वेब पत्रकारिता का बवंडर
31 मई 2007 को यशवंत सिंह जागरण समूह में कानपुर से स्थानांतरण करके दिल्ली आये थे. यहीं पर सबसे पहले उन्होंने एक ब्लाग शुरू किया जिसका नाम रखा भड़ास. दो साल बाद आज 31 मई को वे हिन्दी मीडिया की सबसे विवादास्पद और चर्चित वेबसाईट भड़ास4मीडिया के संचालक हैं जो मीडिया के रिपोर्टिंग पर केन्द्रित वेबसाईट है. जागरण की नौकरी छोड़ चुके यशवंत पूरी तरह से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं. दो साल के अंदर ही यशवंत सिंह और भड़ास4मीडिया दोनों ही हिन्दी मीडिया जगत में खासा चर्चित नाम हो गया है.
बतौर पत्रकार कभी जागरण और उसके बाद एक मोबाइल कंपनी में नौकरी करनेवाले यशवंत सिंह का उत्थान हिन्दी वेब मीडिया का उत्थान है? इस सवाल की समीक्षा में ही हिन्दी वेब-मीडिया की सारी संभवना छिपी हुई है. यशवंत सिंह की मीडिया वेबसाईट हिन्दी की पहली ऐसी गैर-घराना वेबसाईट है जो एलेक्सा रैंकिंग में एक लाख साईटों के पायदान पर पहुंच चुकी है. वे वह काम कर रहे हैं जो वेब मीडिया में व्यापक संभावना की ओर संकेत करता है. दिल्ली के एक छोटे से इलाके में दो कमरे के अपने दफ्तर में अपनी वेबसाईट को एक इंटरप्राईज बनाने में लगे यशवंत सिंह मानते हैं कि 'वेब माध्यम का भविष्य अच्छा हो सकता है लेकिन इसके विकास में सबसे बड़ी बाधा हिन्दी की गैर व्यवसायिक मानसिकता है.' लेकिन यशवंत की सफलता इस दिशा में अकेली सफलता की कहानी नहीं है.
व्यक्तिगत स्तर पर वेब को समाचार माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने का सबसे पहला प्रयास अहमदाबाद से तरकश नाम की वेबसाईट चलानेवाले बैंगाणी बंधुओं ने किया था. साल 2006 में उन्होंने तरकश की शुरूआत की थी जो आज एक बहुउद्येश्यीय पोर्टल बन चुका है. तरकश समूह के संचालक संजय बैंगाणी कहते हैं कि हमने जहां से शुरूआत की थी आज उससे बहुत आगे हैं. हिन्दी में तेजी से पाठकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है. लेकिन अभी जितना दिख रहा है वह शुरूआत भर है. बहुत जल्दी यह रफ्तार और तेज होगी. भारत में वेब साईट और पाठकों दोनों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा. कुछ ऐसा ही संकेत गूगल समूह के भारत में सीईओ शैलेष राव का भी है. शैलेष राव ने हाल में ही एक बातचीत में दावा किया था भारत में आनेवाले दिनों में कंटेट प्रोवाइडर की संख्या में तेजी से इजाफा होगा. जाहिर सी बात है ब्लाग के अलावा वेबसाईटों के निर्माण में भी तेजी आयेगी.
इंटरनेट पर हिन्दी मीडिया जगत जितना मौजूद है उसका बड़ा श्रेय हिन्दी ब्लागिंग को जाता है. हिन्दी ब्लागिंग न होती तो इंटरनेट पर हिन्दी का ऐसा तेज गति विकास संभव नहीं होता. ज्यादातर लोग जो आप निजी और व्यक्तिगत स्तर पर वेबसाईटों का प्रयोग कर रहे हैं वे ब्लागिंग के प्लेटफार्म से ही आगे बढ़े हैं. ब्लाग में संप्रेषण की संभवनाओं को खंगालने के बाद उन्हीं लोगों ने वेबसाईट और पोर्टल का प्रयोग किया जिन्हें इस माध्यम में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नजर आता है. जनवरी 2007 लोकमंच.कॉम की शुरूआत करनेवाले शशि सिंह बताते हैं "यह वेब का शुरूआती दौर है इसलिए लोगों में इसके प्रति उपेक्षा का भाव बना हुआ है. इसका मतलब यह नहीं है कि इस माध्यम में संभावना नहीं है. हिन्दी क्षेत्र नयी चीजों को स्वीकार करने में बहुत वक्त लगाता है." वे आगे बताते हैं कि 'मीडिया जगत में कंप्यूटर को प्रवेश मिलने में जो मुश्किल हुई वह बताता है कि हम तकनीकि को लेकर कितने दकियानूसी तरीके से सोचते हैं. लेकिन 20-22 साल बाद ही देखिए आज हम बिना कम्प्यूटर के प्रिंट मीडिया की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं." यशवंत सिंह भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं "जब पहली बार कंप्यूटर को मीडिया दफ्तरों में लाया गया तो सबसे ज्यादा विरोध पत्रकारों ने ही किया था. उन्हें लगता था कि इससे उनकी कलम खतरे में पड़ जाएगी. लेकिन समय के साथ सबकुछ अपने आप बदल गया.'
दुनिया के दूसरे हिस्सों की तर्ज पर ही हिन्दी में भी वेब का विकास हो रहा है. गूगल के सीईओ शैलेष राव भी मानते हैं कि वेब बहुत सस्ता प्रकाशन माध्यम है. इसलिए यहां प्रकाशन शुरू करने के लिए बड़ी पूंजी की कोई जरूरत नहीं होती है. हिन्दी में जिस तरह से वेबसाइटों का विस्तार हो रहा है वह बहुत जल्दी प्रकोप बन जाएगा. लॉ फर्म में अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर भारत भूषण अब मनुइन्फोसोल्युशन नामक फर्म चलाते हैं. इस फर्म के तहत वे वेबसाईटों का निर्माण करते हैं. लेकिन इस काम के साथ ही वे अपनी खुद की एक वेबसाईट प्रवक्ता.कॉम भी चलाते हैं जो समाचार और विचार को समर्पित है. असल में उनकी शुरूआत ही यहीं से हुई थी और बाद में उन्होंने वेबसाईट डिजाईन की संभावनाओं को देखते हुए अपना रूख उधर मोड़ दिया. दो साल पहले तक शौकिया तौर एचटीएमल आधारित वेब-पन्नों का निर्माण और शेयर्ड सर्वर के जरिए वेब होस्टिंग करनेवाले राकेश डुमरा अब जुमला और वर्डप्रेस आधारित वेबसाईटों का निर्माण करते हैं तथा अपने खुद के सर्वर पर वेबसाईटों को होस्ट करते हैं. राकेश डुमरा का यह व्यावसियक विस्तार हिन्दी में फैलते वेब जाल के कारण आया है. वे इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि अब इस दिशा में व्यावसायिक संभावनाएं पैदा हो रही है.
आधारभूत सेवा देनेवाले लोगों के लिए भले ही व्यावसायिक संभावनाएं पैदा हो रही हों लेकिन क्या वेबसाईट चलानेवाले लोगों के लिए इसमें व्यावसायिक संभवानना है? फिलहाल यह बहुत जटिल सवाल है जिसका जवाब हिन्दी वेब-पोर्टल के व्यापार में उतरे किसी नौसिखिए के पास नहीं है. हिन्दी अखबारों के स्थापित घरानों को छोड़ दें तो हिन्दी में जो भी साईट या पोर्टल के प्रयोग हो रहे हैं वे निजी तौर पर किये जा रहे प्रयोग हैं जिनके पीछे पूंजी की ताकत नहीं है. तो क्या आज उत्साह में जो लोग वेबसाईट या पोर्टल बनाकर आनलाईन माध्यम में उतर रहे हैं वे जल्द ही विदा भी हो जाएंगे? लोकमंच.कॉम के शशि सिंह कहते हैं 'बहुत लोग जाएंगे लेकिन जो बचे रह जाएंगे उनकी संख्या भी कम नहीं होगी. आखिरकार यह एक माध्यम है और इसमें वही टिकेगा जो यहां टिकना चाहेगा.' यशवंत सिंह का मानना है कि व्यवासायिक सोच से जो लोग काम करेंगे वही इस फील्ड में लंबी यात्रा कर सकेंगे. लेकिन हिन्दी पट्टी में दिक्कत यह है कि यहां व्यावसिक सोच को बहुत भद्दे तरीके से खारिज कर दिया जाता है. जो इस सोच से पार पा जाएगा वह टिकेगा, जो नहीं पार कर पायेगा वह विदा हो जाएगा."
तरकश.कॉम के संचालक संजय बैंगाणी की चिंता दूसरी है. वे मानते हैं कि व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ-साथ कन्टेट को लेकर बहुत सारे नये प्रयोग करने होंगे. आज इंटरनेट पर हिन्दी में जो कन्टेट आ रहे हैं वे ज्यादातर किसी काम के नहीं है. वे कहते हैं कि तरकश इस मायने में थोड़ा अलग इसलिए है कि हमारा जोर विज्ञान और तकनीकि विषयों पर है. वे कहते हैं कि हम समाचार भी प्रकाशित करते हैं कि तो हर समाचार पर अपने स्तर पर काम करते हैं फिर उसे प्रकाशित करते हैं. लेकिन आम तौर पर वेब के आज जो समाचार माध्यम उभर रहे हैं वे एक ही एजंसी की न्यूज चलाते हैं. इसलिए खबर तो लोगों को एक ही मिलती है, बतानेवालों की संख्या भले ही दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही हो.' संजय बैंगाड़ी की यह चिंता जायज है. लेकिन जैसा कि शशि सिंह कहते हैं शुरूआत में हर काम का यही अंजाम होता है. दिशा बनते देर लगती ही है.' यशवंत सिंह भी मानते हैं कि अगर हिन्दी वेब को अपने आप को सार्थक करना है तो उसे व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाना ही होगा." लेकिन इस व्यावसायिक दृष्टिकोण में सबसे बड़ी चुनौती वे बड़े खिलाड़ी हैं जिनके पास जनबल और धनबल दोनों हैं. निश्चित रूप से वेबसाईटों का यह रास्ता नये प्रयोगकर्ताओं के लिए आसान नहीं है लेकिन इतना कठिन भी नहीं है कि इस पर चला ही न जा सके. अच्छी बात यह है कि ऐसे प्रयोग केवल दिल्ली या बड़े महानगरो से ही नहीं बल्कि छोटे शहरों और कस्बों से भी हो रहे हैं, जो साफ तौर पर एक उठते बवंडर का संकेत दे रहे हैं.
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Digg
मैं देख रहा हूँ, हिन्दी लिखने वालों और अनुवादकों की माँग बढ़ रही है. मौका आगे है. व्यवसायिक सोच रखेगें तो समय हिन्दी वालों का है.
जनबल और धनबल दोनों के सम्यक समन्वय के साथ ' उद्देस ' बना रहे . न भूला जाय की ' money
is mother tincture for all activities , GOOD BAD OR UGLY .
हम एक बाज़ार में खड़े हैं ओर फ़िलहाल उसकी दिशा भी तय करने का सामर्थ्य , भले न रखते हों . लेकिन अगर 'अर्थ शास्त्र ' जान कर चलें तो
पायेंगे की अच्छे ' उद्देस ' के लिए भी अवसर हैं .संघर्ष तो जरूरी होगा ही , क्योंकि अभी हिन्दी का बाज़ार उतना नहीं बड़ा हुआ . लेकिन होकर रहेगा .हमें उसके लिए तैयार रहना होगा .
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