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अप्प दीपो भव !

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जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर ने दीपावली की रात को इस प्रकाश पर्व के लिए श्रेश्ठ संदेश दिया। भगवान महावीर को मिले दिव्य ज्ञान को ज्योति का प्रतीक माना गया उनकी शिक्षा मानव के अतंरमन को अलोकित करने का मार्ग दिखाती है। बुद्व की अमृत वाणी ``अप्प दीपो भव´´ अर्थात् `अपने लिए दीपक बन´ इसी भावना को बताती है। जनमानस में दीपावली एक संस्कृतिक पर्व है लेकिन इससे कई महापुरुषों के प्रसंग भी जुड़े हुए है। एक तरह से देखा जाये तो दीपावली लौकिक के साथ आध्याित्मकता का अनूठा संगम है।

दीपावली का पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर मानव को जाने के लिये प्रेरित करने वाला पर्व है। मनुश्य युगों से अंधकार को पराजित कर ज्ञान और प्रकाश को पाने के लिये कठोर से कठोर तप करता रहा है। प्रत्येक धर्म में अंधकार पर प्रकाश को विजयी बताया गया है। प्रभु ईसा मसीह ने कहा है कि कोई दीया जलाकर उसे दिवट के नीचे नही वरन उपर रखता है ताकि आने-जाने वाले प्रकाश पा सके। अर्थात् मानव जीवन भी एक दीये के समान है जिससे हम दूसरो को प्रकाश दे सकते है। दीपावली भी ज्ञान और प्रकाश के प्रगट होने का उत्सव है। मिट्टी के दीये में स्नेह की बाती और परोपकार का तेल डाल कर उसे जलाते हुए हम भारतीय संस्कृति को गौरव और सम्मान देते है। दीया भले ही मिट्टी का हो मगर वह हमारे जीने का आर्दश, हमारे जीवन की दिशा, संस्कारो की सीख, समाज ओर राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य, संकल्प की प्ररेणा और लक्ष्य तक पुहंचने का केवल एक माध्यम है। दीपावली मनाने का अर्थ अपने अंदर के अंधकार पर विजय पाना है।

प्रत्येक धर्म में मानव को दूसरो के लिए जीने की प्ररेणा दी जाती है। मनुश्य का रुझान हमेशा प्रकाश की और रहा है। अंधकार से वह हमेशा भागता रहा है चाहे यह अंधकार वातावरण में हो या हमारे जीवन में। भारतीय संस्कृति का पूरा ताना-बाना प्रकाश की और मानव को ले जाता है हम अपनी दैनिक प्रर्थानाओं में भी प्रकाश की कामना करते है तभी तो हम अपनी प्रर्थना में भी `तमसो मा ज्योतिर्गमय´ का अह्रवान करते है। अंधकार से प्रकाश की और जाने के लिए हमे अपने अंदर के अज्ञान के तमस को ज्ञान के प्रकाश से मिटाना होगा। ज्ञान के प्रकाश से हमारे अंदर के अंधकार खत्म हो सकते है।

दीपावली भले ही एक लौकिक पर्व है यह केवल बाहरी ही नही भीतरी अंधकार को मिटाने का पर्व बनना चाहिए। हम अपने भीतर का दीप जला कर अपनी वासनाओं के अंधकार को दूर कर सकते है। जिस तरह हम अपने घरो, दफतरो, आस पास के वतावरण को साफ करते है ऐसे ही हम अपने अतंर-मन को साफ करे। प्रत्येक धर्म में मानव मुक्ति का मार्ग बताया गया है लेकिन विगत कुछ दशको से अपने -अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्व करने की एक होड़ लग गई है। जिस कारण समाज में तनाव बड़ने के साथ साथ हमे जान-माल का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। उड़ीसा के कंधमाल में हुई हिंसा के कारण अंतराष्ट्रीय समुदाय में हमें नीचा देखना पड़ा है। समाज में धार्मिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए वैटिकन ने विगत माह अंतर्धामिक वार्ता का आयोजन भी किया है। धार्मिक प्रचार प्रसार ओर मानव मुक्ति का संदेश देने वाले प्रेम के दिये जलाए तो मानव वर्ग के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।

इसलिए दीपावली के इस पवित्र अवसर पर दीये बाहर के ही नही बल्कि भीतर के भी जलने चाहिए दीया कही भी जले वह प्रकाश देता है। दीया अपने आप में एक संदेश है। जीवन से कभी पलायन न करने का। संत बहाउल्लाह ने प्रकाश की चर्चा करते हुए अपने अनुयायियों से कहा था कि एक दीये को देखो, ` तिल तिल कर मरते हुए भी वह अपने आस-पास खड़े लोगो को प्रकाश देता है इसी प्रकार का तुम्हारा जीवन होना चाहिए। दीया उन लोगो के लिए भी एक शिक्षा है जो अकर्मण्य, आलसी, दिशाहीन और चरित्रहीन बन कर सफलता पाना चाहते है। दीया प्रकाश के लिए सतत प्रयास है, सतत समर्पण है, उदे्श्य के लिए स्वयं को मानव मुक्ति के लिए मिटा देने का संकल्प है।

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समीर लाल on 17 October, 2009 07:11;02
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जय हो!!

सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

सादर

-समीर लाल 'समीर'
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meenu khare on 17 October, 2009 18:25;03
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अप्प दीपो भव!
इस साल ओबामा ने दीपावली मनाई, आगे से हर देश प्रकाश पर्व मनाए.

हार्दिक शुभकामनाएँ.
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RAJ SINH on 19 October, 2009 17:35;25
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फ्रांसिस के लेख हमेशा सत्य, तथ्य और तर्कों से तो आते ही हैं ,उनमे कहीं इसा का सन्देश ही नहीं आत्मा भी होती है .
ये वह दीप हैं जिन्हें ' अप्प दीपो भव ' कहने का अधिकार है .
धन्यवाद , साधुवाद , बधाई और इस सब से बढ़ कर यदि कुछ होता हो .
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