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धर्मों के बहुराष्ट्रीयकरण की सियासत

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किसी एक देश में घटने वाली घटनाओं की गूंज-अनुगूंज अब, धार्मिक आधार पाकर, दूसरे कई देशों में सुनाई देनी शुरू हो गई है। बहुराष्ट्रीय होते इन और अन्य बहुत से धर्मों-संप्रदायों की एक और खासियत यह है कि इनकी संस्थाओं की चंदों-अनुदानों से पाई गई सार्वजनिक संपत्ति का निजीकरण होता रहता है, जिससे इन्हें सीमित किस्म की `आत्मशासी´ व्यवस्था मिल जाती है। इसीलिए इन संस्थाओं से जुड़ी किसी भी अप्रिय घटना की वजह से जो प्रतिक्रिया होती है-गुस्सा और विरोध सामने आता है- वह भी `संपत्ति´ और `व्यवस्था´ पर फूटता है। एक अनुमान के अनुसार हाल में धार्मिक गुरू के अपमान के विरोध में हुए प्रदर्शनों के कारण पंजाब में चार दिनों में सत्तर हजार करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ और इन धर्मों की बहुराष्ट्रीयता से अहसास होता है कि जैसे इनसे जुड़े मसले पूरी मानवजाति के साझे मसले हो।

इस अहसास की पुख्तगी और एक ठोस रूप देने के लिए कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के नए कानून भी जिम्मेवार है, जो आरंभ में विद्रोही और `मिलिटेंट´ किस्म के धार्मिक-सांप्रदायिक तत्वों को, `सभ्य और आधुनिक´ कहलाने वाले विकसित राष्ट्रों की नवऔपनिवेशिक सियायत के तहत शरण देने में `वैधता´ की मर्यादा को भी पार करने का आधार बनते रहे।

इसका मतलब यह है कि मुख्य रूप से पूर्व-उपनिवेशों या तीसरी दुनिया के अनेक अविकसित देशों से ताल्लुक रखने वाले धर्मों-संप्रदायों को बहुराष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए वे हालात जिम्मेवार हैं- जिन्हें हम पिछले दो-तीन दशकों में, वित्तीय पूंजीवाद के सह-समांतर शक्ल और ताकत पाने वाले उत्तर- उपनिवेशवाद के रूप में देखते हैं। यह दौर आर्थिक धरातल पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वैश्विक नेटवर्क के स्थापित होने का दौर ही नहीं है, इसके सांस्कृतिक पहलू भी इसी दौर में अपनी अलग तरह की शक्ल पाते हैं। इसका विवेचन और इसकी जमीन की तलाश भी इसीलिए मौजूं और जरूरी हो गई है और इस तलाश की सतह को भेदकर हम अगर गहरे में उतरने की हिम्मत दिखाते हैं तो एक बड़ा सवाल हमारे सामने मौजूद हो जाता है कि क्या किसी अर्थ में यह सब उस मध्यकालीन विरासत से छुटकारा पाने की भूमिका तो नहीं, जिसे हम इन धमो±-संप्रदायों की संरचना की तरह देखते हैं?

पिछले तीन दशक के इस उत्तर-औपनिवेशिक दौर के इतिहास को ईरान की सांस्कृतिक (धार्मिक) क्रांति के बाद धीरे-धीरे अमेरिकी-इराक युद्ध की स्थितियों तक चले आने से जुड़े उतार-चढ़ावों की पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। इजराइल का फिलस्तीन पर वर्चस्व और अफगानिस्तान की नाटकीय सत्ता परिवर्तनों में इस इतिहास की व्याख्या करने वाला अर्थबोध प्रकट होता देखा जा सकता है। शुरूआती दौर में ईरान और अफगानी तालिबान, एक तरह के `आत्म-मुक्ति वाले´ प्रगतिशील इंकलाब की प्रवृत्तियों से युक्त देखे और दिखाए जाते हैं। यूरो-अमेरिकी, अर्थ और सत्ता का तंत्रा इसी दौर में अपने `सांस्कृतिक-उपनिवेशों´ के बहुराष्ट्रीयकरण की भूमिका तैयार करता है। मगर दूसरे राष्ट्रों में केंद्रित धर्म-संस्थाओं को दूर से कठपुतली-संस्थाओं की तरह चलाना और नियंत्रित करना जल्द ही असंभव मालूम होने लगता है। यही नहीं, ये धर्म-संस्थाएं इस दौर में यूरोप और अमेरिका के बहुत से देशों में, माकूल हालात पाकर, अपनी उप-संस्थाएं खड़ी करने में कामयाब हो जाती हैं।

यों, दूसरे विश्वयुद्ध तक के औपनिवेशक दौर में ही, पूर्व उपनिवेशों की बहुत-सी धर्म संस्थाएं, यूरोप और अमेरिका में अपने उपकेंद्र में बनाना आरंभ कर देते हैं, पर प्रवासी संस्कृति के तौर पर वे `सबाल्टर्न´ (दोयम) किस्म की सत्ता से भी विहीन रहती हैं और `व्यक्तिगत स्वातंत्र्य´ की अभिव्यक्ति का आधार भर मालूम पड़ती है। लेकिन इस उत्तर औपनिवेशिक दौर में ये सांस्कृतिक उपकेंद्र सबाल्टर्न सत्ता से लैस होकर प्रवासी अस्मिता को सियासी `स्पेस´ प्रदान करने तक का रास्ता दिखाने लगते हैं। इस औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक इतिहास के बीच यानी 1885 से लेकर 1970-73 तक के काल में गैर औपनिवेशीकरण की संक्रमणकालीन प्रक्रियाएं चलती हैं। यह वह कालखंड है- जब एक-एक करके दुनिया के लगभग सारे पूर्व उपनिवेश आजाद होते चले जाते हैं। हालांकि यह सियासी आजादी, अधूरी आजादी ही साबित होती है और नवऔपनिवेशक आर्थिक और सांस्कृतिक सत्तातंत्र अपने पांव पसारने लगता है।

औपनिवेशिक गुलामी वाले दौर में धर्म-संप्रदाय गुलाम देशों की जनता को बांटकर, उन्हें आपस में लड़वाकर विदेशी हुकूमतों को बनाए रखने के लिए एक वजह प्रदान करते थे। विदेशी शासक अमन-अमान के लिए और `कानून के राज´ के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते थे और खुद ही सांप्रदायिक विभाजनों की आग को भड़का कर, उस पर अपनी रोटियां सेंकते थे। पर औपनिवेशिक दासता का दौर बीत जाने के बाद, यह सांप्रदायिक सियासत `बहुराष्ट्रीय´ रूप लेकर जब नए रूप में जिंदा होती है तो हम पाते हैं कि यह पहले से भी कहीं ज्यादा बड़ी विकृति को जन्म देने का आधार बनती है। धार्मिक-सांप्रदायिक आधार पर देशों का जो अंतर्विभाजन था, वह बहुराष्ट्रीय रूप लेकर अपने मूल-राष्ट्रों को तो कमजोर करता ही है, पर अपने बहुराष्ट्रीय रूप में वह विस्तार पाकर एक ऐसी स्थिति को जन्म देता है, जिसे हंटिंग्टन ने `सभ्यताओं के संघर्ष´ का नाम दिया था।

हंटिंग्टन का `सभ्यताओं के संघर्ष´ वाला सिद्धांत, उपयुZक्त जटिल हालात का सरलीकरण करता है, इसलिए उस पर खासे शोर-शराबे के बाद अब ज्यादातर चिंतक उस पर खास तवज्जो नहीं देते। पर उससे इस बात की खबर जरूर मिलती है कि जिसे यूरो-अमेरिकी सभ्यता के `पश्चिमी मॉडल´ की तरह पेश किया जाता है, वह गहरे में `ईसाई होने और बने रहने की धर्म-कुंठा´ से कितनी बुरी तरह ग्रस्त है। औपनिवेशिक विस्तारवाद के दौर में मिशनरियों के द्वारा ईसाई धर्म का एक तरह का `अंतरराष्ट्रीयकरण´ किया गयां सांस्कृतिक धरातल पर ईसाई धर्म का जो वर्चस्वी स्थान है, वह यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवादी सत्तातंत्र को `धर्मनिरपेक्ष´ होने-दिखने की छूट देता है।
ईसाई धर्म को सत्ता के संरक्षण की खास जरूरत नहीं-कम से कम सीधे तौर पर तो एकदम नहीं, पर निजी धरातल पर शासकों के ईसाई होने से ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में अपने आप एक शक्ति आ जाती है। इसलिए ये जो साम्राज्यवादी सत्ताएं थीं, उन्होंने अपने धर्म-विस्तारवादी स्वरूप को प्रजातंत्र और वैज्ञानिक विकास वाले चेहरों के पीछे छिपाए रखा। ईसाई धर्म प्रचारकों ने दुनिया भर के दूर-दूर के दुर्गम प्रदेशों तक पहुंचकर वहां स्कूल और अस्पताल खोले और अपने गिरजाघरों की खातिर एक सामाजिक वैधता और विश्वसनीयता को निर्मित किया। इस तरह ईसाई धर्म, एक तरह से पूरी दुनिया में, एक सामाजिक निर्मित की प्रक्रिया का हिस्सा होकर फैला और उसने साम्राज्यवादी सत्ता तंत्र को मजबूत करने और उपनिवेशितों द्वारा स्वीकार किए जाने लायक बनाने में मदद की।

इससे दुनिया भर में एक बहु सांस्कृतिक परिदृश्य पैदा हुआ। पर वे जो स्थानीय धर्म-संस्कृतियां थीं, उन्हें `बहुराष्ट्रीय´ होने की मौजूदा स्थिति तक आने में कई सदियां लग गई। इसलिए जब यूरो-अमेरिकी गठबंधन को इराक और अफगानिस्तान की लड़ाइयों में उतरना पड़ा तो उसका सामना इसी `बहुसांस्कृतिक´ कोटि के प्रतिरोध से भी हुआ। सीधी लड़ाई में कमजोर पड़ने वाले ये इस्लामी देश अपने प्रतिरोध को कारगर बनाने के लिए दहशतपसंदों का सहारा लेने को मजबूर हुए। आतंकवादी गतिविधियों का क्षेत्र किसी एक या दो देशों तक महदूद नहीं था। वह तो अपने इसी बहुराष्ट्रीय रूप की बदौलत सीधे यूरोपीय और अमेरिकी समाजों की अंदरूनी संरचनाओं में भी घुसपैठ करने की जमीन पाने लायक हो गया था। नतीजतन, यूरो-अमेरिकी गठबंधन को इस्लामी मुल्कों को ही आतंकवादी मुल्कों के रूप में देखना आरंभ करना पड़ा। सीधी लड़ाई, जल्द ही एक बहुराष्ट्रीय जंग में बदल गई। अमेरिका के नेतृत्व में पूरी दुनिया से आतंकवाद के खात्मे के लिए जंग के ऐलान का बिगुल बजा दिया गया।

प्रतिरोध के लिए आतंक की अपना मुख्य हथियार बनाने की बात इस पूरे बहुराष्ट्रीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर लागू होती है। आतंक का मतलब होता है कि भले ही `दुश्मन´ आमने-सामने की लड़ाई में कहीं नहीं है, पर जो सामने है उसे नष्ट करके, दुश्मन को अपनी संहारक शक्ति का परिचय दे दिया जाए। इसलिए आतंकवादी संपत्ति का विनाश करते हैं ओर जो सामने पड़ जाए, उसे ही मारने का काम कर दिखाते हैं, ताकि उन्हें बचाने के लिए छिपा हुआ दुश्मन, व्यवस्था कायम करने के नाम पर सामने आ सके। जन और जन-संपत्ति, गोया एक प्रतीक हो गए हैं, व्यवस्था को नष्ट करने के इरादों के लिए `प्रतीक निशानों´ की तरह, जिन पर गोलियां दागी जा सकती है। और जो बातें ज्यादा जिक्र करने लायक है, वह यह है कि ऐसा प्रतीक विनाश अब केवल आतंकवादी संगठनों के द्वारा नहीं होता, सामान्य जनसमुदाय भी क्षोभ के हालात में इसी तरह की आतिर्कक हिंसा और तोड़फोड़ पर उतारू होता दिखाई देने लगा है।

गोया संस्कृतियों या धर्मों का बहुराष्ट्रीय रूप अब जन-आतंककारी प्रवृत्तियों का शिकार होने की हद तक विकृत और पतनशील होता दिखाई देता है। कई वाम चिंतकों को लगता है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों की नवसाम्राज्यवादी नीतियों और इरादों को चुनौती देने में आज के दौर में अगर कोई समर्थ है तो वह इस्लाम से जुड़े प्रतिरोधी संगठनों के अलावा और कोई नहीं है। इसलिए वे इस्लाम में मौजूद प्रगतिशील तत्वों को देखने-पहचाने की बात करते हैं, पर यह विचार खतरे से खाली नहीं, क्योंकि यह इस्लाम के बहुराष्ट्रीयकरण के साथ पनपे उसके विकृत और पतनशील आतंकवादी चेहरे के अमानवीय रूप का नजरअंदाज कर सकता है। लड़ाई जब और जितनी परोक्ष होती है, नाकामयाब होने की कुंठा उसे इतना ही घिनौना और मानवविरोधी बनाती है और दूसरी बात यह भी है कि धर्मों की जो `मध्यकालीनता´ है, वह इतिहास को पीछे की ओर ज्यादा मोड़ती है, भविष्य की ओर कम प्रशस्त करती है। (जनसत्ता)

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