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खबरों को रिचार्ज करने का काला धंधा

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बहुत सवेरे ही ......... के संवाददाता का फोन आया. मैंने उससे जानना चाहा कि ...... के तीन-तीन फोटो कैसे छप रहे हैं? वह बोला उन्होंने मंहगा पैकेज लिया है. ...... जी ने भी दो लाख दिये हैं. उन्होंने पांच लाख का पैकेज लिया है. आपको फोन इसलिए किया क्योंकि आप लोगो का पैकेज पूरा हो रहा है. आज आपके......आनेवाले हैं. रिचार्ज करवा लीजिए तभी हम कवर कर पायेंगे. दस दिन की ही बात है. बड़ा पैकेज ले लीजिए सब कवर हो जाएगा.

जिनकी डायरी से यह पन्ना मैं दे रहा हूं उनका कुछ नाम भी है और काम भी. बरसों से हमारे दोस्त हैं. लेखक और समाजसेवी पिता के कारण बहुत कम उम्र में पत्रकारिता करने लगे. वे मानते थे कि यही रास्ता समाज को बदलने के लिए तलवार का काम करेगा. लेकिन पिछले आठ-दस सालों से कोई अखबार उन्हें नहीं रखता इसलिए अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए तरह-तरह के काम करते हैं. जैसे इस बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ रहे अपने एक मित्र का उन्होंने मीडिया प्रबंधन का काम देखा. इस दौरान उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है. यहां मैं उनकी ही डायरी के कुछ हिस्से दे रहा हूं. लेकिन आगे की कार्रवाई की रणनीति के तहत न उनका नाम दे रहा हूं और न ही डायरी में आये नाम.

डायरी में वे आगे लिखते हैं-

रात में .............के किसान से दिखते एक सज्जन आये. उन्होंने अपने अखबार को यह कहकर बेचने की कोशिश की कि नामांकन तक तो हमने फ्री खबरें देने का निर्णय लिया था. अब पैकेज ले लीजिए. कैसा पैकेज? तभी उनके पास ....... से फोन आने लगे. न्यूज इंचार्ज और विज्ञापन मैनेजर के. हमारा उम्मीदवार उन्हें मोटी मुर्गी लग रहा था. कभी हम भी चुनाव करने जाते थे, लेकिन इन पत्रकारों को देखकर तो मेरे होश उड़ गये. सबसे होशियार....के संवाददाता है. यहां कांशीराम जी का सिद्धांत काम कर रहा है. जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी. यहां दो पार्टियों वाला माडल काम कर रहा है. कुछ संवाददाता तो दो-दो माइक लेकर घूम रहे हैं. फोटोग्राफरों की भी चांदी है. पैसों के मुताबिक ही वे उम्मीदवारों की फोटो खींचते हैं. (20-04-09)

आज एक प्रमुख दैनिक के स्थानीय प्रतिनिधि अपने विज्ञापन इंचार्ज के साथ आये थे. उनके अखबार ने सभी उम्मीदवारों की खबरें छापी थी. निर्दलीय उम्मीदवार की तस्वीर गायब थी. संवाददाता कह रहे थे- मैंने खबर भेजी थी लेकिन वहां फलां जाति के संपादक हैं. छापेंगे ही नहीं. यानी पैकेज के बिना अखबार के खिड़की दरवाजे नहीं खुलेगें. (21-04-09)

एक स्थानीय अखबार ने पैकेज, रिचार्ज, विज्ञापनों के जरिए अखबार को मानने जैसे सभी प्रस्तावों पर पलीता लगा दिया. बेहद विनम्र और आने पर हर बार पैर छूनेवाले ....... ने स्थानीय संपादक को एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी. उसकी अपनी जेब ही फूलती जा रही है. स्थानीय संपादक एक जाति विशेष का है और दबंग उम्मीदवार भी उसी जाति का है. इस पत्रकार ने संपादक को समझाया कि हमने उससे डील की तो जातीय समीकरण बिगड़ सकता है. दूसरे उम्मीदवार जो मंत्री हैं, उनके बारे में कहा कि वे सरकारी विज्ञापन दिलवाते रहेंगे, उनसे क्या लेन-देन करना. दिल्ली में जाने-माने और खूब पहचान रखनेवाले एक उम्मीदवार के बारे में कहा कि जब उनसे मिलने गया तो वे फोन पर शोभना भरतिया से बात कर रहे थे. उनसे क्या पैकेज लिया जाए? पर असलियत यह है कि इस चतुर सुजान पत्रकार ने सबसे पैसा लिया. उसने जो पैसा लिया वह न संपादक को गया और न ही अखबार को. (25-04-09)

डायरी पढ़ने के बाद इस दोस्त से मैंने कवरेज का तरीका पूछा. सबेरे सब हमारे दफ्तर आते. उनके लिए नाश्ता, पीने का पानी और गाड़ी तैयार की जाती. भोजन का पैसा नकद दिया जाता था. तय रेट के हिसाब से रोज का खर्चा पानी अलग. चैनल वालो में छठे वेतन आयोग का वेतन पाने वाले दूरदर्शन के लोग भी होते थे. हमारी गाड़ियों से निकलने से पहले वे दूसरे उम्मीदवारों से भी प्रंबंध करते. किसी से पेट्रोल के पैसे लेते तो किसी से गाड़ी के. एक पत्रकार तो पैकेज का पैसा लेने के लिए रात दो बजे तक दरवाजे के बाहर बैठा रहा. यह सब सुनकर मैंने पूछा कि इसका मतलब यह है कि आपके चुनाव क्षेत्र के चुनाव से कोई खबर, फोटो ऐसी नहीं छपी जो पैकेज के बाहर हो? उन्होंने कहा कि एकाध अपवाद हो सकता है, नहीं तो सारा का सारा चुनाव कवरेज पैसे लेकर किया गया है. इसमें पत्रकारिता, पाठक को सूचना और राय देने की कोई जिम्मेदारी नहीं है. यह सरासर पैकेज का धंधा है, इसमें पाठक/वोटर को बुद्धू मान लिया गया है. जिसने अपना पैकेज रिचार्ज नहीं करवाया वह अखबार से गायब हो गया.

........................................................

बनारस से हमारे एक मित्र ने हिन्दुस्तान अखबार के 15 अप्रैल और 16 अप्रैल के नगर संस्करण की फोटोकापी भेजी है. पहला पन्ना रोज की ही तरह था. लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि पहले पन्ने की हर खबर और फोटो तुलसी को समर्पित थी. यह तुलसी यहां से लोकसभा प्रत्याशी हैं. कुछ हेडिंग देखिए- केवल वादा नहीं कर्म करने में विश्वास करते हैं-तुलसी (लीड स्टोरी) जाति धर्म नहीं सिर्फ विकास के लिए लड़ रहे हैं तुलसी (सेकेण्ड लीड स्टोरी) पूर्वांचल राज्य बनाकर विकास कराएंगे तुलसी (तीन कालम की खबर) किसानों की खुशहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता (बाटम न्यूज). इसके साथ ही चुनावी सभा को संबोधित करते हुए तुलसी की फोटो भी छपी है.

इस अखबार के पहले पेज को देखकर हंगामा खड़ा हो गया. इसके बाद दूसरे दिन 16 अप्रैल को हिन्दुस्तान के पहले पेज पर स्पष्टीकरण छपा- 'हिन्दुस्तान के चंदौली, मुगलसराय, वाराणसी नगर संस्करणों में बुधवार 15 अप्रैल 2009 को प्रकाशित पहला पृष्ठ वास्तव में एक राजनीतिक दल का चुनावी विज्ञापन है. उसमें प्रकाशित सामग्री का हिन्दुस्तान के संपादकीय विचारों से किसी प्रकार का तादात्म्य नहीं है- प्रमुख संपादक.'

पटना से हमारे एक और मित्र ने 16 अप्रैल 2009 के हिन्दुस्तान अखबार की फोटोकापी भेजी है. इसमें आठ कालम का बैनर शीर्षक है- कांग्रेस बिहार में इतिहास रचने को तैयार. पहले पेज की किसी खबर से इस बैनर लाईन का कुछ लेना-देना नहीं है. यानी यह किसी खबर का शीर्षक नहीं है. अब पाठक बूझे तो जाने कि यह टिकाऊ खबर है या बिकाऊ?

..............................................

और आखिर में दिल्ली के एक संपादक ने एक सत्यकथा सुनाई. दिल्ली से लगे एक राज्य के मुख्यमंत्री यह देखकर हैरान रह गये कि उनके राज्य के एक उम्मीदवार की एक सभा की खबर छप जाने के बाद उसी अखबार ने तीन दिन बाद उसी खबर को बाक्स में फिर से छापा. इसमें बताया गया कि लाखों की भीड़ थी. मुख्यमंत्री ने अखबार के मालिक को फोन किया कि यह क्या हो रहा है?मालिक ने कहा मालूम करके बताता हूं. दस मिनट बाद उनका फोन आया. 'हां, वह विज्ञापन है और ऐसे विज्ञापन हम छापते हैं.' मुख्यमंत्री ने अखबार मालिक को कहा कि तो ठीक है. कल मेरी तरफ से एक पहले पेज पर एक विज्ञापन छापिए कि यह अखबार झूठा है. पैसे लेकर विज्ञापन को खबर बनाकर छापता है..........पता नहीं उस विज्ञापन का क्या हुआ? अब तक किसी अखबार के पहले पन्ने पर दिखा तो नहीं. (कागद कारे)

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abhijeet tiwari on 10 May, 2009 13:14;13
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चोर-उच्चकों और इन पैसा लेकर खबर छपने वालों में
क्या कोई फर्क है ?
प्रभाषजी जी... कृपया हमें बताईये ..
ये देश किस गड्ढे में जानेवाला है....???
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dhiru singh on 10 May, 2009 14:12;10
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इसका कोई हल निकालिए वरना अखवार भी अपनी इज्ज़त खो बैठेंगे वैसे बची भी कहाँ है .
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Kapil Swami on 10 May, 2009 16:18;00
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बहुत बढ़ि‍या। नये के निर्माण के लिए पुराने का ध्‍वस्‍त होना बहुत जरूरी है।
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vicky g on 10 May, 2009 16:42;21
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Ab to Patrakar aur Patrakarita bhi......ho gaye.
Ab is desh ka kaun malik hai?
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Baba on 11 May, 2009 09:17;35
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mujhe Samajh main nahi aata ki Akhabar koi Samajsewa ke liye nahi nikalta hai...yeh Mission se Money Machine ban gaya hai.... jo log Virodh kar rahe hai... Un logo ne kabhi Jindagi man Apane paiso se Akhabar nahi nikala hai... kahte hai.. jab pani me Utaro to pata chalta hai ki kitana Gehara (deep) hai... Jab tak Hum Khud Practical nahi karenge, Taklif Pata nahi Chalegi... hum logo ki Adat hai... Payment nahi badi, Job Chhod do...Every year Payment main Increment hona kaha se milega yeh Sab... Khabaron ko Recharge karke...!
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संजय तिवारी on 11 May, 2009 10:45;23
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बाबा का सवाल बहुत सटीक है. क्या पत्रकार अपना पैकेज बढ़ाते जाएं और अखबारों से नैतिक बने रहने का उम्मीद कर सकते हैं? ज्यादा बड़ा काम तो नहीं लेकिन विस्फोट का संचालन करके छोटा-मोटा प्रकाशन मैं भी संचालित कर रहा हूं. हालांकि यहां जुड़नेवाले पत्रकार और लेखक आर्थिक रिश्ता नहीं रखते हैं लेकिन कई बार मुझे भी यह अहसास होता है कि अगर मैं पत्रकार हूं तो लिखने का पैसा कैसे ले सकता हूं?

यह बहुत जटिल प्रश्न है. लिखने-पढ़ने को रोजी रोटी बना लेने पर जनता के लिए ईमानदारी से काम करना बहुत मुश्किल होता है. फिर चारो ओर हवा ऐसी बह रही है कि पैसा तो चाहिए ही फिर काम कुछ भी करना पड़े.

अब मुश्किल यह है कि जब पैसा कमाना ही पत्रकारिता हो जाए तो कोई ऊपरी सीमा नहीं हो सकती. आज के अधिकांश पत्रकार यही कर रहे हैं. उनकी कमाई की कोई ऊपरी सीमा नहीं है. इसलिए संकट है. और यह लगातार गहराता जा रहा है. अगर पत्रकार पैकेज के लिए इधर-उधर घूमना बंद कर दे तो भी काफी सुधार अपने आप दिखने लगेगा बिना किसी खास प्रयास के.
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Baba on 11 May, 2009 16:24;46
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Very Good Sanjayji... Suvidhayen Hum Patrakaron ko chahiye... Aur vo bhi Har Sal.... Management Kaha se layega... Din par din Akhbaron ki Sankhya Bad rahi hai....Pahale Ek Roti ko do Newspaper Khate the... At to 10-12 Newspaper ho gaye hai... vo bhi Bade Banner ke... Ek Chhote City main...
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santosh jha on 11 May, 2009 17:35;43
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Dronacharya aur Eklavya ki tarah mera Shri Prabhash Joshi Jee se rishta hai. Aaj unka article padhkar bahut hi accha laga. Is article par koi comment karne ki himmat to main nahin kar sakta, lekin vichar to rakh hi sakta hoon.
Yahan sabse bari baat yah hai ki jab loktantra ke teenon stambh bhrastachaarroopi ghun se khokhle hote ja rahen hain to kathit chautha stambh isse kaise achoota rah sakta hai, woh bhi aadhunikata ke is daur mein. Bawajood iske janata sarvopari hai. Aaj ki aisi patrakarita ke khilaf janata ko hi aawaaj uthani hogi.Haan, kuch stapit lekhak bhi is kaam mein mahati bhoomika nibha sakte hain.

Santosh Jha
Sr. sub editor
Pratah Khabar
Guwahati
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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