स्टेनगनाय नमः, टेलीविजनाय स्वाहा! (हवन)
भारत में यज्ञ का महत्व क्या है और हम यज्ञ क्यों करते हैं इसकी विधिवत जानकारी हमें भले ही न हो लेकि यज्ञ को लेकर भारत में भ्रांतियां बहुत हैं. स्वामी श्री अड़गड़ानंद वर्तमान यज्ञ व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. उनके सवाल तार्किक और सटीक हैं जिसके बारे में हिन्दू समाज को निश्चित रूप से गंभीरता से विचार करना होगा. यज्ञ पर स्वामी जी के लेखन को दो किश्तों में हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.
कर्मकाण्ड में पूजा-भाग के हर श्लोक में परमपुरुष परमात्मा की विविध अवस्थाओं का चित्रण है। हर श्लोक के पश्चात् मांगलिक वस्तुओं को समर्पित किया जाता है। कर्मकाण्ड का दूसरा भाग है हवन, जिसमें वेदी बनाकर आम अथवा किसी सुगन्धित वृक्ष की लकड़ी में अग्नि आधान कर तिल, यव, अगरु इत्यादि का मिश्रण करते हैं। अनेक देवताओं और वस्तुओं का नाम लेते हैं कि यह वस्तु आपके लिये है मेरी नहीं, आप इसे स्वीकार करें; किन्तु यहाँ भी एक भूल न जाने कब से स्थान पा चुकी है कि श्लोक तो परम पुरुष की महिमा के पढ़े जाते हैं, जिसका अर्थ है कि उस प्रभु के अतिरिक्त सभी नाशवान् हैं; किन्तु स्वाहा के समय अनेकानेक तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का नाम समर्पण करने लग जाते हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है- चाहे वेद ही उठाकर क्यों न देख लें।
हवन में पचीस-तीस देवी-देवताओं तक नाम तो लिये जाते हैं; किन्तु इसके पश्चात् जड़-चेतन जीवों के नामों की गिनती शुरू हो जाती है; क्योंकि सभी देवताओं का नाम कोई नहीं जानता। कहते हैं- समुद्रेभ्यो नमः, तो साथ ही क्षीर-समुद्र, दधि-समुद्र, घृत-समुद्र, इक्षु (गन्ने के रस के) समुद्र और सुरासमुद्रेभ्यो नमः। यह सब खाने-पीने की वस्तुएँ हैं। इतना ही नहीं, नदियाँ और छोटे-मोटे नाले तक को स्वाहा। फिर छः-सात प्रकार के सर्पों को गिनाया जाता है, जैसे- सहसनाग, वासुकी, कर्कोटकाय, तक्षकाय नमः स्वाहा। आगे वृश्चिकाय नमः, कृकलाय (गिरगिट को भी) स्वाहा। शरीर की इन्द्रियों के भी नाम हैं, जैसे- भगाय नमः। स्वर्ग की अप्सराओं के प्रति भी समर्पण कराया जाता है, जैसे- मेनकायै स्वाहा, उर्वश्यै नमः, तिलोत्तमायै नमः स्वाहा। इसी प्रकार मानव-निर्मित काल-गणना और ग्रह-नक्षत्रों के प्रति भी समर्पण कराया जाता है। जैसे- सोमाय नमः, भौमाय नमः, ध्रुवाय नमः, राहवे केतवे नमः। इसी क्रम में अस्त्र-शस्त्रों को नमन, जैसे- दण्डाय नमः, गदा-अंकुश-पाश-त्रिशूल-चक्राय नमः; जबकि ये आविष्कार हजारों वर्ष पुराने पड़ चुके। फिर कहते हैं- इन्द्र और उसके उच्छृंखल लड़के जयन्त के लिये स्वाहा। पीपल से लेकर पिपीलिका तक को समर्पण, भूत-भवानी तक को नमन सिखाया जाता है। सारांशतः प्रचलित हवन-पद्धति में शाश्वत एक परमात्मा के स्थान पर क्षणभंगुर कलेवरों के प्रति हमारी श्रद्धा को बाँट दिया जाता है- ऐसा क्यों?
देवता ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।’- पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में गिर पड़ते हैं। देवताओं का राजा बननेवाला नहुष गिरा तो अजगर बना। तैंतीस करोड़ देवता तो न जाने कब के गिने गये थे, अब तक उनमें से कितने गिरे? चन्द्रयान से पृथ्वी की परिक्रमा करनेवालों ने क्या उस सहसनाग को देखा, जिसके फन पर पृथ्वी टिकी बतायी गयी है, जिसे आप स्वाहा बोलते हैं? जिन्हें आप हवि देते हैं, क्या वे हैं भी या नहीं? कुछेक कहते हैं कि जड़-चेतन स
बको नमस्कार इसलिए कराया जाता है कि मनीषियों को इन सबमें परमात्मा दिखायी पड़ा। किन्तु यह तो प्राप्ति के समय महापुरुष की अपनी निज अनुभूति है, दूसरों के लिए उसका क्या उपयोग? अग्नि तो प्रत्येक काष्ठ में है, किन्तु बिना जलाये क्या भोजन पक जायेगा? जिसने कभी देखा नहीं, जलाने की विधि सीखी नहीं, क्रिया करता नहीं तो लकड़ी में रहते हुए भी आग उसके लिए नहीं है।
इसी प्रकार, परमात्मा कण-कण में है- ऐसा भगवत्-प्राप्ति के समय दिखायी अवश्य पड़ता है, फिर भी महापुरुष जड़-चेतन सबको समर्पण करने नहीं लग जाता, बल्कि उसका हृदयस्थ इष्ट ही बाहर भी सर्वत्र दिखाई पड़ने लगता है। वह सर्वत्र अपने इष्ट को ही प्रणाम करता है, अन्य को नहीं। अपनी विभूतियों को गिनाते-दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि बहुत कुछ जानने-सुनने से तेरा क्या प्रयोजन! इतने में समझ ले कि संसार में जो कुछ भी तेजयुक्त है, मेरे ही तेजांश प्रभाव से है, तो क्या अर्जुन उन सबको पूजने लगा? क्या उसने सूर्य और चन्द्रमा की पूजा की? वह श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित रहा। केवल भक्त के लिए प्राप्तिकाल में सृष्टि खो जाती है, भगवान ही सर्वत्र दिखायी पड़ते हैं। शेष सबको कण-कण में संसार ही दीखता है, भगवान कहीं नहीं। सर्वत्र भले ही हों; किन्तु साधनात्मक जागृति के बिना वह हमारे और आपके लिए नहीं हैं। भगवान सर्वत्र हैं- यह योग-साधना से चलकर देखने के लिए है, मानकर बैठे जाने के लिए नहीं। यह भी कहा जाता है कि जिन उपयोगी वस्तुओं का हम प्रयोग करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन के लिए इन मन्त्रों से समर्पण कराया जाता है। फिर तो उपयोगी आधुनिक आविष्कारों के प्रति भी समर्पण क्यों नहीं करते कि- पम्पसेटाय स्वाहा। फाउण्टेनपेनाय नमः, टेलीविजनाय स्वाहा। उर्वरकाय स्वाहा। टैक्टराय नमः। कम्प्यूटराय नमः स्वाहा। नम्बर दो की कमाई नमः स्वाहा। स्टेनगनाय नमः इत्यादि। परमाणु पिस्टल कहें। अब दण्ड-मुग्दर का क्या उपयोग?
सन्तोष के लिए कुछ लोग मान लेते हैं कि देवी-देवता भगवान के ही विभिन्न नाम हैं, किन्तु जिन नामों से आप हवन करते हैं, क्या उनसे एक परमात्मा का बोध होता है? लोग छोटे-बड़े देवताओं की कल्पना कर उनके पीछे दौड़ने लगते हैं। कुछ मानते हैं कि देवता भी भगवान के अंग या सेवक हैं, उन्हें मिलाये रखना जरूरी है। कोई काम लेना है तो भगवान को कष्ट क्यों दें, इन्हीं से काम करा लें! किन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं। उपनिषदों में कहा गया है कि देवताओं की उपासना करनेवाला अर्थात् भगवान के एक अंग, एक आँख या एक कान की पूजा करनेवाला यथार्थ नहीं जानता। वह एक-एक देवताओं का पशु है। देवता उसका शोषण ही करते हैं। अर्थात् इनमें उलझकर वह एक परमात्मा के चिन्तन में समय नहीं दे पता, परमश्रेय से वंचित रह जाता है।
वस्तुतः देवता और असुर हृदय के अन्तर्गत दैवी और आसुरी गुणों के नाम हैं। परमदेव परमात्मा की ओर बढ़ानेवाले शम-दम, यम-नियम, धारणा-ध्यान अथवा समाधिपर्यन्त गुण ही देवता हैं। अपने भीतर इन गुणों को विकसित करना कठिन जानकर, बाहर इन गुणों की आकृति पूजकर सन्तोष कर लेना ही भ्रान्ति का मूल है, जैसे कि बुद्धि की देवी, क्रोध का देवता, प्रेम का देवता, समृद्धि का देवता, भोजन की देवी, बीमारियों की देवी, उनके स्त्री-बच्चे, निवास, वाहन इत्यादि कल्पित कर लिए गये हैं। ये मात्र गुण हैं और जिसमें जितनी मात्रा में प्रस्फुटित होते हैं, उसी मात्रा में शक्ति प्रदान करते हैं। इन गुणों की पराकष्ठा परमदेव परमात्मा में है। अस्तु, पूजन इन गुणों की कल्पित आकृतियों की नहीं, बल्कि इन सबके एकमात्र आश्रय परमात्मा का ही पूजन तथा एक उन्हीं के प्रति समर्पण उचित है। (जारी....)
प्रस्तुति: एस ए अस्थाना
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स्वामी जी मेरी बातों का बुरा लग सकता है उसके लिए क्षमा लेकिन इस तरह फालतू का confusion मत पैदा करिए !
शैलेन्द्र कुमार जी आपने बिलकुल कुतर्की बात कही है ! जिसका जवाब प्रशांत जी ने आपको दे दिया है !
Hari om !!!!!!!!
primary के बच्चो के लिए किताब अलग व् graduation के लिए अलग होती है . हमारे यहाँ भी aap जैसे लोगो के लिए वेद वेदांत हैं न की भगवन सत्यनारायण की कथा ये आपको समझ नहीं आ सकती . हवन के विशे मैं aacharya श्रीराम शर्मा जी गायत्री पीठ हरिद्वार वालो की पुस्तके आप की समझ मैं आ जाएँगी क्योकि वो आप जैसे कथित बुध्हिजीवियो ko लक्ष्य कर लिखी गयी हैं .
बे-सिर-पैर की हांक रहे हैं, फेंक रहे हैं फंद.
फेंक रहे हैं फंद, नए के लोभ में आकर.
कोइ मुर्गा फंस जाए, कैसे घबरा कर.
कह साधक कवि, संभालना ये करदें जाने क्या.
बाबा अदगदानंद चाहते हैं कहना क्या?
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