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ताकि फिर न हो कोई और कंधमाल

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पिछले साल उड़ीसा के कंधमाल जिले में `ईसाई समुदाय´ के विरुद्ध हुए दंगों की वजह से देश को बहुत बदनामी झेलनी पड़ी। पोप बेनेडिक्ट ने इन दगों पर रोम में कड़ी प्रतिक्रिया दी। इटली की सरकार ने भारतीय राजदूत को तलब कर सफाई मांगी, योरुपीयन यूनीयन ने अलग से शोर मचाया एवं अमेरिका के अंतराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने इन दंगों की जांच के लिए भारत आने की इजाजत मांगी जो उसे अभी तक नही दी गई है। भारतीय चर्च ने भी मौके का लाभ उठाते हुए देश भर के कैथोलिक स्कूलों को बंद कर सरकार को ब्लैकमैल करते हुए झुकने पर मजबूर कर दिया। आखिर यह सब क्यों किया गया?

मकसद एक ही था इस बार ईसाइयों पर हो रहे हमलों को `धर्मांतरण´ से जोड़कर देखा जा रहा था और भारतीय चर्च और उसके विदेशी `आका´ यह कभी नही चाहते थे कि समाज या मीडिया उन पर अगुंली उठाए।

उड़ीसा के कंधमाल में 84 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद भड़के दुर्भाग्यपूर्ण दंगों को `धर्मातंरण´ से जोड़ा जाने लगा था। क्योंकि स्वामी लक्ष्मणानंद चर्च की गतिविधियों का विरोध कर रहे थे। दूसरा, जिले में ईसाई मिशनरियों एवं उनके अनुयायियों की संख्या में लगातार होने वाली बढ़ोतरी चर्च को कठघरे में खड़ा कर रही थी। कंधमाल के ईसाइयों पर हुए हमले निंदनीय है इन हमलों के कारण 43 बेकसूर लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। सैकड़ों लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए। हालांकि राहत शिवरों में रहने वाले विस्थापित ईसाइयों के नाम पर दुनिया भर में भारतीय चर्च नेताओं ने अनुदान इकट्ठा किया और उनके अपने गांवों में लौटने के कार्य में बार-बार अड़गा लगया गया। शायद उन्हें डर था कि राहत शिविर बंद हो जाने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही आर्थिक मदद भी बंद हो जाएगी। हालांकि विदेशों से मिलने वाली सहयाता से विस्थापित ईसाइयों का कितना भला होगा यह तो वक्त ही बताएगा।

आज ईसाइयत का प्रचार प्रसार एक व्ययपार बन गया है भारतीय चर्च अपने विदेशी आकाओं एवं दानदताओं की मदद से भारत को ईसाइयत के झंडें के नीचे लाने के लिए हर हंथकंडा अपना रहा है। गरीब हिन्दुओं, दलित एवं आदिवासी वर्गों का धर्मांतरण कर चर्च के पादरी अपना उल्लू सीधा कर रहे है। इस कार्य को इतने सधे हुए तरीके से किया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ पता नही चलता। लेकिन आसपास के लोग इसके बारे में बेखूखी जानते एवं समझते है यही कारण है कि जैसे जैसे ईसाइयत का प्रचार जोर पकड़ रहा है उसी तेजी से ईसाई पादरियों एवं गिराजाघरों के विरुद्ध स्वर भी उठने लगे है। इसकी परणिति कहीं कहीं हिंसा के रुप में भी होती है।

उड़ीसा सरकार ने कंधमाल में हुई हिंसा की जांच के लिए न्यायाधीश एस सी मोहपात्रा की अगुवाई में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था उसने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंपते हुए हिंसा के लिए धर्मपरिर्वतन - पुन: धर्मपरिवर्तन एवं फर्जी जाति प्रमाणपत्र, भूमि विवाद को जिम्मेदार माना है। भारतीय चर्च नेताओं और उसके विदेशी अकाओं को इस रिपोर्ट से निराशा हाथ लगी है। क्योंकि आयोग ने `राष्ट्रीय स्वयंसेवक सघं एवं अन्य हिन्दू नेताओं एवं संगठनों के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की है। शुरू से ही इस संघर्ष की असली वजह `फर्जी जाति प्रमाणपत्रों´ एवं तेजी से हो रहे धर्मातंरण को माना जा रहा था। कई चर्च नेता पुन:धर्मांतरण को भी धर्मपरिवर्तन की श्रेणी में रखने की बात करते है लेकिन वे यह मानने को तैयार नहीं है कि अगर धर्मातंरण नही होगा तो पुनर्धामन्तरण अपने आप रुक जाएगा। दुनिया जानती है किचर्च के पादरी ईसाइयत के नाम पर व्यापार कर रहे है। देश भर में अनुसूचित जातियों से धर्मांतरित लोगों को तो चर्च दस्तावेजों में ईसाई दिखाया जा रहा है परन्तु सरकारी रिकार्ड एवं सरकारी जनगनणा में वे आज भी हिन्दू की श्रेणी में आते है। चर्च नेता अपने लाभ के लिए उन्हें दो धर्म एवं एक जाति में रहने के लिए अपना मौन समर्थन दे रहे है इससे उन्हें लाभ भी मिल रहा है जब भी उन पर धर्मांतरित गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता है तो वे तुंरत राष्ट्रीय जनगनणा के आंकड़े गिनाने लगते है कि अभी तो हम 2.5 करोड़ से भी कम है तो बताइये धर्मांतरण हो रहा है तो हम इतने ही क्यों है?

चर्च नेताओं की इसी रणनीति का परिणाम उड़ीसा का कंधमाल है। वहां उन्होंने अपने लाभ के लिए समाज के विभिन्न वर्गो में कटुता के गहरे बीज बो दिये है। आदिवासियों एवं हिन्दू दलितों के ईसाई बनने के बाद यह विभाजन की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। इसकी तस्दीक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में की है। नवधर्मातरितों का सामाजिक एवं आर्थिक विकास करने की बजाय चर्च नेता उनमें कट्टरता भरने और उन्हें सरकारी रिकार्ड में हिन्दू की श्रेणी में ही बने रहने पर मौन साधे रहते है। उड़ीसा के कंधमाल में दंगों के पीछे `पाना´ ईसाइयों द्वारा फर्जी जाति प्रमाणपत्र एक बड़ा मुद्दा रहा है। आयोग ने सरकार को सुझाव दिया है कि वह आदिवासियों की जमीन को मुक्त करवाने के काम में तेजी लाए, फर्जी प्रमाणपत्रों पर ध्यान दें तथा धर्मपरिवर्तन के प्रति सचेत रहे। आयोग की अपनी सीमाएं है पर उसका इशारा बहुत साफ है।

धर्मपरिवर्तन को लेकर हमेशा ही विवाद रहा है, लेकिन यह भी सच है कि भारतीयों ने कभी `ईसा मसीह की शिक्षाओं´ का विरोध नही किया। स्वार्थी चर्च नेताओं ने ईसा को व्यापार की वस्तु बना दिया है। इनके व्यवहार से जाना जा सकता है कि न तो यह धार्मिक है और न ही अध्यात्मिक। इनका ईसा मसीह से कोई लेना देना नही है। ईसा सत्य और अंहिसा की प्रतीमूर्ति थे। उनके नाम पर धर्मांतरण का धंधा करना `महापाप´ से कम नही है। ईसा ने कहा था जो मेरी शिक्षा पर चलता है वह मेरे साथ है। चाहे वह कही भी रहे। धर्मपरिवर्तन के चक्रव्यूह से निकल कर चर्च नेताओं को उन करोड़ों धर्मातरित ईसाइयों के विकास की चिंता करनी चाहिए जिनकों वह पिछले तीन सौ सालों से ईसाइयत में दीक्षित करने के बाद भी वह उनका विकास नही कर पाया और आज भी इन करोड़ों लोगों को `अनुसूचित जातियों´ की श्रेणी में रखने के लिए सरकार पर दबाव बना रहा है।

भारतीय संविधान में सभी धर्मो के लोगों को अपने धर्म को मानने की पूरी आजादी दी गई है कोई भी अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर सकता है लेकिन जब प्रचार प्रसार किसी मल्टीनैशनल कम्पनी की तर्ज पर होने लगे तो उस पर विचार तो किया ही जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी को भी समाज में कटुता पैदा करने की इजाज्त नही दी जा सकती। धर्मांतरण एक राष्ट्रीय मुद्दा रहा है और कांग्रेस की कई राज्य सरकारों ने इस पर प्रतिबंध लगाये है परन्तु आज इसे वोट के चश्में से देखा जा रहा है। वक्त आ गया है कि इस मामले पर राजनीति बंद कर हमें प्रशासनिक स्तर पर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि भविष्य में कोई और कंधमाल न हो। 

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jay prakash singh on 08 July, 2009 08:29;44
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church ne puri duniya me chillane wale bhopuon ( media )par kabja kar rakha hai.is karan ghatana ke pakch aur vikchha donon ko bhunata hai. pehle swami Laxamananad ki hatya . phir jhopti par cross rakhkar use phunkana aur sahanubhuti batorana.church agency of denationalisation hai
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अनुनाद सिंह on 09 July, 2009 05:59;38
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इस आयोग ने प्रकारान्तर से ईसाई मिशनरियों के बारे में वही बात कही है जो गांधीजी सहित अनेकों आयोग कहते आये हैं। लेकिन छद्मसेक्युलर सच्चाई को कैसे मान लेंगे?
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Jeet Bhargava on 09 July, 2009 12:47;03
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शर्म की बात है की हमारा तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया 'चर्च' का भोंपू बन कर रह गया है. आपकी तरह सच बोलने की हिम्मत उसमे नहीं है, शायद इसकी भी उसे कीमत मिलती होगी. 'चर्च' एक तरह से मल्टीनेशनल कंपनी की तरह काम करता है, जिसमे बाकायदा अपने दुष्कर्मो को छिपाने के लिए मीडिया से 'लायजनिंग' की जाती है. यह गोरखधंधा पत्रकारों के साथ ही सेकुलर नेताओं और एयर कंडीशंड बुद्धीजीवियों, मानवाधिकार वादियों का भी पालन पोषण करता है. कहीं चर्च एनजीओ का रूप धरकर सेवा का चोला पहनता है तो कहीं तथाकथित दलितों, आदिवासियों के मन में तथाकथित सवर्णों के खिलाफ जहर भरकर अपनी दूकान चलाता है. इससे भी बात नहीं बनाती तो वह नक्सलवादियों से भी हाथ मिला लेता है. यानी प्रभू इसू के अनुयायियों की तादाद बढाने के लिए वह साम, दाम, दंड, भेद जैसे सभी उपाय अपनाता है. उत्तर-पूर्व से लेकर केरल में तो चर्च ने बाकायदा राजनीती में दखल देना शुरू कर दिया है और एक दबाव समूह का रुख अख्तियार कर लिया है. जहां कभी कम्युनिस्ट तो कभी कोंग्रेसी हाजरी लगाते हैं.आपने देखा की स्वामी लक्ष्मन नंद की क्रूर ह्त्या की खबर अखबारों के तीसरे चौथे पन्ने पर किसी कोने में छापने में और टीवी पर दिखाने में भी ये सेकुलर पत्रकार कतरा रहे थे. लेकिन किसे झोपडेनुमा चर्च के जलने का फोटो आज भी अखबार वाले बार-बार छाप रहे हैं.
दर असल इस की मूल जड़ हमारी तथाकथित सेकुलर वोट बैंक राजनीति है....और मेडम जी महिमा भी. जिसके चलते राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश आदि राज्य सरकारों द्वारा पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयकों पर हमारी केंद्र की कोंग्रेस सरकार अड़ंगे लगाकर बैठी है.
आपने इस मुद्दे को सही तरीके से उठाया है. लेखक और विस्फोट दोनों को साधुवाद...बधाई.
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