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आरूषि हत्याकाण्ड से चैनलों की चांदी

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आरूषि हत्याकाण्ड में असली गुनहगार तक सीबीआई भले ही अब तक न पहुंच पायी हो लेकिन मुद्दा बनानेवाले हिन्दी अंग्रेजी चैनलों को उनका प्रसाद मिल गया है.

टीवी रेटिंग प्वाईंट (टीआरपी) के जो ताजा आंकड़े जारी हुए हैं उनके अनुसार आरूषि की हत्या के बाद से ही टीवी ने जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया उसका सबसे बड़ा फायदा समाचार चैनलों को हुआ. 16 मई को आरूषि के हत्या की खबर सबसे पहले टीवी पर आयी थी. उसके बाद से ही लगातार टीवी चैनलों ने इस खबर को न केवल जिंदा रखा बल्कि एक दुखद हत्याकाण्ड को पुलिस ट्रायल की बजाय मीडिया ट्रायल में तब्दील कर दिया.

जब आरूषि की हत्या हुई उन्हीं दिनों आईपीएल के मैच चल रहे थे. आईपीएल के पागलपन में समाचार चैनल के दर्शक कम होने का खतरा था. लेकिन इसी बीच प्रकाश में आये आरूषि हत्याकाण्ड ने समाचार चैनलों को आईपीएल से लड़ने की संजीवनी दे दी. टैम और एमैप दोनों का कहना है कि आईपीएल मैचों के बीच भी आरूषि हत्याकाण्ड के कारण टीवी चैनल टीआरपी लपकने में कामयाब रहे. 23 मई को जिस दिन आरुषि के पिता राजेश तलवार को हत्या के अंदेशे में गिरफ्तार किया गया उस दिन मोहाली और हैदराबाद के बीच आईपीएल का मैच था. लेकिन इस मैच को टीवी पर जितने दर्शक मिले उससे ज्यादा दर्शकों को आरूषि हत्याकाण्ड की बदौलत हिन्दी समाचार चैनलों ने अपने साथ जोड़कर रखा. उस दौरान आईपीएल को 0.96 टीआरपी मिली तो पांच प्रमुख हिन्दी अंग्रेजी चैनलों को 1.0 प्वाईंट टीआरपी हासिल हुई. ये आंकड़ें एमैप (aMAP) के हैं. टैम (TAM) के आंकड़ें भी इससे मिलती-जुलती तस्वीर ही पेश कर रहे हैं. 

टैम के आंकड़े भी यही बताते हैं कि आईपीएल मैचों को 7.5 प्वाईंट टीआरपी हासिल हुई तो समाचार चैनलों को 9 प्वाईंट टीआरपी मिली. टैम का कहना है कि इस हत्याकाण्ड के कारण सबसे ज्यादा 2 प्वाईंट की टीआरपी बढ़ोत्तरी हिन्दी चैनलों को मिली. हिन्दुस्तान टाईम्स ने एक चैनल हेड के हवाले से कहा है कि "मेरे लिए उस समय खबरों के लिहाज से आरूषि हत्याकाण्ड महत्वूर्ण था. इसलिए सभी चैनलों ने दिनरात आरूषि हत्याकाण्ड के विभिन्न पहलुओं से लोगों को लगातार अवगत कराया. इसका नतीजा यह हुआ कि चैनलों की टीआरपी बढ़ गयी."

आरूषि कोई चौदह साल की लड़की थी और उसकी हत्या एक दर्दनाक खबर थी. लेकिन इस खबर को चैनलों ने इवेन्ट बना दिया. एक ऐसा इवेन्ट जहां खून से सने हाथों तक पहुंचने के लिए अपने दफ्तरों में अस्थाई ट्रायल कोर्ट शुरू कर दिये गये. अपराध संवाददाताओं की टोलियों के सामने बस एक ही मुद्दा था कि वे जहां तक कल्पना कर सकते हों करें और सच-झूठ का ऐसा तिलिस्म खड़ा कर दें कि इससे निकलना लोगों के लिए मुश्किल हो. और चैनल इसमें कामयाब रहे. उसने अपने दर्शकों को वहीं टांगे रखा जहां से टीआरपी की बारिश हो रही थी. अब इस बात की हकीकत सबके सामने है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया वही मुद्दा बनाता है जिससे अंततः उसकी झोली भरती हो. बाकी देश जाए ठेंगे पर, क्या देश का ठेका ले रखा है चैनलवालों. फिलहाल तो आरूषि की लाश पीटने का खेल अभी भी चैनलों ने बंद नहीं किया है. अब बंद भी कर दें तो क्या नुकसान होगा. आईपीएल के मुश्किल दौर से उस मासूम की हत्या ने तो टीवी चैनलों को उबार ही लिया.

दासमुंशी उवाच

आरूषि हत्याकाण्ड में टीवी चैनलों की आलोचना करते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारणमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने गुरूवार को कहा कि "अनुचित होड़ के चक्कर में हिन्दी चैनल बेकार की खबरें दिखाते रहते हैं. ऐसा लगता है कि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में मीडिया रास्ते से भटक गया है. इस तरह के गंभीर मामले (आरूषि हत्याकाण्ड) में मीडिया को जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए. इस (आरूषि हत्याकाण्ड) में मीडिया ने जो रूख अख्तियार किया उसे संवेदनशील नहीं कहा जा सकता." 

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mahesh on 13 June, 2008 16:28;45
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aapne jo kuch bhe lekha hai voh 100% sahe hai magar easke lye kya hum sab responsible nahe hai jo eas tarah ke khabre dekhane walo ka virodh nahe karte
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visfot .com on 13 June, 2008 18:47;44
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जरूर, महेश जी देखनेवाले जिम्मेदार तो होते ही है लेकिन टीवी के साथ मुश्किल यह है कि वहां दर्शकों का मन लेने का कोई मैकेनिज्म नहीं है.
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tulsi singh bisht on 16 June, 2008 16:24;22
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आरुषि हत्याकाण्ड क्या हुआ लगता है कोई बहुत बड़ा विस्फोट हो गया। अगर इस प्रकार की कोई घटना किसी निम्न तबके की होती तो शायद खबर भी नहीं छपती। माना हत्याकाण्ड काफी गंभीर है लेकिन एक ही बात को लेकर सभी चैनल हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं जैसे उनको कोई बहुत बड़ा सुराग मिल गया है या कोई खजाना। मैंने काफी सारे केस देखें हैं जिन्हें आज तक किसी भी चैनल ने हाथ धोकर पीछे नहीं पड़े - लेकिन इस आरुषि हत्याकाण्ड को लेकर चैनल वालों ने तो कमाल ही कर दिया। मेरे हिसाब से एक बात को अगर दिखाया जाए तो कम से कम शब्द और साफ तरीके से दिखाया जाए न कि उसे लगातार दिखाना। किसी को ये विचार गलत लगे तो माफ करना -लेकिन इस भारत में और भी आरुषि हत्याकाण्ड है जिनका कोई जिक्र नहीं किया।
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anand rai on 17 June, 2008 12:31;49
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crime reporting kisi jasoos ke kam se bhi bada kam hai. ati utsah men bahut kuch choot gayaa hai
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kaynat qazi on 08 September, 2008 15:04;25
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arushi hatya kand ko jis tarhan sabhi news chennals ne dikhaya hai usse to lagta hai ki khabar likhne walon ke aage koi aas aulad nahi hai....us masoom 13 saal ki bacchi ko kis kis ke sath nahi joda gaya...koi natyarupantaran me kuch dikha raha hai,to koi keh raha hai ki uska uske baap ke saath najaiz sambandh tha...had ho gai...1 pura parivar tabah ho gaya.aur media ne khoob maze liye...aaj koi ye ye poochne wala nahi hai ki jo kuch kahaniya in ceennals par dikhai gain uska koi chashmded gawah koi tha bhi ya nahi....bohot hi sharm naak raha ye poora prakaran.
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