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अमेरिका का आध्यात्म, भारत का हिन्दुत्व

image धर्मदेव के साथ जूलिया राबर्ट्स

हालीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स हिन्दू हो गयी. देशभर की मीडिया इस खबर से अटी पड़ी है है कि उन्हें हिन्दू धर्म ने इतना प्रभावित किया कि उन्होंने पिछले साल स्वामी धर्मदेव से हुई मुलाकात ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया. इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम को मीडिया भले ही आश्चर्य की नजर से देख रहा हो लेकिन खुद स्वामी धर्मदेव को कोई आश्चर्य नहीं है. जूलिया के धर्मपरिवर्तन के बाद उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि वे जबरन धर्म परिवर्तन के पक्ष में नहीं हैं लेकिन अगर जूलिया ने अपनी आत्मा से हिन्दू धर्म को स्वीकार किया है तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए.

अमेरिका परिवर्तन पसंद देश है. दो-तीन दशक पहले अगर अमेरिका कूंगफू और कराटे की तरफ भाग रहा था तो इधर एक-डेढ़ दशक से वह योग और आध्यात्म की दिशा में अग्रसर हो गया है. दो दशक के भीतर ही चीन का मार्शल आर्ट पुराना फैशन हो गया और उसकी जगह आसन और प्राणायाम ने ले ली. भौतिक जगत में शीर्ष पर विराजमान अमेरिका में आध्यात्मिक ललक कितनी तीव्र है इसका उदाहरण देखना हो तो अोबामा का चुनाव प्रचार याद करिए. अपने चुनाव प्रचार के दौरान जब ओबामा के चुनाव प्रबंधकों ने उन्हें आध्यात्मिक पूंजी को भौतिक पूंजी से श्रेष्ठ बताने की सलाह दी तो उनके सलाहकार जानते थे कि अमेरिका में भौतिक पूंजी से भरकर बिलबिला रहे लोग आध्यात्मिक शून्य की ओर भागना चाहते हैं. ओबामा ने उस आध्यात्मिक मंत्र का इस्तेमाल किया और उन्हें भौतिक से ज्यादा नैतिक समर्थन हासिल हुआ.

लेकिन हाल के दिनों में अमेरिका में एक मजेदार बहस शुरू हुई है. वह बहस आध्यात्मिकता बनाम हिन्दुत्व की है. अमेरिका में धर्म के रूप में हिन्दुत्व का उल्लेख करनेवाले लोगों की कुल संख्या मुश्किल से दस से बारह लाख है. (अमेिरकी जनगणना, 2001) कुल आबादी के महज 0.4 फीसदी. लेकिन अमेरिकी भौतिकवाद की भट्टी ने इंसान को इतना भस्म कर दिया है कि आध्यात्म के अलावा और कहीं शीतलता दिखाई नहीं देती. अपना अमेरिका कभी जाना नहीं हुआ और कभी जाने का इरादा भी नहीं है. लेकिन पिछले दस बारह सालों से ऋषिकेश जाता रहता हूं. ऋषिकेश नवआध्यात्मवाद का नया तीर्थ बनकर उभरा है. पहाड़ और मैदान के मध्य में स्थित ऋषिकेश के आश्रम वैश्विक पहुंच रखते हैं और दुनियाभर से आध्यात्मिकता की तलाश में नागरिक यहां पहुंचते हैं. यहां के आश्रमों में आपको चीन, जापान से लेकर अमेरिका, यूरोप और अफ्रीकी देशों के नागरिक मिलेंगे. कहा जाता है कि ये लोग नशेड़ी होते हैं. भोगी होते हैं और नशा भोग की खोज में भारत चले आते हैं. लेकिन अपना अनुभव ऐसा नहीं है. सैकड़ों लोगों से मुलाकात हुई है और दर्जनों लोगों से बातें हुई हैं. उनसे बात करते हुए अहसास होता है कि वे हमसे अधिक मुमुक्षु है. हम भारत में पैदा हुए, भारत की आबोहवा में सांस ले रहे हैं, यहीं का पैदा हुआ अन्न ग्रहण कर रहे हैं लेकिन धर्म परायण जीवन की वह ललक खो चुके हैं जो सहज ही हमारे भीतर होनी चाहिए. लेकिन उनके भीतर वह ललक साफ दिखाई देती है.

भारत में पढ़े लिखे लोग जिसे हिन्दू धर्म समझने लगे हैं उसका प्रतिनिधि संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो गया है जो हिन्दू धर्म को हिन्दुत्व के रूप में हमें समझाने की कोशिश करता है. यह बहुत ही दुखद है कि आज तक भारत में यह बहस खड़ी नहीं हुई कि आरएसएस जिस हिन्दुत्व का पाठ देशवासियों को पढ़ा रहा है क्या वह हिन्दू धर्म को प्रतिबिंबित करता है? लेकिन अमेरिका में यह बहस चल पड़ी है. इसकी शुरूआत भी कुछ ऐसे लोगों ने की है जो आरएसएस के हिन्दुत्व को हिन्दू धर्म मानते हैं. हाल में ही वाशिंगटन पोस्ट में असीम शुक्ला नामक एक व्यक्ति ने एक लेख लिखा है. असीम शुक्ला हिन्दू अमेरिकन फाउण्डेशन के अध्यक्ष हैं. उन्होंने एक लेख लिखा जिसमें कहा है कि अमेरिका में योग का प्रचार तो हुआ लेकिन हिन्दुत्व की कीमत पर. द थेफ्ट आफ योगा नामक अपने इस लेख में उन्होंने अफसोस जाहिर किया है कि कुछ लोगों ने योग को उस हिन्दुत्व से अलग कर दिया है जिसमें इसका जन्म हुआ है. 

इसका जवाब देते हुए स्पिरिचुअल टीचर और आयुर्वेद चिकित्सक दीपक चोपड़ा ने कहा है कि योग को हिन्दुत्व से जोड़कर नहीं देख सकते. दीपक चोपड़ा का तर्क है कि योग धर्ममुक्त आध्यात्मिकता है जो विभिन्न धर्मो में अलग अलग रूपों में स्थापित है. अमेरिका में यह बहस पहली बार नहीं खड़ी हुई है. अमेरिका में जो लोग योग से जुड़े हुए हैं उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो इसे हिन्दुत्व का हिस्सा नहीं मानते हैं जबकि कुछ लोग इसे हिन्दुत्व से जोड़कर देखते हैं. असल में जो इसे हिन्दुत्व का हिस्सा मानते हैं, वे भी सही हैं और जो इसे हिन्दुत्व का हिस्सा नहीं मानते हैं वे भी सही है. इसका श्रेय भारत की उस आध्यात्मिक गहराई को देना चाहिए जहां से देखने पर दोनों पक्ष सही नजर आते हैं. योग विद्या को धर्म से जोड़कर भी देख सकते हैं और इसे एक सेकुलर अभ्यास भी मान सकते हैं. समस्या योग को लेकर नहीं है. समस्या भाषा को लेकर है. हिन्दुत्व धार्मिक शब्दावली से निकला शब्द है. भारत में एक धर्म विशेष से जुड़े लोगों को हिन्दू के रूप में चिन्हित करने का काम ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने किया. और यही उनकी पहचान बन गया. लेकिन अमेरिका जिस योग और आध्यात्म को अपना रहा है वह ब्रिटिश प्रदत्त हिन्दुत्व का हिस्सा नहीं है. इसलिए अमेरिकी समाज योग, वेद और वेदान्त को हिन्दुत्व से जोड़कर देखने की बजाय सनातन जीवन पद्धति से जोड़कर देख रहा है.

अमेरिका में पहली बार हिन्दू धर्म ग्रन्थों से परिचय राल्फ वाल्दो इमर्सन ने 200 साल पहले करवाया जब उन्होंने बोस्टन हार्बर पर हिन्दू धर्मग्रन्थों का अनुवादित पाठ किया. लेकिन भारत की ओर से पहली बार जिस संत ने अमेरिका में सनातन धर्म के बारे में सार्वजनिक परिचय करवाया उनका नाम है स्वामी विवेकान्द. 1893 में विश्व धर्म संसद में उनके द्वारा हिन्दू धर्म के बारे में ऐतिहासिक भाषण दिया गया. ईसाई धर्मगुरुओं के तीखे आक्रमणों के बीच स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को बहुत सटीक तरीके से हिन्दुत्व की व्याख्या की. स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिकी जमीन पर जिस आध्यात्मिकता की शुरूआत की वह कालांतर में एक प्रवाह बन गयी. भारत से हजारों की संख्या में साधु सन्यासी अमेरिका गये और वहां आध्यात्मिक जीवन जीने की विधियां सिखानी शुरू की. क्योंकि ये साधु सन्यासी थे और भारत से गये थे इसलिए उन्हें हिन्दू सन्यासी कहकर परिभाषित किया गया. लेकिन इन साधु सन्यासियों ने अपने यहां आनेवाले लोगों को कभी भी हिन्दू धर्म की वकालत नहीं की. ऐसे दर्जनों अवसरों पर मैं खुद मौजूद रहा हूं जब हमने इन संन्यासियों को यह कहते हुए सुना है कि आप जिस धार्मिक परंपरा में विश्वास करते हैं उसमें अपनी निष्ठा बनाये रखें और आध्यात्मिक जीवन की तरफ प्रेरित हो. निश्चित रूप से ऐसा करते हुए इन संन्यासियों की कोशिश किसी धर्म का प्रचार नहीं बल्कि मनुष्य मात्र का जीने की कला सिखाना है. लेकिन तथाकथित हिन्दुत्ववादी जन भारतीय आध्यात्मिकता को राजनीतिक हिन्दुत्व से जोड़कर अपनी प्रासंगिकता साबित कर रहे हैं. लेकिन उनकी इस कोशिश से भारत की उस आध्यात्मिकता को नुकसान होता है जो सनातन धर्म के रूप में संपूर्ण भारत में व्याप्त है. अगर अमेरिका अपनी आध्यात्मिक यात्रा की दो शताब्दी में ही हिन्दुत्व और आध्यात्मिकता के अंतर पर बहस कर रहा है तो भला हम पांच सहस्राब्दी के ज्ञात इतिहास के बाद भी इस फेर में क्यों रहें कि हिन्दुत्व ही आध्यात्मिकता है?

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anup on 07 August, 2010 13:52;29
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संजय जी, लेख में धार है....
यसे ही लिखते रहे.........

अनूप
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Amitabh Tripathi on 07 August, 2010 14:34;30
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संजय जी आपने अत्यंत प्रासंगिक और सटीक विषय पर अपनी लेखनी चलाई है पर इस लेख मे एक दुविधा सी दिख रही है। इसकी ओर यदि मैं संकेत करूँगा तो शायद आप इसे स्वीकार नहीं करेंगे पर यदि आप विवेकानन्द साहित्य के सभी बारह खण्ड देखें तो पायेंगे कि जब स्वामी जी अपने विदेश प्रवास से भारत वापस आये तो उनसे भारत के राजनीतिक भविष्य के सम्बन्ध में भी प्रश्न किये गये और उन्होंने इसके उत्तर दिये और कहा कि चूँकि भारत का सर्वोच्च आदर्श आध्यात्मिकता है इस कारण इसे राजनीति में ढालना होगा और एक बार हम आध्यात्मिकता को जान कर अपने मूल पर जा सकेंगे तो शेष सब स्वतः ही ठीक हो जायेगा। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन , समाजवादी आन्दोलन पर भी अपने विचार व्यक्त किये थे उनका मानना था कि आध्यात्मिकता सर्वोच्च है परंतु राजनीति और समाज व्यवस्था भी अनिवार्य अंग है।
कालांतर में योगी अरविन्द ने भी सन्यास के उपरांत भी देश की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति पर लोगों को मार्गदर्शन 1910 से 1940 तक दिया और " भारत का पुनर्जन्म" पुस्तक में स्पष्ट उल्लेख है उन संस्मरणों का जो संकेत करते हैं कि योगी अरविन्द राजनीति से आसक्त नहीं थे लेकिन उसे एक आवश्यक अंग मानकर चलते थे।
हिन्दुत्व का अर्थ है राजनीति को अध्यात्म के आदर्श पर लाना जिसे दीनदयाल जी ने राजनीतिक शब्दावली में एकात्ममानव दर्शन कहा था। ताकि आत्मतत्व को पह्चान का आधार बनाया जाये परन्तु यह सब करते हुए भी हिन्दू यह कैसे भूल सकता है कि अध्यात्म विज्ञान , योग, आयुर्वेद जैसी विधायें हमारे पूर्वजों ने विकसित की और हमारा इस पर पेटेण्ट है। इस पेटेण्ट की रक्षा के लिये जो मुखरता, प्रखरता और शक्ति चाहिये कि कल को हम रेड इन्डियन, आस्ट्रेलियाई आदिवासी, अफ्रीकी समाज न बन जायें। यदि हिन्दुत्व से यह राजनीति चली जायेगी तो कल को अध्यात्म भी दूसरों की सम्पत्ति हो जायेगी और इसे भी बाजार में खरीदा बेचा जायेगा। अध्यात्म की खोज हमने की तो इसे बचाने और विकसित करने के लिये हिन्दुत्व का राजनीतिक स्वरूप भी आवश्यक है। बिना शस्त्र और सत्ता के अध्यात्म की रक्षा भी नहीं होती।
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Dipu Singh on 07 August, 2010 16:48;27
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त्रिपाठी सर,
आपकी बात से मैं बिल्कुल सहमत हु. संजय सर का लेख केवल अंग्रेजो के द्वारा लिखे गए
इतिहास पर ही आधारित है. कही कही बातें अस्पष्ट नहीं हो पा रही है, जैसे योग और आयूर्वेद को हिन्दू धर्म से जोड़ा जाय या नहीं ? इस बात पर संजय सर अस्पष्ट नहीं हो पाए है .
दीपू सिंह
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dipu singh on 07 August, 2010 16:51;06
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त्रिपाठी सर,
आपकी बात से मैं बिल्कुल सहमत हु. संजय सर का लेख केवल अंग्रेजो के द्वारा लिखे गए
इतिहास पर ही आधारित है. कही कही बातें स्पष्ट नहीं हो पा रही है, जैसे योग और आयूर्वेद को हिन्दू धर्म से जोड़ा जाय या नहीं ? इस बात पर संजय सर स्पष्ट नहीं हो पाए है .
दीपू सिंह
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यशवंत on 07 August, 2010 18:55;11
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अपने यहां जो लोग हैं, वे कुंठित तपस्वी हैं, सो अब भोग की ओर भाग रहे हैं. उनके यहां भोग से भागा आदमी तपस्वी बन रहा है. तरीका भी यही है. पहले भोगिए. फिर भागिए.
अच्छा लिखा. इन मुद्दों पर बात होनी चाहिए.
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संजय ितवारी on 07 August, 2010 20:19;01
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सारी समस्या चिन्हित करने से जुड़ी हुई है. यह कौन तो फला धर्म का, यह कौन तो फलां धर्म का. हमारे पहचान के सभी तरीके धर्म या फिर उपासना पद्धतियों से जुड़ गयी है. यहां तक कि हमारी भाषा भी धर्म के अनुसार चिन्हित की जाती है. अगर कोई मुसलमान है तो उर्दू ही बोलेगा. हिन्दू तो संस्कृत का साधक होगा. योग आयुर्यवेद हिन्दुओं का है आदि सब गलत है.

हिन्दू के रूप में चिन्हित कर देने से स्वरूप समझने में थोड़ी आसानी तो होती है लेकिन बड़ी मुश्किल खड़ी होती है. भारत के मंदिरों में कभी भी हिन्दू धर्म का जय नहीं बोला जाता. आप किसी भी मंदिर में चले जाएं वहां सनातन धर्म की जय बोली जाती है हिन्दू धर्म की नहीं. दुनिया में जो लोग आकर्षित हो रहे हैं वह उस जीवन पद्धति की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो शास्वत है, सनातन है. इसलिए इसे कृपया हिन्दू मुस्लिम और ईसाई आदि से न जोड़ें बहुत मुश्किल हो जाएगी.
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मुकुल शुक्ल on 07 August, 2010 20:54;40
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हिंदुत्व तो एक जीवन पद्धति है जिसका अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है | भोगवादी संस्कृति ने हमें अपनी जड़ो से थोडा दूर किया ज़रूर है पर हम अपनी जड़ो को भूले नहीं है | भोगवाद की बहुत सीमित हद होती है और जब इंसान उस हद तक पहुँच जाता है तब मोक्ष की तरफ अग्रसर होने का प्रयास करता है | ऐसा ही कुछ प्रयास जूलिया रोबर्ट्स का भी नज़र आ रहा है | बहुत सारे संगठन इस देश में आज भी हमें अपनी जड़ो से जोड़े रखने में सफल हुए है पर समय समय पर राजनेताओ ने अपनी ओछी राजनैतिक आकांक्षाओ की प्राप्ति के लिए उन्हें बदनाम भी किया है | यही इस देश की कामयाबी है की इतने सारे भ्रष्टाचार के होते हुए भी लोग अपनी आस्थाओ की जड़े नहीं भूले है और हमारा आयुर्वेद, योग और संस्कृति दुनिया को राह दिखा रही है |
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anup anand on 07 August, 2010 23:26;56
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जूलिया राबर्ट का हिंदू धर्म स्वीकारना एक बड़ी घटना है। अब हमारे धर्माचार्यों जैसे स्वामी धर्मदेव, स्वामी रामदेव, श्री श्री रविशंकर को चाहिए कि वे अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू बनाने का अभियान चलाए। यह न सिर्फ उन लोगों के हित में होगा बल्कि पूरी दुनिया में सुख-शांति के लिए भी जरूरी होगा। हिंदू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी रही है कि हमारे धर्माचार्यों ने धर्मांतरण पर ध्यान नहीं दिया। परिणाम सबके सामने हैं। हिंदू धर्म के न फैलने से पूरी दुनिया में समस्याएं हैं। कल्पना कीजिए यदि हम अखंड भारत में इस्लामीकरण को रोक पाते तो न पाकिस्तान बनता, न बांग्लादेश और न कश्मीर समस्या होती। थोड़े समय के लिए मान भी लें कि देश विभाजित हो जाता लेकिन यदि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश हिंदू देश होते अलकायदा, लश्कर ए तैयबा, जमात उद दावा जैसे आतंकी संगठन नहीं होते। पूरी दुनिया में धर्मों के बीच वर्चस्व की जंग चल रही है औैर हम हिंदू धर्म वाले कह रहे हैं कि धर्म निजी आस्था का मसला है। आज की दुनिया में धर्म सीधे-सीधे राजनीतिक शक्ति से जुड़ा है। हर देश अपनी नीतियां तय करने में धर्म को ध्यान रखता है। यदि हमने धर्मांतरण के जरिए हिंदू धर्म के विस्तार पर जोर न दिया जो निरंतर कमजोर होते जाएंगे। संजय तिवारी जी ने हिंदू धर्म और सनातन धर्म को अलग करने का जो प्रयास किया है, वह उचित नहीं जान पड़ता। उनका यह कहना सही है कि हमारे मंदिरों में हिंदू धर्म की जय नहीं बोली जाती लेकिन आज यह भी उतना ही सही है कि हिंदू धर्म और सनातन धर्म एक दूसरे के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं। फिर सनातन धर्मियों की पहचान पूरी दुनिया में हिंदू के ही रूप हो गई है, इसलिए इसे स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
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sandeep on 08 August, 2010 22:17;54
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हिन्दू धरम और सनातन धरम एक ही है ,ओरिस सनातन धरम की पताका भारत क वर्तमान महापुरुष संत आसाराम बापू ,रविशंकर जी ,रामदेव जी ,मोरारी बापू जी फहरा रहे है [समय समय पैर इसे बदनाम करने की कोशिश हो रही है [
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vivek on 09 August, 2010 10:41;16
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अनूप आनंद ने जो कहा है वो बिलकुल सही और सामायिक है यदि हिन्दू धर्म का प्रचार तर्कों के द्वारा किया जाता तो आज विश्व आतकवाद के नासूर से मुक्त होता
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संत वही जो पंथ दिखाए
जगदगुरु रामानंदाचार्य श्रीरामनरेशाचार्य आज के आपाधापी भरे, भौतिकता के प्रमाद में ऊभचूभ करते समय में एक ऐसे अकम्पित ज्योति-स्तम्भ हैं, जिनसे जो भी चाहे अपने जीवन में प्रकाश पा सकता है। एक ऐसे स्नेहिल-प्रेमिल संत, जो धर्म-अध्यात्म, ज्ञान-दर्शन और तत्व चिंतन के अगाध समुद्र हैं और जिनकी शीतल वाणी हृदय के दाह को शांत करके मन के तार को इस तरह झंकृत कर देती है। ...
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बीबी-बच्चों वाले शंकराचार्य
भारत में हिन्दू धर्म व्यवस्था में शंकराचार्य सर्वोच्च स्थान पर होता है. लेकिन इस पद की गरिमा और शक्ति ने इस शंकराचार्य पदवी को पूरी तरह से शक्ति प्रदर्शन के अखाड़ों में बदल दिया है. आदि शंकर द्वारा भले ही चार पीठ स्थापित किये गये हों लेकिन इस समय दर्जनों शंकराचार्य अपनी धर्म की दुकानदारी चला रहे हैं. विस्फोट.कॉम ऐसे शंकरायार्यों की कलई खोलनेवाली एक विशेष श्रृंखला शुरू कर रहा है जिसकी पहली कड़ी में हम माधवाश्रम के बारे में आपको बता रहे हैं जो कि खुद को ज्योतिर्मठ पीठ का शंकराचार्य घोषित करते हैं. ...
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