रामभद्राचार्य की रामायण पर महाभारत
रामभद्राचार्य की रामायण पर उत्तर प्रदेश के धर्म समाज में महाभारत मचा हुआ है. रामानंद संप्रदाय के शंकराचार्य राम भद्राचार्य ने राम चरित मानस में अशुद्धियां बताकर अपने जिस राम चरित मानस को दोषमुक्त करार दिया है उसे लेकर अयोध्या में बवाल मचा हुआ है. यहां विद्वानों का कहना है कि श्रीरामचरितमानस जैसे लोकहितकारी सदग्रन्थ के प्रति आम जन मानस में किसी भी प्रकार की भ्रान्ति फैलाना या फिर खुद को मानसजी का प्रकाण्ड विद्वान प्रदर्शित करनें के लिए इस पर कुतर्क प्रस्तुत करना निश्चित रूप से घोर एवं अक्षम्य अपराध है। क्योंकि इससे मानव एवं मानवता दोनों का ही अहित होता है।
किन्तु अपनी-अपनी धर्म की दुकानें चलानें व खुद को मानस का प्रकाण्ड विद्वान साबित करनें की अतृप्त लालसा में पूरे मनोयोग के साथ इस कु-कृत्य में न सिर्फ लगे पड़े हैं। बल्कि लोगों की आस्था का दोहन कर धनोपार्जन के खेल में जी-जान से जुटे भी पड़े हैं।
गिरधर मिश्र उर्फ रामभद्राचार्य के इस कुत्सित प्रयास के बारे में यहाँ पर यह ज्ञात रहे कि इस कथावाचक एवं स्वयं-भू जगतगुरू नें मात्र धनोपार्जन करनें एवं अपनें झूठे पांडित्य का भोंड़ा प्रदर्शन करनें केे उद्देश्य से ही करोड़ों लोगों की आस्था के धर्म ग्रन्थ `श्रीरामचरित मानस जी´ में तीन हजार अशुद्धियाँ होनें का दावा करते हुए अपने सम्पादन में एक नये `श्रीरामचरितमानस´ का प्रकाशन कर डाला। अपनें इस कुत्सित प्रयास से रामभद्राचार्य नें न सिर्फ अस्सी करोड़ हिन्दुओं की प्रखर आस्था पर ही कुठाराघात किया है, बल्कि स्वयं की प्रकाशित `श्रीरामचरितमानस´ से लाखों रूपयों को बटोरा भी है। रामभद्राचार्य के इसी कुत्सित और घिनौंने कृत्य को लेकर न सिर्फ देश के समस्त संत समाज में ही अपितु पूरे देश में मानस को लेकर महाभारत मचा हुआ है।
ऐसा नहीं है कि रामभद्राचार्य का यह घिनौना कृत्य आज ही प्रकाश में आया है या फिर देश के संत समाज (विशेषकर राम की नगरी अयोध्या) की निगाह में अब आया है, जिसके कारण यह प्रकरण अब तूल पकड़ा है। यहाँ हम `प्रखर आस्था´ के लाखों पाठकों को स्मरण दिलाना चाहेंगे कि रामभद्राचार्य के इस घिनौने कृत्य पर सबसे पहले `प्रखर आस्था´ नें विस्तृत रूप से जून - 2008 के अंक में `हिन्दू आस्था पर कुठाराघात-श्रीरामचरितमानस से छेड़छाड़´ शीर्षक से विस्तृत खबर प्रकाशित की गई थी। इस खबर के प्रकाशित होते ही देश के लाखों हिन्दुओं नें देश के कई स्थानों पर न सिर्फ कथित मूर्धन्य विद्वान रामभद्राचार्य का पुतला ही नहीं फँूका बल्कि इनकी गिरफ्तारी की भी मांग शुरू हो गई। इसी दौरान भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भी संतो नें 1 नवम्बर 2008 को प्रेसवार्ता एवं बैठक आयोजित कर रामभद्राचार्य को अयोध्या में न घुसनें देनें एवं रामभद्राचार्य की गिरफ्तारी की मांग शुरू कर दी थी। लेकिन उस समय यह यह प्रकरण आज की तरह परवान न चढ़ सका था।
उक्त घटना के एक वर्ष बीत जानें के बाद अब रामनगरी अयोध्या से मानस पर मचे महाभारत की शुरूआत का मुख्य कारण है कि कथित मानस मर्मज्ञ रामभद्राचार्य नें एक साल बाद अयोध्या में जाकर 24 नवम्बर-2009 से कथा कहनें का ताना - बाना गुपचुप ढंग से बुन डाला। रामभद्राचार्य के अयोध्या आगमन एवं उनके कथाकार्यक्रम की जानकारी जैसे ही 22 नवम्बर 2009 को अयोध्या के संतों में मुख्यत: त्रयअनी अखाड़े के प्रधानमंत्री महंथ माधवदास, निवार्णी अनी अखाड़े के महंथ श्री धर्मदास, दामोदरदास, आचार्य रामदेव शास्त्रीआदि को हुई तो अयोध्या का पूरा संत-समाज रामभ्रदाचार्य के कथा कार्यक्रम को लेकर आक्रोशित हो उठा यत्रअनी अखाड़े के प्रधानमंत्री माधवदास नें संतों की एक तत्काल बैठक आयोजित कर प्रस्ताव पास करा लिया कि `जिला प्रशासन अयोध्या के हनुमानबाग में 24 नवम्बर से रामभद्राचार्य की होनें वाली रामकथा पर तत्कालिक रूप से प्रतिबंध लगाए तथा अयोध्या में रामभद्राचार्य के घुसनें पर रोक लगा दें। इस प्रस्ताव को समवेत स्वर में पारित कर संतों नें प्रस्ताव जिला प्रशासन को प्रस्तुत कर दिया। रामभद्राचार्य एवं उनकी कथित मानस पर संतो में उपजे आक्रोश को देखते हुए प्रशासन नें 24 नवम्बर को अयोध्या में रामभद्राचार्य के प्रवेश पर तत्कालिक रूप से प्रतिबन्ध लगा दिया तथा इस संदर्भ में जिला प्रशासन नें आदेश की प्रति फैक्स के माध्यम् से चित्रकूट भी भेज दिया।
संतो के आक्रामक तेवर देख इस बहुरूपिए कथावाचक रामभद्राचार्य नें संतों को मनानें एवं अपना पक्ष रखनें के लिए अपनें दूत (शिष्य) अथावाचक प्रेमभूषण को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंथ ज्ञानदास के यहाँ भेज दिया। एक बार फिर इस पाखंड़ी धर्मध्वजावाहक रामभद्राचार्य नें फरेब का सहारा लिया महंथ ज्ञानदास के यहाँ पहुंचे प्रेमभूषण नें रामभद्राचार्य द्वारा लिखी गई एक दूसरी रामायण प्रस्तुत कर संतों को गुमराह करनें का अथक प्रयास किया लेकिन मौके पर मौजूद महंथ माधवदास एवं आचार्य रामदेव शास्त्री नें प्रेमभूषण द्वारा दिखाए जा रहे रामायण को मानने से ही इंकार कर दिया तथा इस पूरे प्रकरण की सूचना तत्काल `प्रखर आस्था´ के सम्पादक `एस.ए.अस्थाना´ द्वारा उच्चन्यायालय लखनऊ-खण्डपीठ में मुकदमा दायर कर दिया गया है। अयोध्या में चल रहे इस घटनाक्रम के बीच ही रामायण की वह प्रति एक व्यक्ति लेकर दोपहर करीब 1 बजे अयोध्या पहुँचा। पाँच बजे सायं इसी दिन अयोध्या के लगभग सभी संत उस प्रति को लेकर महंथ ज्ञानदास के यहाँ पहुंचे, पहले से ही रामभद्राचार्य के दूत के रूप प्रेमभूषण मौजूद थे। महंथ ज्ञानदास के समक्ष दोनों रामायणें रखनें पर महंथ ज्ञानदास नें तुरन्त ही रामभद्राचार्य एवं उनके दूत प्रेमभूषण की जालसाजी को पकड़ लिया। महंथ ज्ञानदास नें प्रेमभूषण के सेल फोन पर रामभद्राचार्य से बात कर यह जानना चाहा कि `कैसे आपकों पारायण विधि को, कैसे खुद को ऋषि दर्शा रखा हैं?´ महंथ ज्ञानदास के इस प्रश्न पर रामभद्राचार्य न सिर्फ अचकचा ही गए बल्कि यह कह कर अपना पक्ष रखना चाहा कि `अति उत्साह में हमारे शिष्यों नें हमारे लिए `ऋषि´ शब्द को प्रयोग कर दिया है।´
अब तक अपनें गुरू को भारत भूमि का सबसे बड़ा विद्वान मानने वाले प्रेमभूषण को संभवत: यह माना नहीं था कि उनके कथित विद्वान गुरू इतनी जल्दी अपनी लगती मान लेंगे या फिर पहले ही प्रश्न पर धराशायी हो जाएंगे। महंत ज्ञानदास के यहां से अंतत: चुपचाप खिसक जाना ही प्रेमभूषण नें उपयुक्त समझा। यही वह समय था जब अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंथ ज्ञानदास नें यह फरमान जारी कर दिया कि यदि 8 नवम्बर तक रामभद्राचार्य अपनें इस कु-कृत्य पर मॉफी नहीं मांगते हैं तो 10 नवम्बर को हरिद्वार में अखाड़ा परिषद रामभद्राचार्य से जगतगुरू की पदवी छीन लेगी। इन्हीं घटनाओं के बीच 30 अक्टूबर को महंथ माघवदास नें अयोध्या के सभी संतों की एक विशाल बैठक आयोजित की जिसमें सभी संतों नें रामभद्राचार्य पर न सिर्फ तीखे प्रहार ही किए बल्कि जीभ भी काट लेनें का ऐलान भी हो गया।
इन्ही नाटकीय घटनाक्रम के बीच अचानक 3 नवम्बर को रामभद्राचार्य के विशेष दूत एवं प्रतिनिधि के रूप में अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री एवं कथावाचक प्रेमभूषण रामभद्राचार्य का मॉफीनामा लेकर अयोध्या महंथ ज्ञानदास के यहाँ उपस्थित हो गए। इस मॉफीनामें में रामभद्राचार्य नें स्पष्ट किया है कि मैं अपनी रचित मानस की प्रतियों को बाजार या आम लोगों के बीच नहीं बाटूंगा। तथा संत समाज को हुए कष्ट के लिए क्षमा चाहता हूँ।
इस पूरे घटनाक्रम का रोचक पहलू तो यह है कि - एक तरफ जहाँ रामभद्राचार्य संतों से मॉफी मांग कर अपनें प्रति उपजे आक्रोश को कम करवानें में कुछ हद तक सफल हो गए हैं वहीं दूसरी तरफ अयोध्या के संत इस `माफी नामे´ को लेकर दो गुटों में साफ-साफ दिखाई देने लगे हैं। अयोध्या से प्राप्त जानकारी के अनुसार अयोध्या के प्रमुख 4-6 संतों में विशेषकर नृत्य गोपाल दास, महंथ की मौजूदगी में हुए मॉफीनामे से अयोध्या के बाकी संतखुद को न सिर्फ उपेक्षित ही महसूस कर रहे हैं बल्कि उनके बीच इस मॉफीनामें को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ भी छिड़ी हुई हैं। बहरहाल `श्रीरामचरितमानस´ के साथ किए गए छेड़-छाँड़ पर बड़े महंथों से रामभद्राचार्य को जीवनदान तो मिल गया है पर यह तय है कि आम संतों एवं लोगों के बीच मानस पर मचा महाभारत अभी थमनें वाला नहीं है।
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jab ki शंकराचार्य राम भद्राचार्य ho ya fir koi bhi hindu sant unke samne hinduo dwara dharm pariwartit kar muslim ya isai banane ki jatil samasyaye hai
parantu ram charit manas se cher char kar unhe bhi media or desh ki nazro me chane ka avsar nhi khona tha
or media to ase masalo ka intezar karta hai
रामभद्राचार्यजी, सन्त बङे ही भद्र.
सन्त बङे ही भद्र, जन्मसे प्रज्ञाचक्षु.
उनकी विद्वता के सम्मुख हम तो भिक्षु.
कह साधक मानस में यदि सुधार होता है.
तुलसी का मानस इससे हर्षित होता है.
जाते| सन्त जी लाखो हजारो विकलाग लोगो की सेवा करते है उनकी महानता राम से भी बठकर है कुछ लिकने से पहले आप उनकी पुस्तक पठ लेते तो बेह्तर होता
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