रांची में पूंजी बनाम पत्रकारिता की जंग
रांची में 22 अगस्त से मीडिया वार शुरू हो चुका है. खोजी खबरें, जनसरोकार और मुद्दे की बात पर आधारित पत्रकारिता करने के लिये मशहूर अखबार समूह प्रभात खबर के इस गढ़ में हाई-लाइफ(पेज-3 पत्रकारिता), बाजारवाद और सनसनी परोसने वाला मीडिया समूह दैनिक भास्कर ने दस्तक दे दिया है.
वैसे दैनिक भास्कर दस्तक नहीं देता है वह अपने प्रोडक्ट की लांचिंग करता है. इस स्किल में उसे महारत हासिल है, ठीक उसी तरह जैसे आमिर खान को अपनी फिल्मों के प्रमोशन में महारत हासिल है. यह अखबार समूह जिस शहर में दस्तक देने वाला होता है वहां उससे पहले उसके जयपुर लांचिंग की कहानियां पहुंच जाती हैं. कि किस तरह उसने वहां मार्केटिंग सर्वे किया, प्राइस वार शुरू कराया, प्रतिद्वंद्वी अखबार के सभी योग्य मीडिया कर्मियों को खरीद लिया और पहले दिन से ही नंबर वन हो गया. यह बिल्कुल सच्ची कहानी है. मगर इसके साथ-साथ यह भी सच है कि वह जयपुर में फिलहाल नंबर वन नहीं है. और सच तो यह भी है कि अपने गृह राज्य मध्यप्रदेश छोड़ कर वह किसी प्रदेश में नंबर वन नहीं है. मध्यप्रदेश में भी अब पाठक उससे ऊब चुके हैं और पत्रिका, राज एक्सप्रेस व पीपुल्स टाइम्स जैसे अखबार वहां तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.
इसके बनिस्पत झारखंड का नंबर वन अखबार प्रभात खबर एक बहुत छोटी पूंजी वाला अखबार है. इसके पास कुल पूंजी ही उतनी होगी जितना दैनिक भास्कर अपने एक यूनिट के लांचिंग प्रमोशन पर खर्च कर देता है. इसकी महारत न तो लांचिंग में है और न ही ब्रांड प्रमोशन में. इसकी एकमात्र खासियत है इसका एडिटोरियल कंटेंट. इसकी जनोन्मुखी, तथ्यपरक और सच्ची खबरें. इसका आंदोलनकारी तेवर. यह अखबार अपनी यूनिट की लांचिंग भी बड़े अनोखे तरीके से करता है. किराये के चार कमरे, आठ-दस नये लड़के, पुरानी आउटडेटेड मशीन और शुरू. कहीं कोई प्रचार नहीं और अखबार बाजार में उतर जाता. पाठकों को नोटिस करते-करते हफ्तों लग जाते हैं, मगर छह महीने की मेहनत के बाद यह समूह जो मुकाम हासिल करता है वह टिकाऊ होता है. आप विश्वास नहीं करेंगे इस समूह के जमशेदपुर लांचिंग का पूरा बजट ही सिर्फ दो लाख का था. धनबाद, कोलकाता और देवघर यूनिट तो इससे भी कम में लांच हुए. मगर यह अखबार इनमें सिर्फ धनबाद में नंबर टू है बांकी हर जगह नंबर वन है.
इस तरह से देखा जाय तो यह कहना कहीं से अनुचित नहीं होगा कि फिलहाल रांची में लड़ाई पूंजी बनाम पत्रकारिता की है. हम सभी जानते हैं कि कुछ सालों से अखबारों में एडिटोरियल विभाग सबसे दोयम दर्जे का माना जाने लगा है. जहां अंग्रेजी अखबारों में अशोक जैन के नेतृत्व में टाइम्स ऑफ इंडिया इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा पोषक बन बैठा है, वहीं हिंदी में इसकी कमान दैनिक भास्कर समूह ने सुधीर अग्रवाल के नेतृत्व में थाम रखी है. मगर इस दौर में भी प्रभात खबर एक ऐसा समूह है जिसका लीडर एक संपादक है, हरिवंश न तो मालिक हैं और न ही मैनेजर. एक हरिवंश ही नहीं इस अखबार के संपादकीय विभाग के दूसरे कर्मी भी कभी मार्केटिंग विभाग के द्वारा कभी उस तरह उपेक्षित नहीं किये गये, जिस तरह दूसरे अखबारों में किये जाते रहे हैं. (इसके बावजूद आईआरएस के ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यह देश का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ अखबार माना गया है.)
लिहाजा इस लड़ाई के नतीजे बतायेंगे कि अखबार के लिये एडिटोरियल ज्यादा महत्वपूर्ण है या मार्केटिंग (सर्कुलेशन- स्पेस सेलिंग). यह एक ऐसी जंग है जिसे देश के सभी रचनाधर्मियों को गौर से देखना चाहिये, क्योंकि इस जंग की हार-जीत ही आने वाले समय में पत्रकारिता की दिशा तय करेगी. वैसे यहां आपको यह जानकारी दे दूं कि इस लड़ाई के पहले राउंड में देनिक भास्कर को करारी पराजय मिली है और प्रभात खबर को मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल हुई है.
लांचिंग वाले दिन इस अखबार के कर्मियों ने सड़क पर उतरकर जिस तरह हॉकरों से मारपीट की उसके कारण इस अखबार की छवि पर निगेटिव असर पड़ा है. इतना कुछ करके भी पहले दिन यह समूह सिर्फ 10 हजार कॉंपियां ही बेच पाया. अगले दिन भी सिर्फ 23 हजार कॉंपियां ही बिकीं. जबकि अखबार का दावा एक लाख से अधिक कॉंपियां बेचने का और पहले दिन से ही नंबर वन हो जाने का था. मगर हकीकत यह थी कि पहले दिन यह अखबार नंबर छह था और दूसरे दिन नंबर चार.
इसके अलावा लोगों ने पहली बार रांची में इस अखबार के कंटेंट में मुद्दों और आम लोगों से संबंधित खबरों की अधिकता देखी. भास्कर से पूर्व परिचित लोगों के लिये यह बड़े हैरत की बात थी. आखिर कंज्यूमरिज्म की बात करने वाला यह अखबार झारखंड में इश्यूज की बातें क्यों कर रहा है. निश्चित तौर पर यह प्रभात खबर इम्पैक्ट था. क्योंकि झारखंड में यह निर्विवाद तथ्य है कि यहां टिकना है तो प्रभात खबर का ही स्टाइल अपनाना पड़ेगा. हिन्दुस्तान के मामले में भी यही हुआ, इस अखबार ने रांची में तभी सफलता हासिल की जब उसने स्थानीय संपादक समेत प्रभात खबर की आधी टीम को तोड़ लिया और उसी की तरह खबरें छापनी शुरू की.
वैसे हिन्दुस्तान या दैनिक भास्कर जैसे अखबारों के प्रभात खबर की तरह जनोन्मुखी खबरें छापने का यह अर्थ कतई नहीं कि ये अखबार भी कंटेंट बेस्ड हो गये. इन अखबारों का नेतृत्व इसके बावजूद मैनेजमेंट और सर्कुलेशन वालों के हाथ में ही रहता है. इन अखबारों में संपादक सिर्फ नीतियों को लागू कराता है, चाहे समाज की समस्याएं छापने कहा जाय या बाजार का ग्लैमर. वह हर कुछ करने के लिये तैयार है. उसे गीता का ज्ञान छापने कहा जाय तो वह भी छाप देगा और मल्लिका शेरावत की नंगी तस्वीर छापने कहा जाय तो उससे भी गुरेज नहीं करेगा. क्या छपेगा इसका निर्णय मैनेजमेंट को करना है, वह अपनी सूझबूझ से तय करता है कि क्या बिकेगा और संपादकीय टीम को ऐसी चीजें छापने का निर्देश देता है. अगर भोपाल में ग्लैमर बिकता है तो ग्लैमर छापो, रांची में घोटाला बिकता है तो घोटाला छापो.
इसके बनिस्पत प्रभात खबर दूसरे तरीके से काम करता है. वह यह नहीं सोचता कि रांची में क्या बिकेगा और जमशेदपुर में क्या बिकेगा. प्रभात खबर से पहले रांची में घोटाला और मुद्दे नहीं बिकते थे. इसी अखबार ने लोगों को ऐसी खबरें पढ़ने की आदत लगाई. प्रभात खबर जिस शहर में जाता है ऐसी ही पत्रकारिता करता है. उसके लिये पत्रकारिता का अर्थ यही है. धीरे-धीरे लोगों को उसकी खबरें पसंद आ जाती हैं और वह सफल हो जाता है, फिर बाद में आने वाले लोग सोचते हैं कि इस शहर में ऐसी ही खबरें बिकेंगी.
दरअसल सच और साहस भरी खबरों की आदत अगर एक बार लग जाये तो कास्मेटिक खबरें जल्दी सुहाती नहीं है और सच अगर इमानदारी से नहीं कहा जाये तो वह सच भी कास्मेटिक ही लगता है. यही वजह है कि प्रभात खबर वाला तेवर अपनाने के बावजूद हिन्दुस्तान झारखंड में नंबर वन नहीं हुआ. अब दैनिक भास्कर प्रयासरत है....
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Digg
यह है दमदार और सच्ची बात…
आपकी इस अच्छी रिपोर्ट के लिए बधाई।
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