कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
भारत भूमि में जन्मा कौन ऐसा व्यक्ति होगा जिसने श्रीकृष्ण का नाम न सुना हो? श्रीकृष्ण को वन्दे जगदगुरु भी कहा जाता है। श्रीरामचन्द्र के समान श्रीकृश्ण भी करोड़ों भारतवासियों की श्रद्वा और भक्ति के पात्र रहे है। वास्तव में श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण जीवन लीला, उनका दुष्टों से लड़ना और सज्जनों की रक्षा करना, उनकी राजनीतिक क्षमता और सबसे अधिक उनका गीता के द्वारा दिया हुआ कर्मयोग का संदेश भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है।
मनुष्य कहने को तो मुठ्ठी भर माटी है परंतु उसमें शैतान भी है, देवता भी और भगवान भी। इसलिए व्यक्ति का व्यवहार सदैव एक सा नही होता, उसके मन में देवासुर संग्राम चलता ही रहता है। हिंदू धर्म के अनुसार मन एक प्रकार का रथ है जिसमें कामना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और घृणा नाम के सात अश्व जुटे हैं जो व्यक्ति को उसके कर्मपथ से दूर ले जाते है।
मानव को कर्तव्यपालन में तत्पर करने की दृष्टि से श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया था उसकी व्यख्या गीता में की गई है वह युग-युग तक मानव जाति का पथ प्रदर्शन करती रहेगी। श्रीकृष्ण के मुख से निकले यह अमर शब्द ‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन’’ अंधकार में भटकते मनुष्य के लिए प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक है। फल की चिन्ता से मुक्त होकर कर्तव्यपालन को ही सुखी और सफल जीवन का मंत्र कहा जा सकता है। यह उपदेश किसी देश, काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नही अपितु समस्त मानव जाति के लिए है। इसे समस्त मानव जाति के लिए ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बना कर कहा है। इन उपदेशों के मूल में यह है कि कर्म करो क्योंकि कर्म करना मनुष्य का कर्त्तव्य है परंतु यह कर्म निष्काम भाव से होना चाहिए।
श्रीकृष्ण के उपदेश सतत कर्म एवं समाज के कल्याणार्थ प्रयत्न करने की शिक्षा देते है। इन उपदेषों की खासयित यह है कि इसमें समाज एवं व्यक्ति दोनों के कल्याण अविभाज्य रुप से एक हो जाते है। श्रीकृष्ण कर्म के माध्यम से किंकर्तव्यविमूढ़ मनुष्य को सत्य मार्ग दिखाने का कार्य करते है। दरअसल श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी दिखाई देता है। वह दार्शनिक, चितंक, गीता के माध्यम से कर्म और योग के संदेशवाहक और महाभारत युद्व के नीति निर्देशक थे। किंतु आम भारतीय के लिए तो वह आज भी गाय चराने, मटकी फोड़ने और माखन चोर और नटखट कन्हैया ही है। गीता में इसी की भावाभिव्यक्ति है- श्रीकृष्ण कहते है- हे अर्जुन! जे भक्त मुझे जिस भावना से भजता है मैं भी उसको उसी प्रकार से मिलता हूँ। देवी देवताओं में मात्र श्रीकृष्ण ही ऐसे है जिनके संबंध में सबसे अधिक साहित्य की रचना हुई है। उतर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के लोकगीतों, लोककलाओं में श्रीकृष्ण का यशोगान किया गया है।
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि काम, क्रोध व लोभ-ये तीनों नरक के द्वार है। इन तीनों का त्याग करें क्योंकि इनसे आत्मा तक का हनन होता है। कामुक आचार से व्यक्ति भ्रष्ट हो जाता है। क्रोध बुद्वि को भ्रष्ट करता है और विवेक में कमी लाता है जबकि लोभ उसे भिखारी बना देता है और कामनाओं के पूरा न होने से निराशा होती है। आज भौतिकातावाद के इस दौर में मानवीय संवेदनाए लगातार दम तोड़ रही है। मानव अपने कर्म पथ से भटककर अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए एक दूसरे का गला काटने से भी परहेज नही करते। जब होश आता है कि निज स्वार्थ की पूर्ति के लिए कितनों को दुख पहुंचाया है उसके बाद पश्चाताप होता है और वह जीवन को नए सिरे से जीना चाहता है। दरअसल सत्कर्म केवल मनुश्य के खुद के जीवन को ही प्रभावित नही करता बल्कि समाज पर भी असर करता है।
इसलिए आज के युग में कृष्ण और उनका संदेश किसी धर्म विशेष के लिए नहीं बल्कि समूची मानव सभ्यता के लिए पथ-प्रदर्शक का काम कर रही है. सच्चे अर्थों में इस युग के लिए कृष्ण जगतगुरु हैं जो मनुष्य को मोक्ष का मार्ग दिखा रहे हैं.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
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- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
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कृष्ण की पहचान पूतना से युद्ध करते हुये नहीं बनती अपितु बांसुरी बजाते हुये ही बनती है। पोस्ट के साथ दिये गये चित्र में भी वे पूतना से युद्ध करते हुये नहीं अपितु बांसुरी बजाते हुये दिख रहे हैं।
2- क्या विवादास्पद स्थलों पर मन्दिर बनए से ही सारी समस्याएं हल हो जायेंगीं? शायद समझदार लोग ऐसी बातों के पीछे छुपी कुटिलिता को समझ लेंगे।
3- भारतीय संस्कृति में राम कृष्ण के अलावा बहुत कुछ है, वहाँ शाक्त हैं, शैव हैं,चार्वाक हैं, बुद्ध हैं महावीर हैं, कबीर हैं, गुरुनानक हैं,मीरा हैं, रैदास हैं तथा गैर विवादास्पद स्थलों पर बने लाखों अन्य धर्मस्थल हैं, जिनमें आस्था रख कर धर्म प्रेमी लोग जीवन संघर्षों से गुजर रहे हैं। जो कुएं के मैंढक नहीं हैं उनके लिए आकाश बहुत बड़ा है। युद्ध लक्ष्य नहीं होता वह भी प्रेम को पाने के लिए किया जाता रहा है और किसी के जीवन का बहुत थोड़ा सा हिस्सा होता
और फिर अपना गोरव जिसे प्यारा नहीं वो इन्सान कैसा?
कश्मीर भी तो विवादित बना हुआ है, तो क्या हम उस पे दावा छोड़ दें ?
कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया, क्या कह दे उनको भूल जाओ अपनी जन्म भूमि को अब्ब विवादित है?
नहीं वीरन्द्रजी आप की बड़ी भूल है. जो माँ बाप को भूल सकता है वो ही अपना गोरव भूल सकता है,
जननी , जन्मभूमि कैसे भूली जाएगी? ये काम तो सिर्फ कांग्रेसी ही कर सकतें है. इंदिरा याद रही और फ़िरोज़ को भुला दिया, सोनिया याद रही और मेनका को भुला दिया. अरे परिवारवाद भी याद रखा तो सिर्फ मतलब का . नालायक congression .
मैं ठीक कह रहा हूँ ना जैन साब.
मैं फ्रांसिस जी को काफी अरसे से पढ़ रहा हूँ उन्होंने ने क्या लिखा है इसकी गहराई में जाने की किसी ने भी कोशिश नहीं की है एक अच्छी खासी पोस्ट का कबाड़ा कर दिया है
कुछ लोग ऐसे भी होते है कि जहा भी जायेंगे गन्दगी जरूर करेंगे| अगर इन लोगो को एक एक गिलास पानी भी दे दिया जाये तो वहाँ भी ये लोग - कांग्रेस पानी बी जे पी पानी, हिन्दू पानी मुस्लिम पानी कह कर बहस शुरू कर देंगे.
यहाँ भी आखिर एक शख्स ने दूध में खट्टा डाल ही दिया.
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