भारतीय परंपरा से दूर होती पत्रकारिता
मोबाइल तो छोटा है, पर अगर उससे मेरा सीधा संबंध पत्नी से होगा तो पत्नी से ज्यादा महत्वपूर्ण तो मोबाइल होगा। टेक्नोलाजी तार को तार से जोड़ने वाली हो सकती है, लेकिन दिल को दिल से जोड़ने वाली नहीं हो सकती. जिसने भी यह कहा कि दुनिया एक विश्वग्राम बनती जा रही है वह छोटी बस्ती बनाना चाहता था, जैविक समाज नहीं। इसका संबंध पत्रकारिता से भी है। पत्रकारिता में मुख्य अब ये नहीं है कि हम अपनी बात दूसरे से क्या कह रहे हैं। अब ये ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कितनी तेजी से कह रहे हैं और कितनी चमक से कह रहे हैं। यानि कन्टेट से ज्यादा प्लेटफार्म महत्वपूर्ण हो गया है. बहुत सतही तरीके से यह बात लोगों के मन में बैठ गयी है कि कंटेंट तो हम किसी तरह बना सकते हैं, उसको जितने अच्छे से हम पहुंचाएंगे उतना ही हमारा महत्व है। ऐसी समझ मुख्यत: दो बातों पर निर्भर है। मैं किस्से के जरिए अपनी बात कहूंगा। पिछले साल पंद्रह अगस्त के आसपास चेन्नई में जन्मी इंदिरा नूई को पेप्सी ने अपना सीईओ बना दिया। जब इंदिरा पेप्सी की सीईओ हुईं तो टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी ने अपने चैनल पर खबर पढ़ते समय इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि 'ह्वाट एन एचिवमेंट आन इंडिपेंडेंस डे' यानि स्वतंत्राता दिवसव पर क्या उपलिब्धि है। अर्णब यह बताना चाहते हैं कि आपने स्वतंत्रता संग्राम इसलिए चलाया कि एक दिन आपके यहां की लड़की पेप्सी बेचने वाली कंपनी की सीईओ हो जाएगी और ये आपके स्वातंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी उपलिब्ध बन जाएगी. अर्णब गोस्वामी ऑक्सफोर्ड में पढ़े विद्वान आदमी है। वे हमारे मित्र हैं। उनको एक क्षण भी नहीं लगा कि मल्टीनेशनल्स के खिलाफ 190 सालों तक लड़ाई लड़ने वाले देश की बेटी के पेप्सी जैसे किसी मल्टीनेशनल के सीईओ होने पर नाचना उचित नहीं है। लेकिन उन्होंने इस घटना को भारत की बहुत बड़ी उपलब्धि माना। आज हमारा मध्यवर्ग पैसे कमाने का पराक्रम करता है तो उसे ही भारतीय स्वतंत्रता का पराक्रम मानकर प्रचारित किया जाता है। यानि भारत इसलिए स्वतंत्र हुआ कि हम एक दिन दुनिया में सबसे अमीर देश होंगे और हमारा डंका अमेरिका में भी बजेगा। ये हमारे पढ़े-लिखे और बहुत ही समझदार वर्ग की धारणा है।
एक जमाना वह था जब 1946-47 में अजित भट्टाचार्य ने स्टेटसमेन का प्रस्ताव ठुकरा कर हिंदुस्तान टाइम्स से पत्रकारिता शुरू की थी। स्टेट्समेन उस जमाने में बहुत प्रतििष्ठत अखबार था और बहुत ज्यादा पैसे देता था। उन्होंने सोचा कि मैं क्यों देश की स्वतंत्राता के विरुद्ध खड़े रहने वाले अखबार स्टेट्समैन में जाऊं जबकि मेरा देश आजाद हो रहा है। उस समय हिंदुस्तान टाइम्स स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक अखबार था, इसलिए स्टेटसमेन की प्रतिष्ठा और पैसा छोड़कर अजित भट्टाचार्य हिंदुस्तान टाइम्स में अप्रेंटिस सब एडीटर हुए। मैं इसे देखकर चकित रह गया कि जिस अखबार को अजित बाबू ने काम करने के लिए इसलिए चुना कि वह स्वतंत्रता संग्राम का अखबार था, उसी हिन्दुस्तान टाईम्स समूह का हिंदी अखबार खुद को बेचने के लिए पुलित्जर पुरस्कार दिलवाने की कामना कर रहा है। अब भला पुलित्जर पुरस्कार का भारतीय पत्रकारिता की परंपरा से क्या लेना-देना। पुलित्जर पुरस्कार सिर्फ अंग्रेजी में और अमेरिकी पत्रकारिता करने वाले को मिल सकता है। भारतीय पत्राकारिता और हिंदी में पत्राकारिता करनेवाले को वह पुरस्कार कभी नहीं मिल सकता। लेकिन हिंदुस्तान नाम का हिंदी अखबार पुलित्जर पुरस्कार को इसलिए बेच रहा है कि उसके पाठकों को यह लगे कि ये तो सारे संसार में भारत का डंका पीटने वाला ध्वजावाहक अखबार है। हिंदुस्तान ने हर तरह से यह बताने की कोशिश की कि इस दौर की रीमिक्स वाली पत्रकारिता ही भविष्य की पत्रकारिता है। पत्रकारिता में देसी परंपरा की बात तो एंग्री ओल्ड मैन टाईप लोग ही करते हैं। ये दो उदाहरण मैंने कोई माखौल उड़ाने के मकसद से नहीं दिए हैं। मैं भारतीय मध्यवर्ग के अमेरिकी प्रेम के बारे मे कह रहा हूं। आधी सदी पत्रकारिता में गुजारने के बाद अपने को किसी पर कुल्हाड़ी चलाने या किसी पर खुंदक निकालने की कोई इच्छा नहीं हैं। बाइबल ने कहा कि ये जो घंटी बज रही है, इसको देखकर चिंतित हो क्योंकि यह किसी और के लिए नहीं बल्कि तुम्हारे लिए बज रही है। पत्रकारिता में मैं जो भी होते हुए देखता हूं तो लगता है कि मेरे लिए घंटी बज रही है। हमने पत्राकारिता में आधी सदी इसलिए गुजारा कि हमें लगता था कि पत्रकारिता के जरिए समाज में थोड़ा-बहुत शुभ परिवर्तन कर सकेंगे। ऐसा नहीं होता तो क्रिकेट खेलते टेस्ट खेलते और आज दस करोड़ सलाना लेकर टेलीविजन पर मजे से कमेंट्री करते।
भारतीय पत्रकारिता दुनिया के अन्य देशों की पत्रकारिता से इसलिए भिन्न और श्रेष्ठ है कि इसने अपने देश को जगाया और आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। इसमें लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जैसे संपादक हुए। जिन्होंने मानवता को जगाया। महात्मा गांधी ने डरबन में संपादक के नाम पत्र लिखकर शुरूआत की थी जब उन्हें पगड़ी उतारने को कहा गया था और उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। महात्मा गांधी ने अपने राजनीति की शुरूआत पत्रकारिता के साथ-साथ की। उस समय एक नेता ऐसा नहीं था जिसने यह नहीं सोचा हो कि पहले अच्छा अखबार निकालकर लोगों से बात करनी चाहिए फिर मुझे नेता बनाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो अकबर इलाहाबादी नहीं कहता कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। क्योंकि इस तरह की पंक्ति दुनिया की किसी कविता में नहीं मिलेगी। अगर हम पत्राकारिता की अपनी परंपरा को छोड़ देंगे तो रेगिस्तान में पानी के लिए तरसने वाले एक जीव की तरह पड़े रहेंगे, क्योंकि प्राणवायु तो इसी परंपरा से मिलेगा। इस देश का पहला अखबार एक अंग्रेज ने निकाला। हिकी ने अखबार इसलिए नहीं निकाला कि उसको अंग्रेजी सरकार का गुणगान करते हुए विज्ञापन प्राप्त करना था। अंग्रेज और अंग्रेजी राज होते हुए भी उसने अखबार इसलिए निकाला कि ईस्ट इंडिया कंपनी में जो घोटाले होते थे, उनका भंडापफोड़ किया जाना आवश्यक था। अंग्रेजों को अपने ही आदमी द्वारा निकाला जाने वाला अखबार रास नहीं आया। अंग्रेजी सरकार ने ना सिपर्फ अखबार बंद करवाया बल्कि हिकी को तत्काल वापस भेज दिया। भारत की मिट्टी में कुछ ऐसा है कि अंग्रेज भी जब राज करने आता है तो उसके साथ आया पत्रकार भंडापफोड़ करने में लग जाता है। हिकी तक को समझ में आता था कि मेरी सरकार क्या गड़बड़ कर रही है और मेरा धर्म इसकी तारीफ करना नहीं बल्कि इसका भंडापफोड़ करना है।
भारत में जन्मे और यूरोप में व्यवसाय कर रहे अरुण नायर पिछले साल एलिजाबेथ हर्ले नाम की एक सुंदर महिला को लेकर भारत आए। वे भारतीय पद्धति से भारत में विवाह करना चाहते थे। ईसाई पद्धति से इंग्लैंड में वे शादी कर चुके थे। अरुण नायर और एलिजाबेथ हर्ले का फोटो टाइम्स आपफ इंडिया ने छापा और शीर्षक दिया 'येट अनदर इंडियन टेकओवर'। वो बड़े शानदार दिन थो जब मित्तल ने आर्सेलर का अधिग्रहण किया था और टाटा ने कोरस का टेकओवर किया था। टाइम्स आपफ इंडिया ने इसी उदाहरण के जरिए एलिजाबेथ हर्ले को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदला दिया। क्योंकि टेकओवर तो बड़ी कंपनी छोटी कंपनी का करती है। यानि एलिजाबेथ हर्ले प्रेम में पड़कर भारतीय पद्धति से शादी करने भारत नहीं आई थी बल्कि एक प्राइवेट कंपनी थी जिसका टेकओवर अरुण नायर नाम की भारतीय कंपनी ने कर लिया। विवाह की परंपरा को उस अखबार ने टेकओवर की व्यवसायिक परंपरा के साथ खड़ा कर दिया। जोधपुर में राजस्थानी रस्मो-रिवाज के साथ उनकी शादी हुई। विवाह के बाद अरुण के माता पिता ने यह कहा कि शादी में उनकी अनदेखी हुई है। इस बात को लेकर झगड़ा चला। इस झगड़े में यह बात सामने आई कि एलिजाबेथ हर्ले ने भारतीय पद्धति से ब्याह रचाने को `हेलो´ नाम की लाइफस्टाइल पत्रिका को एक करोड़ चालीस लाख रुपए में पहले ही बेच दिया था, इसलिए भारत में उसका कोई कवरेज नहीं कर सकता था। उस विवाह का पूरा खर्चा एक करोड़ हुआ। यानि एलिजाबेथ हर्ले ने भारतीय पद्धति से ब्याह रचाने में चालीस लाख रुपए बनाए। जोधपुर के एक व्यक्ति ने अदालत में केस किया कि इन दोनों ने हमारी विवाह की परंपरा को ठेस पहुंचाया है। कुछ दिन बाद टाइम्स आफ इंडिया में खबर छपी कि भारत की न्यायपालिका पर करोड़ों केस का दबाव पहले से है और इस आदमी ने एक केस और कर दिया। ये आदमी समझता नहीं है कि इस विवाह के जरिए भारतीय पद्धति को दुनिया के अमीरों के हाथों बेचने का कितना अच्छा अवसर मिला। अगर आप अखबारों को प्रकाशन उद्योग में और समाचार चैनलों को विडियो कंपनी में सीमित कर देंगे तो अंदाजा लगा सकते हैं कि पत्रकारिता का क्या होगा?
आजकल अखबारवाले पैसा लेकर खबर छापते हैं। चुनावों के दौरान तो उम्मीदवार पन्ने के पन्ने खरीद लेते हैं। इस बाबत एक मालिक ने कहा कि अगर हम पैसे नहीं लेंगे तो हमारे लुच्चे रिपोर्टर पैसा ले लेंगे। पिछले दिनों मैं एक जिला मुख्यालय में किसी कार्यक्रम में गया था। वहां मुझे बताया गया कि फलां अखबार का फलां ब्यूरो पांच लाख रुपए में नीलाम हो गया। तब मुझे स्वराज नाम के उस अखबार की याद आयी जिसने न जाने कितनी यातनाएं सहीं लेकिन अंग्रेज सरकार के कहने पर अपनी संपादकीय नीति में कोई बदलाव नहीं किया. स्वराज ही ऐसा अखबार था जिसके आठ संपादकों को सदा के लिए कालापानी की सजा हुई थी. फिर भी न स्वराज अखबार झुका और न ही उसने अंग्रेजी सत्ता की कोई परवाह की. लेकिन यह देश की पत्रकारिता का कैसा दुर्भाग्य है कि आजकल पैसा लेकर खबर लिखी और दिखाई जा रही है। ऐसे में पत्राकारिता का बचना मुश्किल है। अगर नीर क्षीर विवेक से पत्रकारिता नहीं करेंगे तो हम अपनी पत्रकारिता की परंपरा पर गर्व नहीं कर सकेंगे।
(यह आलेख राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन द्वारा `मीडिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव और हमारी परंपरा´ विषय पर आयोजित गोष्ठी में प्रभाष जोशी द्वारा दिए गए व्याख्यान पर आधारित है)
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Digg
जो नए लोग इस पेशे में आ रहे हैं, उन्हें बहुत जल्दी इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु बना देता है प्रबंधन. सम्पादकीय और विज्ञापन विभाग एक हो जा रहे हैं. रिपोर्टर को न्यूज़ के साथ साथ विज्ञापन लाना पड़ रहा है. मुझे भी आदरणीय प्रभाष जोशी के सम्पादन में निकलने वाले जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में काम करने का मौका मिला है. पाँच साल की जनसत्ता की नौकरी में मुझे भी इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन के इस विशेष गुण का पता चला. हाँ, प्रभाष जी बेशक एडिटोरिअल की स्वाधीनता के हिमायती रहे .
मालिक के लिए अखबार और चैनल अब केवल प्रोडक्ट हैं, और प्रोडक्ट की ब्रांडिंग के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं. यदि ऐसा नही होता तो दीपक चौरासियाओं को राखी सावंतों का इंटरव्यू करने की नौबत नही आती. सब जानते हैं, जो दीखता है, वही बिकता है.
प्रकाश चंडालिया
संपादक -राष्ट्रीय महानगर
कोलकाता
"एक मालिक ने कहा कि अगर हम पैसे नहीं लेंगे तो हमारे लुच्चे रिपोर्टर पैसा ले लेंगे।"
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