क्या यह दुख सबको मिटाकर मिटेगा?
पिछले तीन-चार महीनों में मंदिर-मस्जिद और गिरजाघरों के भक्त आपस में लड़े हैं और इससे जो आग लगी है, उससे फिर कई लोग झुलसे हैं। कश्मीर, उड़ीसा और कर्नाटक में धर्मों की बुनियाद-सहिष्णुता को जलाकर यह आग तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी फैली है। गांधीजी ने सनातन धर्म को सबसे सहिष्णु धर्म बताया था। उन्होंने बहुत भारी मन से पूछा था कि क्या यह दुख सबको मिटाकर मिटेगा?
मै इतिहास का कोई बड़ा जानकर नहीं हूं। मैं विद्वान होने का दावा भी नहीं करता। मगर हिंदुत्व पर लिखी हुई किसी प्रामणिक किताब में मैंने पढ़ा है कि हिन्दू शब्द वेदों में नहीं है। जब सिकंदर महान ने हिंदुस्तान पर चढ़ाई की, तब सिंधु नदी के पूर्व के देश में रहने वाले लोग, जिसे अंग्रेजीदां हिंदुस्तानी `इंडस´ कहते हैं, हिंदू के नाम से पुकारे गए। सिंधु का `स´ ग्रीक भाषा में `ह´ हो गया। इस देश में रहनेवालों का धर्म हिंदू धर्म कहलाया, और जैसा कि आप लोग जानते हैं, यह सबसे ज्यादा सहिष्णु धर्म है। इसने उन ईसाइयों को आसरा दिया जो विधर्मियों से सताए जाकर भागे थे। इसके सिवा इसने उन यहूदियों को जो बेनिइजराइल कहे जाते हैं, और पारसियों को भी आसरा दिया। मैं इस हिंदू धर्म का सदस्य होने में अभिमान महसूस करता हूं, जिसमें सभी धर्म शामिल हैं और जो बड़ा सहनशील है। आर्य विद्वान वैदिक धर्म को मानते थे और हिंदुस्तान पहले आर्यावर्त कहा जाता था। वह फिर से आर्यावर्त कहलाए ऐसी मेरी कोई इच्छा नहीं है। मेरी कल्पना का हिंदू धर्म मेरे लिए अपने आप में पूर्ण है।
बेशक उसमें वेद शामिल हैं, मगर उसमें और भी बहुत कुछ शामिल है। यह कहने में मुझे कोई नामुनासिब बात नहीं मालूम होती कि हिंदू धर्म की महत्ता को किसी भी तरह कम किए बगैर मैं मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी धर्म में जो महत्ता है उसके प्रति हिंदू धर्म के बराबर ही श्रद्धा जाहिर कर सकता हूं। ऐसा हिंदू धर्म तब तक जिंदा रहेगा जब तक आकाश में सूरज चमकता है। इस बात को तुलसीदास ने एक दोहे में रख दिया है: दया धरम को मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छोड़िए, जब लगि घट में प्रान। मैं इस बात का जिक्र किए बिना नहीं रह सकता कि मुझे जो सूचना मिली है उसके मुताबिक दिल्ली की करीब 137 मस्जिदें हाल के दंगों में बर्बाद-सी कर दी गई हैं। उनमें से कुछ को मंदिर में बदल डाला गया है। ऐसी एक मस्जिद कनाट प्लेस के पास है जिसकी तरफ किसी का भी ध्यान गए बिना नहीं रह सकता। आज उस पर तिरंगा झंडा फहरा रहा है। उसे मंदिर का रूप देकर उसमें एक मूर्ति रख दी गई है।
मस्जिदों को इस तरह बिगाड़ना हिंदू और सिख-धर्म पर कालिख पोतना है। मेरी राय में यह बिलकुल अधर्म है। जिस कलंक का मैंने जिक्र किया है, उसे यह कहकर कम नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान में मुसलमानों ने भी हिंदू मंदिरों को बिगाड़ा या उन्हें मस्जिदों का रूप दे दिया है। मेरी राय में ऐसा कोई भी काम हिंदू धर्म, सिख धर्म या इस्लाम को बर्बाद करने वाला काम है।
अंत में एक बात कह देना अपना फर्ज समझता हूं। मुझसे यह कहा गया है कि गुड़गांव के पास रोमन कैथोलिक सताया जाता है। जिस गांव में यह हुआ है, उसका नाम कन्हाई है। वह दिल्ली से करीब 25 मील पर है। एक हिंदुस्तानी रोमन कैथोलिक पादरी और एक गांव के ईसाई-प्रचारक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने वह खत दिखाया जिसमें कन्हाई गांव के रोमन कैथोलिक ने हिंदुओं द्वारा अपने सताए जाने की कहानी बयान की थी। ताज्जुब यह है कि वह खत उर्दू में लिखा था। मैं समझता हूं कि उस हिस्से के रहने वाले हिंदू, सिख या दूसरे लोग हिंदुस्तानी ही बोल सकते हैं और उर्दू-लिपि में लिख सकते हैं। सूचना देने वालों ने मुझे बताया कि वहां के रोमन कैथलिकों की धमकी दी गई है कि अगर वे गांव छोड़कर चले नहीं जाएंगे तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। मुझे आशा है कि यह धमकी झूठी है और वहां के ईसाई भाई-बहनों को बिना किसी रूकावट के अपना धर्म पालने और काम करने दिया जाएगा। अब हमें सियासी गुलामी से आजादी मिल गई है। इसलिए आज भी उन्हें धर्म और काम की वही आजादी भोगने का हक है, जो वे ब्रिटिश हुकूमत के दिनों में भोगते थे। मिली हुई आजादी पर यूनियन में सिर्फ हिंदुओं का और पाकिस्तान में सिर्फ मुसलमानों का ही हक नहीं है।
मैं अपने एक भाषण में आप लोगों से कह चुका हूं कि जब यूनियन में हिंदुओं और सिखों का मुसलमानों के खिलाफ भड़का हुआ गुससा कम हो जाएगा, तो संभव है वह दूसरों पर उतारें। लेकिन जब मैंने यह बात कही थी तब मुझे यह मालूम नहीं था कि मेरी भविष्यवाणी इतनी जल्दी सच साबित होने लगेगी। अभी तक मुसलमानों के खिलाफ बढ़ा हुआ गुस्सा पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। जहां तक मैं जानता हूं, ये ईसाई बिलकुल निर्दोष हैं। मुझे समझाया गया कि उनका गुनाह यही है कि वे ईसाई हैं। अगर इस तरह नादानी भरा द्वेष चालू रहा तो आजाद हिंदुस्तान का भविष्य अंधेरा ही समिझए। वे पादरी जब रेवाड़ी में थे, तब उनकी खुद की साईकिल उनसे छीन ली गई और वह मौत से बाल-बाल बचे। क्या यह दुख सारे गैर-हिंदुओं और गैर-सिखों को मिटाकर ही मिटेगा?
(गांधी मार्ग के सौजन्य से)
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