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नयी संभावनाओं का नया मीडिया

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भविष्य का मीडिया सीमा बनाने नहीं, मिटाने के बारे में है। हम इतिहास के उस दौर में हैं, जहां सूचना के केंद्रीकरण या नियंत्रण की मानसिकता ही खतरे में है।

ऐसा रुपांतरकारी बदलाव सदी में एकाध बार ही होता है। जनसंचार और जनसूचना की दुनिया में बरसों तक प्रिंट मीडिया का राज चलता रहा। पिछली सदी के आखिरी बरसों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उसकी शांति भंग की, लेकिन एक-दूसरे के लिए खतरा बनने की बजाय दोनों साथ-साथ आगे बढ़ने लगे। लेकिन अब मीडिया में जो नई लहर उठी है, वह मीडिया के परंपरागत दायरों को तोड़ती हुई इन फर्कों को मिटा रही है। यह नया मीडिया हमारी दुनिया को जीने और सोचने के अंदाज को, सूचना पाने और बरतने के तरीके को पूरी तरह बदल डालने पर आमादा है।

नया मीडिया ऐसा मीडिया है, जिसमें कंटेंट और प्रेजेंटेशन में कंप्यूटर या डिजिटल टेक्नॉलजी की भूमिका रहती है। इंटरनेट के फैलाव के साथ इसका असर बढ़ता चला गया है। मीडिया में तकनीक की दखल से आया यह बदलाव दूरगामी असर डालने वाला है। यह मीडिया की अब तक की अवधारणाओं को भी बदल देता है, क्योंकि यह इंटरेक्टिव है। पाठक या दर्शक के साथ इसका रिश्ता एकदम सीधा है। परंपरागत मीडिया के 'एक प्रकाशक, अनेक पाठक' वाले तानाशाही ढांचे को तोड़कर यह 'अनेक प्रकाशक, अनेक पाठक' के लोकतांत्रिक संसार में ले जाता है। यही बेसिक फर्क है जो मीडिया और इसकी प्रतिक्रिया को पूरी तरह बदल सकता है। मीडिया के लिए यह एक चुनौती है और एक मौका भी। इसके जरिए मीडिया को अपना विस्तार करने, असर पैदा करने, पाठक से जुड़ने और फायदा कमाने का मौका मिला है। भविष्य पर नजर रखने वाला कोई भी संस्थान इस रोमांचक, सीमाहीन और तेज मीडियम से परहेज करके नहीं रह सकता।

यह दौड़ शुरू हो चुकी है। प्रिंट और टीवी की कैद से बाहर निकलकर हर अखबार इंटरनेट पर आ रहा है, बीबीसी अपने 12 लाख घंटे के प्रोग्राम वेब पर डालने में जुटा है, सिटिजन रिपोर्टर चलन में आ रहे हैं, लाखों किताबों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है और बेखौफ कमेंट्स के लिए पाठकों को ब्लॉग का मंच मुहैया किया जा रहा है। सैकड़ों साल का बुजुर्ग मीडिया तकनीक की वियाग्रा से ताकत पाकर अचानक छैल-छबीला बन बैठा है। यह बदलाव का ऐसा दौर है, जिसमें शामिल न होना आत्मघाती हो सकता है। बीबीसी की न्यू मीडिया शाखा के मुखिया एश्ले हाइफील्ड का कहना है कि पांच साल बाद वही मीडिया संस्थान बचेंगे जो तेज होंगे। इसके लिए अभी से तैयार होना होगा। वरना डिजिटल डायनासोर बन जाने का खतरा है।

भारतीय संदर्भ में यह बात शायद अतिशयोक्ति लगे, क्योंकि यहां प्रिंट, टीवी और रेडियो, तीनों ही का वैसे ही विस्तार हो रहा है जैसे न्यू मीडिया का। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन में पुराने मीडिया के लिए न्यू मीडिया सचमुच चुनौती बन चुका है। अमेरिकी ऑडिट ब्यूरो के मुताबिक पिछले एक साल में न्यू यॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज डे जैसे अखबारों के सर्कुलेशन में पांच पर्सेंट की गिरावट आई है। इसके बरक्स अखबारों की वेबसाइटों पर पाठकों की तादाद छह पर्सेंट बढ़ गई है। क्या यह ओल्ड मीडिया से न्यू मीडिया की ओर शिफ्ट का संकेत है? क्या यह बात भारत पर भी लागू होगी? फौरी तौर पर तो नहीं, क्योंकि मीडिया ट्रेंड्स के मामले में हम पश्चिम से कुछ साल पीछे चल रहे हैं।

पश्चिमी देशों में समाज के मूल यानी मोहल्लों तक से अखबार निकल रहे हैं। यह ट्रेंड अब तक भारत नहीं पहुंचा है और वहां इसकी विदाई की भी तैयारी हो गई है। मोबाइल फोन पर थ्री-जी सर्विस की हमारे यहां कब शुरुआत होगी यह अभी साफ नहीं है, जबकि पश्चिम में यह बीते जमाने की बात हो गई है। लेकिन न्यू मीडिया का किस्सा अलग है। वह पश्चिम के साथ-साथ यहां आया है और शुरुआती सुस्ती के बाद उसने रफ्तार पकड़ ली है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की तादाद सितम्बर 2006 में 3.22 करोड़ थी, जो एक साल बाद 4.6 करोड़ हो गई। एक साल में 40 पर्सेंट का इजाफा मायने रखता है। इससे अंदाजा लगाइए कि भविष्य में क्या होगा।

ऐसे में नये मीडिया को वैकल्पिक मीडिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह कोई छोटी-मोटी हलचल भी नहीं है। यह अब तक के मीडिया के सभी प्रकारों से बड़ा, ताकतवर और तकनीक समृद्ध है। उसमें पारंपरिक मीडिया को समा लेने की काबिलियत है। लेकिन यह दुश्मन नहीं है, क्योंकि यह सभी के लिए उपलब्ध है। आप चाहें तो इसे मीडिया का मीडियम कह सकते हैं। यह सूचनाओं को सीमाओं से आजाद कर देता है। यह हमें सत्ता की दखल के पार ले जाता है। यह कई तरह के मीडिया को एक साथ लाता है, बिना उनकी पहचान गंवाए और उन्हें पहले से ज्यादा असरदार बना देता है। एक ही वेब पेज पर खबर, उससे जुड़े विडियो, फोटो, पिछली खबर के लिंक, बैकग्राउंड, कमेंट्स और बहस, यह काबिलियत पुराने मीडिया में नहीं थी। वह सूचना के अनुभव को इकहरे रूप में पेश करता था।

एक खुला और काफी हद तक नियंत्रण मुक्त मीडिया होने के नाते इसके कंटेंट, क्वॉलिटी और साख को लेकर कुछ सीमाएं हैं। ये सीमाएं अतिरिक्त जागरूकता की मांग करती हैं। लेकिन इसका फैलाव इतना ज्यादा है कि इसके जादू से बचा नहीं जा सकता। यह ई-मेल से लेकर सर्च इंजन, सॉफ्टवेयर डाउनलोड, वीडियो साइट, न्यूज, ई-कॉमर्स, फोटो शेयरिंग, चैट, कम्युनिटी और ब्लॉग तक फैला है। इसका दायरा खबर से ज्यादा व्यापक है। ब्रिटेन में नये मीडिया के ताजा सर्वे के मुताबिक टॉप बीस में से सिर्फ सात वेबसाइटें ही खबरों से जुड़ी हैं।

भविष्य का मीडिया सीमाओं के बारे में नहीं, सीमाएं मिटाने के बारे में है। हम इतिहास के उस दौर में हैं, जहां सूचना के केंद्रीकरण या नियंत्रण की मानसिकता ही खतरे में है। शेन बोमैन और क्रिस विलिस के शब्दों में कहें तो खबरों के चौकीदार के रूप में पारंपरिक मीडिया के रोल को सिर्फ तकनीक से ही नहीं, अपने उपयोगकर्ता से भी खतरा है। न्यू मीडिया का सबसे बड़ा योगदान ही शायद यह है कि उसने उपभोक्ता को उत्पादक बना दिया है। यह पहला मीडिया है, जिसमें सूचना हर तरह की मोनोपली से आजाद हो जाएगी। इससे लोकतंत्र को अपने सच्चे रूप में सामने आने में मदद मिलेगी। जाहिर है, नया मीडिया नये संसार का दरवाजा खोल रहा है।

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RAVINDRA VYAS on 31 May, 2008 23:43;51
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excilent
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balkishan on 01 June, 2008 00:34;26
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जबरदस्त आलेख.
विचारोत्तेजक विश्लेषण.
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Dr. Chandrakumar Jain on 01 June, 2008 11:29;43
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शुक्रिया ब्लॉगवाणी का जिसके ज़रिए
यहाँ तक पहुँच सका.
बालेंदु जी उच्च शिक्षा के सरकारी महकमे में
आने से पहले, बरसों पत्रकारिता की है मैने,
लेकिन आज भी
आपकी क़लम का मुरीद हूँ.
बहरहाल नए मीडिया पर सार गर्भ जानकारी
और उसके भविष्य व प्रभाव पर
आपकी नज़र से बहुत कुछ नया देख सका.
आभार ==========================
डा.चंद्रकुमार जैन
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ganesh joshi on 04 November, 2009 01:04;38
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sir
lekh aaj ke samay ko dekhate huye aaikhai khol deta hai.
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image बालेन्दु दाधीच माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.
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