि क्या सोनिया गांधी विधानसभा चुनाव के वक्त गुजरात कांग्रेस की बागडोर हर्शमंदर के हाथों में देने की सोच रही हैं ? यह भी याद रखिए कि नरेन्द्र मोदी को केवल मुसलमानों के बल पर सत्ता से बेदखल नहीं किया जा सकता। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गैर सरकारी संगठन के जरिए काम करना और राजनीति करना दोनों अलग-अलग बाते हैं।

इस रिपोर्ट का आपत्ति जनक पहलू हर्शमंदर जैसे लोगों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है। जब 2002 में गुजरात जल रहा था तो हर्शमंदर अहमदाबाद के डीएम थे। उन्होंने दंगों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा देकर दंगा पीड़ितों की मदद करने का बीड़ा उठाया था, जो आज तक जारी है। दंगों के उस दौर में किसी मुसलमान विधायक, सांसद या मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया था। कुछ तो ऐसे भी थे, जो एनडीए सरकार में सत्ता का सुख भोग रहे थे। नरेन्द्र मोदी जैसे फासिस्ट आदमी से लोहा लेना आसान काम नहीं था। 'चौथी दुनिया' खुद मानता है कि हर्शमंदर ने दंगों से जुड़े दो हजार से ज्यादा मामलों को सुनवाई के लिए दोबारा खुलवाया है। यह काम बेहद कठिन और खर्चीला था। यदि सोनिया गांधी ने मुसलमानों की भलाई के लिए हर्शमंदर की संस्था 'अमन बिरादरी' को सौ करोड़ का अनुदान दे ही दिया है तो इसमें हाय तौबा मचाने की क्या जरुरत है ? नरेन्द्र मोदी की सरकार गुजरात के मुसलमानों को सताने में कोई कसर नहीं छोड़े तो कोई बात नहीं, लेकिन हर्शमंदर को अनुदान देने पर सवाल खड़े करना कहां तक जायज है ?

चौथी दुनिया की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर्शमंदर अपने भाषणों में पाकिस्तान की खुली हिमायत करते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती रिपोर्ट में हर्शमंदर पर जेहादियों से पैसा लेने का आरोप भी मढ़ दिया गया है। लिखा गया है कि हर्शमंदर 'एक्शन एड' नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था के भारत में कंट्री हैड हैं। एक्शन एड पर आरोप है कि वह अमेरिका स्थित इन जेहादियों से आर्थिक मदद लेता है, जो कश्मीर में जेहाद कर रहे लोगों की मदद करते हैं। पाकिस्तान की हिमायत करने की बात करके और 'एक्शन एड' संस्था से आर्थिक मदद लेने का आरोप लगाकर हर्शमंदर को एक तरह से देशद्रोही साबित करने की कोशिश भी की गई है। हर्शमंदर को एक बार हम लोगों ने मेरठ बुलाया था। उन्होंने भाषण भी दिया था। उस भाषण में कहीं भी पाकिस्तान की हिमायत नहीं की गयी थी। उस समय एक बुर्जूर्ग मुसलमान ने जब हर्शमंदर से यह कहा कि आप मुसलमानों की मदद कर हैं, हम आपके एहसानमंद हैं। इस पर हर्शमंदर का जवाब था कि 'मैं मजलूमों के साथ हूं। मजलूम कोई भी हो सकता है।' भाजपा नेताओं के कथनों के आधार पर हर्शमंदर जैसे लोगों को कठघरे में खड़ा करना चौथी दुनिया जैसे अखबार को शोभा नहीं देता। इस देश में हर्शमंदर जैसे लोग गिनती के ही हैं, उन पर भी बेमतलब के आरोप लगाकर उन्हें हतोत्साहित करना ठीक नहीं है।

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एक पुराना भाजपाई on 09 July, 2010 12:15;41
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भाई सलीम आपने सोलह आने सही बात लिखी है. एकाध बार हमें भी अखबार देखने का मौका नसीब हुआ है. अखबार में झूठ का बोलबाला तो है.
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Arvind Tripathi on 09 July, 2010 19:34;38
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प्रिय सलीम भाई,
आपके lekho और उनके बारे में लोगो के कमेन्ट पढता रहता हूँ. आप किसी के विरोध में किसी भी हद तक चले जाते है. संतोष भारतीय खोजी और सेंसेशनल पत्रकारिता के प्रारंभ करने वाले समूह में से एक रहे है. एक समय वे विश्वनाथ सिंह की आँखों का चस्मा हुआ करते थे. अपने गुरु की ही तरह उन्हें भी देश चलाने का भ्रम रहा है. वे कुछ नया करने के चक्कर में क्या न कर जाये उन्हें खुद ही नहीं पता. उन्हें अपना विज्ञापन करना ही नहीं आता.विज्ञापन का matlab अपने को bechna hota है. apni khoobiaan लोगो को bataani hoti है. ye क्या bataen? क्या abhi भी देश को kuch bataane को rah gaya है. log aaj संतोष भारतीय hone का matlab jaante है. वे अपने को क्यों बेच रहे है, yah उन्हें नहीं पता है. vo क्यों likh रहे है , yah भी नहीं पता है. aapko नहीं पता. उन्हें samajhna किसी के boiote की baat नहीं par jahan तक mera savaal है mai उन्हें sahi samajh रहा हूँ वे yah sab rajyasabha की sadasyata के liye कर रहे है. एक nata से आप aisi ही gappo की ummid kariye. वे naaratmak kaam karke charchaa में rahna jante है. आप unki fikr में duble mat ho वे किसी muslim samarthak का कुछ नहीं bigaad payenge kyonki आप jise log turant islaam के khatre का bhaav paida करने में समय नहीं lagaate है.
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प्रकाश on 11 July, 2010 01:28;21
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हर्ष मंदर गुजरात नरसंहार के समय अहमदाबाद के कलेक्टर नहीं थे. वह मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ काडर के हैं. उस समय वह एक्शन एड में थे और सरकारी सेवा से छुट्टी लिये हुए थे. कुछ साल बाद उन्होंने सेवा से इस्तीफा़ देकर पूरा समय समाज सेवा, खा़सकर सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों के लिये दे रहे हैं.
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rajendra kashyap on 30 July, 2010 09:45;15
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this artcal is very truth rajendra kashyap
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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