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सोने में क्यों सजे साईं बाबा ?

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करोडों रूपए का चढावा आने वाले मन्दिरों में सबसे उपर दक्षिण भारत में तिरूपति के निकट तिरूमला की पहाडियों पर विराजे भगवान बालजी जिन्हें तिरूपति बाला जी के नाम से जाना जाता है, सबसे आगे हैं। इसके बाद नंबर आता है उत्तर भारत में जम्मू के निकट त्रिकुटा पहाडी पर विराजीं मातारानी वैष्णो देवी का। इन दोनों ही के बाद महाराष्ट्र प्रदेश के अहमदनगर जिले के शिरडी गांव के फकीर साई बाबा के धाम का नाम लिया जाता है।

शिरडी की भूमि में अचानक आए साई बाबा ने जो चमत्कार दिखाए वे पौराणिक काल के नहीं थे, आज के युग में लोगों ने बाबा को देखा है, महसूस किया है, और आज भी बाबा के प्रति लोगों की अगाध श्रृद्धा का कारण उनका चमत्कारिक व्यक्तित्व ही कहा जा सकता है। जीवन भर जिस फकीर ने अपने बजाए मानव मात्र की चिन्ता की है, उसके नाम को आज व्यवसायिक चोला पहनाया जाना निस्सन्देह निन्दनीय है।

सत्तर के दशक के बाद मनोज कुमार कृत ``शिरडी वाले साई बाबा`` चलचित्र और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ``अमर अकबर एन्थोनी`` में ऋषि कपूर का गाना ``शिरडी वाले साई बाबा, आया है दर पे तेरे सवाली. . `` ने धूम मचा दी। जिस तरह गुलशन कुमार के माता रानी के भजनों के बाद समूची देश त्रिकुटा पर्वत पर विराजी माता वेष्णव देवी का दीवाना हो गया था, ठीक उसी तरह बाबा के भक्तों की कतारें बढती ही गईं। साई भक्तों की आस्था के केन्द्र शिरडी का चर्चा में रहना पुराना शगल है। जब तक बाबा सशरीर थे, तब तक फर्जी नीम हकीम और ओझाओं द्वारा बाबा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर इस स्थान को चर्चाओं का केन्द्र बनाया और अब तो सोने के सिंहासन और करोडों के दान के चलते यह स्थान चर्चाओं का केन्द्र बिन्दु बने बिना नहीं है। अब यह बाबा के व्हीआईपी दर्शन के चलते चर्चाओं में आ गया है। साई बाबा संस्थान द्वारा लिए गए निर्णय कि काकड आरती के लिए पांच सौ रूपए तो धूप आरती के लिए ढाई सौ रूपए वसूले जाएंगे, साई भक्तों को जम नहीं रहा है। यद्यपि यह व्यवस्था वर्तमान में प्रयोग के तौर पर ही लागू की गई है, किन्तु तीन माह में ही बाबा के भक्तों के बीच इस व्यवस्था को लेकर रोष और असन्तोष गहराने लगे तो बडी बात नहीं। किसी भी अराध्य के दर्शन के लिए अगर उसके अनुयायी को कीमत चुकानी पडे तो यह उसकी आस्था पर सीधा कुठाराघात ही कहा जाएगा।

हो सकता है कि बाहर से आने वाले लोगों की परेशानी को ध्यान में रख संस्थान ने यह व्यवस्था बनाना मुनासिब समझा होगा, किन्तु उत्तर भारत में माता रानी वेष्णव देवी के दर्शन के लिए आरम्भ की गई हेलीकाप्टर सेवा का लाभ आम श्रृद्धालु उठाने की कतई नहीं सोचता है। वैसे भी माना जाता है कि अपने अराध्य के दर्शन जितने कष्ट के बाद होते हैं उतना ही पुण्य प्रताप भक्त को मिलता है। शुल्क के बदले अराध्य के दर्शन की व्यवस्था माता वेष्णो देवी श्राईन बोर्ड ने आरम्भ की थी, जिसमें दो सौ रूपए से एक हजार रूपए तक का मूल्य चुकाने पर विशेष दर्शन की व्यवस्था की गई थी। बाद में भक्तों के भारी विरोध के बाद इस व्यवस्था को श्राईन बोर्ड ने बन्द कर दिया था। देश की राजधानी दिल्ली में साकेत में विशाल साई प्रज्ञा धाम चलाने वाले स्वामी प्रज्ञानन्द का कहना एकदम तर्कसंगत है कि शिरडी के सन्त साई बाबा गरीबों के मसीहा थे और उनके दर्शन के लिए धन के आधार पर भेदभाव किसी भी सूरत में तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता है।

शिरडी के साई बाबा पर देश के करोडों लोगों की अगाध श्रृद्धा है। बाबा किस जात के थे, यह बात आज भी रहस्य ही है। बाबा जहां बैठते थे, उस स्थान को द्वारका मिस्जद कहा जाता है। सभी धर्माें के लोगों द्वारा साई बाबा के प्रति आदर का भाव है। यही कारण है कि साई बाबा संस्थान शिरडी के कोष में दिन दूगनी रात चौगनी बढोत्तरी होती जा रही है। कोई बाबा को सोने का सिंहासन तो कोई रत्न जडित मुकुट चढाने की बात करता है। बाबा को समाधि लिए अभी सौ साल भी नहीं बीते हैं और विडम्बना ही कही जाएगी कि बाबा की इस प्रसिद्धि को भुनाने में धर्म के ठेकेदारों ने कोई कोर कसर नहीं रख छोडी है। आज देश भर में बाबा के नाम पर छोटे बडे अस्सी हजार से अधिक मन्दिर अिस्त्त्व में आ चुके हैं। इनसे होने वाली आय किस मद में खर्च की जा रही है, इसका भी कोई लेखा जोखा नहीं है। साई के नाम पर लोगों को ठगने वालों की तादाद आज देश में तेजी से बढी है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।

शिरडी का वह फकीर जो माया मोह से दूर था के समाधि लेने के बाद उनके मन्दिर या समाधि स्थल को भव्य बनाना उनके भक्तों की भावनाएं प्रदर्शित करता है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही साथ बाबा के भक्तों को यह भी सोचना चाहिए कि साई बाबा ने सदा ही मानवमात्र के कल्याण की बात सोची थी। बाबा के प्रति सही भक्ति अगर प्रदर्शित करना है तो संस्थान और उनके दानदाता भक्तों को चाहिए कि शिरडी में सोने के सिंहासन या रत्न जडित मुकुट आदि के बजाए एक भव्य सर्वसुविधायुक्त अस्पताल अवश्य बनवा दें जिसमें हर साध्य और असाध्य रोगों का इलाज एकदम निशुल्क हो, इससे बाबा की कीर्ति में चार चान्द लग सकते हैं।

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vandana on 10 February, 2010 14:49;44
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waah........bahut hi uchit samadhan bataya hai aur bahut hi sarthak lekh likha hai......koi bhi guru ya baba is tarah ki aastha mein vishwas nhi karte the sabka ek hi uddeshya raha hai manav matra ka kalyan kaise ho aur isi ke liye jeevan bhar prayatnsheel rahe .........agar unke adarshon ko apnana hai to unke bataye raston par chalna chahiye jisse kisi ki bhi bhavnayein aahat nhi hongi aur jan kalyan bhi hoga.
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संगीता पुरी on 10 February, 2010 17:04;51
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बाबा के प्रति सही भक्ति अगर प्रदर्शित करना है तो संस्थान और उनके दानदाता भक्तों को चाहिए कि शिरडी में सोने के सिंहासन या रत्न जडित मुकुट आदि के बजाए एक भव्य सर्वसुविधायुक्त अस्पताल अवश्य बनवा दें जिसमें हर साध्य और असाध्य रोगों का इलाज एकदम निशुल्क हो, इससे बाबा की कीर्ति में चार चांद लग सकते हैं।
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kalpesh on 24 March, 2010 12:55;40
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खरे जी हरेक साँई भक्त के दिल की बात कह दी आपने। सोने के सिंहासन से पहले बाबा के भक्तों को दाल-रोटी और दवाई की फिक्र करें। बाबा ने अपना जीवन फटी धोती और भिक्षा माँगकर कुत्ते-बिल्लियों तक का पेट भरने में गुजार दिया। सोने से अपने साँई को तोलने वाले 'तथाकथित भक्तों' से पूछो कि उनके इस काम से बाबा की आँखों में उन्हें खुशी और संतोष दिखाई दिया या दुख और पीड़ा?
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zebu on 30 April, 2010 09:37;10
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baba sai ki rochak jankariyo ke liye aap badhai ke patra hah.
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image लिमटी खरे लिमटी खरे की खबरें देश के कई अखबारों में छपती हैं. दिल्ली में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता लेखन और विभिन्न मीडिया स्कूलों में पढ़ाते भी हैं. लिमटी की लालटेन नाम से विस्फोट.कॉम में नियमित लिमटी की लालटेन नामक स्तंभ लेखन. limtykhare@gmail.com
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