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विकीलीक्स-विकीलीक्स खेल रहे हैं मीडिया दिग्गज

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दुनिया भर को सच्चाई, ईमानदार और दायित्वबोध का पाठ पढ़ाने वाले मीडिया हाउसों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अपनी बारी आने पर वे नैतिकता को बैकफुट पर रख देते हैं. नेता या अफसर ने उनके हितों को नुकसान पहुंचा दिया तो पीछे पड़ जाते हैं. वह दौर अब काफी पीछे छूट गया है जब प्रतिद्वंद्विता बैकफुट पर और नैतिकता फ्रंट फुट पर हुआ करती थी. अब तो मीडिया दिग्गज प्रतिद्वंद्वी हाउसों में चोरी करवा रहे हैं और डाके डलवा रहे हैं. जी हां, रांची में चल रहे मीडिया वार में एक दूसरे कर्मचारियों पर डाका डालना और प्रतिद्वंद्वी का अखबार न बिकने देने के लिये हॉकरों को अपने कब्जे में लेना तो आम बात है.

अब तो एक हाउस दूसरे हाउस के जरूरी डाक्यूमेंट्स उड़ाकर उसे अपने हित में उपयोग कर रहा है. दुख तो इस बात का है कि यह सब उस रांची शहर में हो रहा है जहां कभी ऐसी मिसालों बनी थीं कि एक हाउस की मशीन खराब होने पर दूसरे प्रतिद्वंद्वी हाउस के संपादक ने अपना पूरा पेस्टिंग पेज यह कहते हुए सौंप दिया था कि आप लोग इसका इस्तेमाल जिस रूप में चाहें कर सकते हैं.

दैनिक भास्कर समूह के रांची में पदार्पण के बाद से ही यहां के मीडिया हाउसों में एक अजीब किस्म का माहौल बन गया है. जो कर्मी आज आपके साथ काम कर रहा है वह कल कहां काम करेगा इसका ठिकाना नहीं है और जो आज आपको छोड़कर जा रहा है वह कल आपके साथ आ जाये इसमें भी कोई संदेह नहीं है. इस मीडिया वार की शुरुआत ही इसी पैटर्न पर हुई. पहले दिन दैनिक भास्कर ने जो खबर लीड बनाई थी वह दैनिक हिंदुस्तान के चौथे पन्ने पर छपी थी. उस खबर को ब्रेक करने वाला रिपोर्टर अगले दिन हिंदुस्तान में सेवा करने के लिये उपस्थित हो गया. इसी तरह भास्कर की लाचिंग से ठीक पहले एक साथ हिंदुस्तान छोड़कर गये छह रिपोर्टरों में से कई फिर से हिंदुस्तान वापस आ गये हैं. कहा जा रहा है कि हिन्दुस्तान प्रबंधन ने ही इन्हें जानबूझ कर भास्कर की पालिसी समझने वहां भेजा था. उधर, दैनिक भास्कर ने भी 27 तारीख को पलटवार कर दिया. हिंदुस्तान ने जिस खबर को लीड बनाकर और एक्सक्लूसिव कहकर छापा वह खबर भास्कर में भी ज्यों की त्यों छपी है.

रांची मीडिया वार-2

इस बीच ऐसी खबर है कि किसी हाउस ने प्रभात खबर के एचआर में सेंध लगाकर यहां के कर्मचारियों की सूची और उन्हें कितना वेतन मिलता है यह जानकारी उड़ाने की कोशिश की है. प्रभात खबर प्रबंधन की ओर से उक्त हाउस का नाम तो नहीं बताया गया पर आशंका जाहिर की जा रही है कि यह काम दैनिक भास्कर समूह की ओर से करवाया गया है. वस्तुतः कमजोर लांचिंग और हिंदुस्तान द्वारा कराये जा रहे तोड़फोड़ के कारण दैनिक भास्कर की स्थिति काफी नाजुक बताई जा रही है, वहां कर्मचारियों का टोटा पड़ने लगा है. ऐसे में वे हर कीमत पर प्रभात खबर की टीम को तोड़ लेना चाहते हैं. गौरतलब है कि जब रांची में हिंदुस्तान लांच हुआ था तो पहले बाहरी टीम आई पर वह टीम सफल नहीं हो पाई, बाद में हिंदुस्तान ने प्रभात खबर के स्थानीय संपादक समेत 40 लोगों को दुगुनी सैलरी और पांच साल के कांट्रेक्ट का लालच देकर तोड़ लिया. जाहिर सी बात है कि प्रभात खबर छोटा समूह है, वह अपने कर्मियों को उतने पैसे नहीं दे पाता जितना भास्कर और हिंदुस्तान जैसे जाइंट समूह देने की स्थिति में होते हैं. लिहाजा इस खबर से प्रभात खबर प्रबंधन परेशान है.

हालांकि प्रभात खबर के प्रधान संपादक ने इन आशंकाओं के बीच भी अपनी दिलेरी नहीं छोड़ी है. उन्होंने अपने सभी कर्मियों की मीटिंग बुलाकर उन्हें संदेश दिया है कि जिन्हें प्रभात खबर के सिद्धांतों और उसकी लड़ाई में विश्वास है वे ही हमारे साथ रहें. जिन्हें जाने की इच्छा हो वे जा सकते हैं. यहां कोई दुविधा की स्थिति में न रहे. उन्होंने कहा कि जाने से पहले लोग यह भी देख लें, परख लें कि ऐसे लोग जो थोड़े से पैसों के लालच में एक जगह से दूसरे जगह उछल कूद करते रहते हैं उनका भविष्य कैसा है. या उन्होंने कैसी सफलता अर्जित की है. उन्होंने इस बैठक में साफ-साफ कहा कि इन दिनों रांची में मीडिया के युद्ध में कई अनैतिक चीजें हो रही हैं, मगर मैं चाहता हूं कि इस हाउस का कोई कर्मी ऐसी हरकत में शामिल न हो. न खबर चुराये और न ही कोई और जानकारी हमें इस युद्ध को पूरा नैतिकता और पवित्र आचरण के साथ लड़ना है.

इन हालातों में रांची के मीडिया जगत की वह कहानी याद आती है, जब प्रभात खबर अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था. कभी कंपोजिंग मशीन खराब हो जाती थी तो कभी टेलिप्रिंटर का लाइन काट दिया जाता था. यह 1989 की बात है. एक दिन कंपोजिंग मशीन खराब हो गई और ऐसा लगा कि अगले दिन अखबार शायद ही बाजार तक पहुंच पायेगा. ऐसे में प्रभात खबर के कर्मी अपनी समस्या लेकर मदद मांगने अपने प्रतिद्वंद्वी अखबार रांची एक्सप्रेस के संपादक के पास पहुंचे. उस वक्त रांची एक्सप्रेस रांची का नंबर वन अखबार था और उसके संपादक पवन मारू थे. जब उन्होंने प्रभात खबर के कर्मियों से उनकी समस्या सुनी तो उन्होंने अपना पूरा पेस्टिंग पेज प्रभात खबर को सौंप दिया और कहा कि इसे जैसे चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं. उसी रांची शहर में आज जो कुछ हो रहा वह मीडिया की विश्वसनीयता को कलंकित करने वाला है. 

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prashant mehrishi on 27 August, 2010 22:51;40
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मीडिया और विश्वसनीयता ??
आप मानते रहो पर इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग मैं हरेक व्यक्ति जो मीडिया के संपर्क मैं है जानता है की इसे कैसे मेनेज किया जाता है .
आधे पत्रकार तो शाम को नशे मैं टुन्न मिलते हैं . कुछ प्रोपर्टी डीलर बन गए हैं और कुछ दलाल
रही मीडिया हाउस की बात तो ये कमाने के लिए निकले हैं कोई मिशन पर नहीं.
हाँ जो इस पत्रकारिता को धर्म मान कर चल रहे हैं उनका अर्थशास्त्र मैं अध्ययन नहीं होता है .
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JASBIR CHAWLA on 28 August, 2010 14:45;57
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Patrakarita aab mission nahin commisson ho gaee hai.Blacmail ka dhanda ban gaee hai. Kitne patrakar Prabhash Joshi,Rajendra Mathur ke saman koi line le sakte hain.Up date karne ke liye kitne patrakar adhyain karte hain?Prashant ne theek likha hai,Patrakaron ki visvaniyta kahan bachi hai.
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Khabariram on 31 August, 2010 21:04;29
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हिंदुस्तान में कार्यरत अनिल पांडेय जल्दी ही फिर से भोपाल का रुख कर रहे हैं। अनिल भोपाल में पत्रिका में सीनियर सब एडिटर के पद पर ज्वाइन करेंगे। पांडेय इससे पहले भास्कर डॉट कॉम में उप संपादक के पद पर कार्यरत थे। लेकिन उन्होंने दिल्ली का रूख कर लिया था।
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